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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:फ्रांस में कट्‌टरता के खिलाफ बने कानून में इस्लाम शब्द नहीं, लेकिन इससे इस्लामी जगत में खलबली

12 दिन पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

फ्रांस की संसद ने ऐसा कानून पारित कर दिया है, जिसे लेकर इस्लामी जगत में खलबली मच गई है। कई मुस्लिम राष्ट्रों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुल्ला-मौलवी उसके खिलाफ अभियान चलाने लगे हैं। सबसे पहले हम यह जानें कि यह कानून क्या है और इसे क्यों लाया गया है?

इस सख्त कानून को लाने का कारण वह घटना है, जो पिछले साल अक्टूबर में फ्रांस में घटी थी। फ्रांसीसी अध्यापक सेमुअल पेटी की हत्या अब्दुल्ला अजारोव ने इसलिए कर दी थी कि उन्होंने कक्षा में पैगंबर मुहम्मद के कार्टून दिखाए थे।

वह छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ा रहे थे। फ्रांसीसी पुलिस ने अब्दुल्ला को मार गिराया था। अब्दुल्ला के माता-पिता रूस के मुस्लिम-बहुल प्रांत चेचन्या से आकर फ्रांस में बसे थे। इस घटना ने पूरे यूरोप को क्रोधित कर दिया था। इसके पहले 2015 में ‘चार्ली हेब्दो’ पत्रिका पर इस्लामी आतंकवादियों ने हमला बोलकर 12 फ्रांसीसी पत्रकारों को मार दिया था। ऐसी खूनी घटनाओं के बाद होनेवाले प्रदर्शनों में दर्जनों लोग मारे गए।

इसी कारण फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मेक्रों को सख्त कानून लाना पड़ा। उनके गृहमंत्री ने घोषणा की थी कि हमारे गणराज्य के दुश्मनों को हम एक मिनट भी चैन से नहीं बैठने देंगे। फ्रांसीसी नेताओं के सख्त बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए तुर्की के राष्ट्रपति तय्यब एरदोगन ने कहा था कि फ्रांस के राष्ट्रपति दिमागी जांच कराएं। राष्ट्रपति मेक्रों ने सारे यूरोप के गुस्से को कानूनी रूप दे दिया है और फ्रांसीसी संसद के निचले सदन ने पिछले सप्ताह स्पष्ट बहुमत से उस पर मुहर लगा दी है।

इस कानून में कहीं भी इस्लाम शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। इसे अलगाववाद-विरोधी कानून नाम दिया गया है। इसमें सिर्फ धार्मिक या मजहबी कट्टरवाद की भर्त्सना है, किसी इस्लाम या ईसाइयत की नहीं। कानून में फ्रांसीसी ‘लायसीती’ यानी पंथ-निरपेक्षता के सिद्धांत पर जोर दिया गया है। यह सिद्धांत 1905 में कानून के रूप में इसलिए स्वीकार किया गया था कि सरकार को चर्च के ईसाई कट्टरवाद और दादागीरी को खत्म करना था।

इसी कानून के चलते सरकारी स्कूलों में किसी छात्र, छात्रा और अध्यापक को ईसाइयों का क्रॉस, यहूदियों का यामुका (टोपी) या इस्लामी हिजाब पहनने पर पाबंदी लगा दी गई थी। मजहबी यानी ईद और योम किप्पूर की छुट्टियां भी रद्द कर दी गई थीं।

वर्तमान कानून लंबी बहस और सैकड़ों संशोधनों के बाद पारित हुआ है। यह नए फ्रांसीसी इस्लाम की स्थापना कर रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य फ्रांस के मुसलमानों को यह समझाना है कि तुम सबसे पहले फ्रांस के नागरिक हो। अफ्रीकी, अरब, तुर्क, ईरानी बाद में। यदि फ्रांस का नागरिक बनकर रहना है तो अलगाववाद छोड़ो।

7 करोड़ के फ्रांस में इस समय लगभग 60 लाख मुसलमान हैं। उनमें से ज्यादातर फ्रांसीसी रीति-रिवाजों को भरसक आत्मसात कर चुके हैं लेकिन ज्यादातर मुस्लिम नौजवान वर्तमान कानून के भी कट्टर विरोधी है। इस कानून में कई अरबी रीति-रिवाजों का विरोध किया गया है। जैसे औरतें हिजाब या नकाब पहनकर सावर्जनिक स्थानों पर नहीं जा सकती है।

क्राॅस, यामुका और हिजाब सरकारी दफ्तरों और विश्वविद्यालयों में भी नहीं पहने जा सकते हैं। एक से ज्यादा शादी करने पर 13 लाख रु. जुर्माना होगा। यदि कोई मजहब के नाम पर डराता है या धमकी देता है तो उसे 65 लाख रु. जुर्माना देना होगा। किसी भी सरकारी कर्मचारी या सांसद के विरुद्ध किसी को यदि कोई मजहबी आधार पर भड़काता है तो उसे सख्त सजा मिलेगी। इस्लामी मदरसों की पढ़ाई पर सरकार नजर रखेगी।

3 साल की उम्र के बाद बच्चों को स्कूलों में दाखिल दिलाना जरूरी होगा। मस्जिदों को मिलने वाले विदेशी पैसों पर सरकार कड़ी नजर रखेगी। इस तरह के कई प्रावधान इस कानून में हैं, जो फ्रांस के सभी नागरिकों पर एक समान लागू होंगे, वे चाहें मुसलमान हों, ईसाई, यहूदी या हिंदू। फ्रांस और यूरोप के कई श्वेत संगठन और राजनेता इस कानून के इन प्रावधानों को बेहद नरम और निरर्थक मानते हैं। वे मुसलमानों को रोजगार देने के विरोधी हैं। वे मस्जिदों पर ताले ठुकवाना चाहते हैं। वे धर्म-परिवर्तन के खिलाफ हैं।

वे इस्लाम, कुरान और पैगंबर मुहम्मद की वैसी ही कड़ी आलोचना करते हैं, जैसे ईसा, मूसा और बाइबिल की। लेकिन यूरोपीय लोग यह ध्यान क्यों नहीं रखते कि वे जिन बातों को पसंद नहीं करते हैं, उन्हें न करें लेकिन व्यर्थ कटु निंदा करके दूसरों का दिल क्यों दुखाएं?

इसी तरह दुनिया के मुसलमानों को भी सोचना चाहिए कि इस्लाम क्या छुई-मुई का पौधा है, जो किसी का फोटो छाप देने या किसी पर व्यंग्य कस देने से मुरझा जाएगा? वे इस्लाम की उस क्रांतिकारी भूमिका पर गर्व करें, जिसने अरबों की जहालत को मिटाने में अद्भुत योगदान किया है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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