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एन. रघुरामन का कॉलम:शेरनी (महिला वन अधिकारी) की तरह एक बार मौका देकर देखें कि निरक्षर कैसे शिक्षित हो सकते हैं

एक महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

गुरुवार की देर रात में हैदराबाद से मुंबई लौट रहा था। फ्रंट रो की पहली सीट पर बैठकर मैं विद्या बालन से उनकी नई रिलीज फिल्म ‘शेरनी’ पर चर्चा करने के लिए उन्हें कॉल करने की कोशिश कर रहा था। मैं उनके किरदार के बारे में सोच रहा था जो अंतर्मुखी है और ज्यादा प्रतिरोध नहीं करता, जिससे उसका काम चुनौतीपूर्ण हो जाता है। फिर अचानक उसे अहसास होता है कि आवाज उठानी होगी और फिर फिल्म एक बाघिन की, एक महिला वन अधिकारी की पितृसत्तात्मक सोच से लड़ाई दिखाती है। मौका मिलने पर वह साबित करती है कि बाघिन कितनी मजबूत हो सकती है।

मैं इस विचार में खोया था कि तभी एक ग्रामीण की तेज आवाज आई, जिसने अधिकारपूर्ण लहजे में पूछा, ‘ये फ्लाइट लखनऊ जाएगी न?’ मेरे जवाब से पहले ही एक अन्य यात्री बोल पड़ा, ‘यह मुंबई जाएगी, आप गलत फ्लाइट में हैं।’ मैंने तुरंत उन्हें शांत किया और ग्रामीण से कहा, ‘आप सही फ्लाइट में है, यह मुंबई होते हुए लखनऊ जाएगी।’

अचानक वह सख्त दिखने वाला ग्रामीण अपने पान से रंगे दांत दिखाते हुए मुस्कुरा दिया। वह बोला, ‘मैं कहां बैठूं?’ उसके बोर्डिंग पास में 27वीं पंक्ति लिखी थी। मैंने उसे पीछे जाकर किसी से पूछने कहा। लेकिन उसने मदद करने कहा तो मैंने सीट बताई। बीच यात्रा में वह पीछे से मेरे पास आया और पूछा कि टॉयलेट कहां हैं, जबकि वह ठीक उसके पीछे ही था।

वह व्यक्ति कुछ भी पढ़ नहीं सकता था और उसे हमेशा जरूरत पड़ती थी। मैंने खुद ही उसे समझाया कि मुंबई में फ्लाइट रुकने पर वह उतरे नहीं। मैंने अपने सहयात्री से कहा कि इसीलिए भारत को ज्यादा स्कूलों की जरूरत है, ताकि ऐसी आबादी शिक्षित हो और वे बिना डर के यात्रा कर सकें। लेकिन नकारात्मक सोच वाले मेरे सहयात्री ने ताना मारते हुए कहा, ‘हम ऐसी अनपढ़ आबादी के लिए स्कूल कैसे शुरू कर सकते हैं, जब हमारे सामान्य स्कूल ही बंद हैं और कई बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं?’

तब मुझे भारत-म्यांमार की सीमा के पास बना स्कूल याद आया, जहां के सारे छात्र जीवन में पहली बार अल्फाबेट सीखते हैं, सफलतापूर्वक घड़े का चित्र बनाकर तालियां बजाते हैं। वे नाम लिखना भी सीखते हैं। मणिपुर के कामजोंग जिला के सियांग गांव में बना यह नया स्कूल 70 वर्ष और उससे ज्यादा उम्र वालों के लिए भी है। जब देशभर के बच्चे ऑनलाइन क्लास में व्यस्त हैं, 100 परिवारों के इस गांव के 20 बुजुर्गों को यह लॉकडाउन दशकों बाद भौतिक स्कूल में वापस लेकर गया। कई बुजुर्गों के लिए आगामी परीक्षा, जिंदगी की पहली परीक्षा होगी।

इस पहल को चलाने वाले जेमसन हाओरी ट्रस्ट के संस्थापक सोरिनथन हाओरी के लिए स्कूल को बनाने के पीछे सिर्फ शिक्षा ही कारण नहीं था, बल्कि वे बुजुर्गों को समाजीकरण के लिए मंच देना और उनकी मानसिक सेहत बेहतर रखना भी चाहते थे, जो इस दौर में जरूरी था। इग्नू से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर करने के बाद महामारी के कारण अक्टूबर 2020 में सोरिनथन दिल्ली से इस गांव आ गए।

अन्य लोगों से बात कर उन्हें अहसास हुआ कि कई बच्चे भी लौट आए हैं और वे पढ़ने के लिए शहर वापस नहीं जा पा रहे। तब उन्हें और उनकी मां को गांव में न सिर्फ बच्चों के लिए, बल्कि बुजुर्गों के लिए भी स्कूल खोलने का विचार आया।