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डॉ. चन्द्रकांत लहारिया का कॉलम:सरकार वैक्सीनेशन की चुनौतियां पहचाने, टीके का खर्च राज्य सरकारों पर थोपने के फैसले पर फिर विचार करे

एक महीने पहले
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डॉ. चन्द्रकांत लहारिया, जन नीति और स्वास्थ्य 
तंत्र विशेषज्ञ - Dainik Bhaskar
डॉ. चन्द्रकांत लहारिया, जन नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ

भारत में कोविड-19 वैक्सीन की सप्लाई मांग से बहुत कम है। सरकार द्वारा 18 से 44 साल के लोगों को वैक्सीन लगाने के फैसले के बाद लक्षित जनसंख्या तीन गुना (33 करोड़ से 94 करोड़) हो गई है, जबकि वैक्सीन की आपूर्ति लगभग वही है (सात से आठ करोड़ खुराक प्रतिमाह)। महामारी से लड़ने में वैक्सीन एक अहम औजार है। लेकिन इसकी सफलता के लिए जरूरी है कि हर लक्षित व्यक्ति तक समय पर वैक्सीन पहुंचे। चूंकि कोविड-19 टीकाकरण में चुनौतियां आ रही है, समाधान परिप्रेक्ष्य से कुछ बातों पर गौर करें।

पहली, भारत सरकार को कोवीशील्ड के दो टीकों के बीच का अंतर 12 हफ्ते कर देना चाहिए। इसके पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य हैं कि कोवीशील्ड के दो टीकों में जितना अंतर होगा, वैक्सीन उतनी ही प्रभावी होगी। इसके अलावा, सभी आयुवर्ग के जिन लोगों को आरटी-पीसीआर जांच में कोविड पाया गया हो, वे टीकाकरण के लिए संक्रमण के बाद चार से छह महीने गुजरने का इंतज़ार कर सकते हैं।

संक्रमण के बाद व्यक्ति में करीब छह महीने एंटीबॉडी रहती हैं। इससे कुछ करोड़ टीके उन लोगों को उपलब्ध हो जाएंगे, जिन्हें पहली खुराक का इंतजार है, साथ ही, वैक्सीन का उत्पादन व आपूर्ति बढ़ाने के लिए समय भी मिल जाएगा।

दूसरी, 18-44 आयुवर्ग के लिए वैक्सीन खरीद और डिलीवरी की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई है, इसलिए केंद्र, राज्यों को उनके मुताबिक रणनीति बनाने की छूट दे। संभव है कि वैक्सीन की आपूर्ति के मुद्दे को ध्यान में रखकर कुछ राज्य इस पूरे आयु वर्ग के लिए टीकाकरण न खोलना चाहें। ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य चरणबद्ध तरीके से वैक्सीनेशन को प्राथमिकता दे सकते हैं।

इससे टीकाकरण केंद्रों पर वैक्सीन की कमी से होने वाली अफरातफरी से बच सकते हैं। हर राज्य सरकार को अगले छह महीने से एक साल के लिए एक विस्तृत वैक्सीन अभियान की योजना बनाए, इसमें आपूर्ति का अनुमान व अन्य पहलू भी शामिल हों। हर राज्य को अल्प आय वालों, सह-रुग्ण व्यक्तियों व प्रवासी मजदूरों जैसे बीमारी के प्रति संवेदनशील जनसंख्या के टीकाकरण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

तीसरी, विशेष कार्यान्वयन पहल से यह सुनिश्चित हो कि वैक्सीनेशन में समानता हो, जैसे झुग्गी झोपड़ी और प्रवासी मजदूरों के टीकाकरण के लिए मोबाइल वैन पर विचार कर सकते हैं। ऐसी ही पहल ग्रामीण, पर्वतीय और अन्य मुश्किल पहुंच वाले इलाकों के लिए हो। पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम व नियमित टीकाकरण अभियान से मिले सबक का इस्तेमाल कोविड वैक्सीन को समय पर और समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाने में किया जाना चाहिए।

चौथी, वृहद टीकाकरण अभियान की जरूरत होती है कि टीकाकरण से जुड़े स्टाफ के साथ टीके के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं को पहचानें और उन्हें मैनेज करने के लिए नियमित तौर पर उन्हें पुन:प्रशिक्षित किया जाए। पांचवी, जैसे-जैसे टीकाकरण के लिए अधिक लोग आएंगे, भीड़ नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना होगा। यह महत्वपूर्ण है कि ये केंद्र संक्रमण फैलाने का कारण नहीं बनें।

यह जरूरी है कि कोविड टीकाकरण की नीति आसान बनाई जाए। उदाहरण के लिए राज्यों को वैक्सीन निर्माताओं से सौदेबाजी का अनुभव नहीं है और उन्होंने पिछले बजट में वैक्सीन के लिए प्रावधान भी नहीं किया है। भारत के चार दशक पुराने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में सभी वैक्सीन की केंद्रीकृत खरीद होती हैै।

अच्छा होगा, वैक्सीन केंद्र सरकार एकसमान दर पर खरीदे और सभी को मुफ्त उपलब्ध कराए। इसलिए 18-44 साल के लोगों के टीके का खर्च राज्य सरकारें वहन करें, केंद्र इस फैसले पर पुनर्विचार करे। जनता की भलाई और इस अभियान की सफलता के लिए अगर कुछ फैसले बदलने पड़ें, तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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