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डॉ. एम. चंद्र शेखर का कॉलम:सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों पर ध्यान दे और निजी कंपनियों को करना चाहिए रेगुलेट

एक महीने पहले
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डॉ. एम. चंद्र शेखर, असि. प्रोफेसर, इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइज, हैदराबाद - Dainik Bhaskar
डॉ. एम. चंद्र शेखर, असि. प्रोफेसर, इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइज, हैदराबाद

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण पर देश में बहस जारी है। विशाखापट्‌टनम में वाइजेग स्टील के निजीकरण के खिलाफ पिछले कुछ दिनों से PSU में काम कर रहे लोग, विभिन्न राजनीतिक पार्टियां और छात्र भी प्रदर्शन कर रहे हैं। इन रैलियों में स्लोगन है- ‘वाइजेग स्टील भारतीयों का अधिकार है।’ ऐसा नहीं है कि सिर्फ वाइजेग स्टील ही लोगों का अधिकार है, सार्वजनिक उपक्रमों की संपत्तियां देश के लोगों की संपत्ति हैं।

ऐसी सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण किया गया और जिसके कारण उद्यमों को बंद तक कर दिया गया। स्वाभाविक है कि पिछले एक दशक से सार्वजनिक उद्यमों के निजीकरण के लिए कई कमजोर तर्क दिए जा रहे हैं। पहले हैदराबाद कई नामी PSU जैसे IDPL, HCL, एल्विन, HMT आदि के लिए जाना जाता था। आज उनमें से अधिकांश विभिन्न कारणों से बंद हो गई हैं।

सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ? क्या यह प्रबंधकों की अक्षमता थी या मानव संसाधनों की असफलता या वित्तीय संसाधनों की गंभीर कमी? या कारण नौकरशाही और राजनीति का हद से ज्यादा हस्तक्षेप। क्या बढ़ती प्रतिस्पर्धा इसके लिए जिम्मेवार है। या कारण आधुनिक तकनीकी कौशल की कमी है? इन संस्थाओं की हालत के पीछे क्या अप्रत्यक्ष रूप से लोग ही जिम्मेदार नहीं है? सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण देश के अमीर और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए समस्या है?

इन सारे सवालों को इकट्‌ठा किया जाए, तो लोगों की संपत्ति का निजीकरण सारे प्रश्नों के मूल में है। निजी एयरलाइन जैसे जेट-किंगफिशर भारी कर्ज के कारण डूब गईं। परिणाम ये हुआ कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का NPA बढ़ा और कई PSU बैंक का विलय हुआ। पिछले पांच सालों में दूरसंचार क्षेत्र की कई कंपनियां रसातल में चली गई हैं और कई अभी भी कर्ज से जूझ रही हैं। निजी क्षेत्र का यस बैंक डूब गया और बड़े भाई की तरह स्टेट बैंक ने इसे सहारा दिया।

सरकारें सब्सिडी से हुए नुकसान की पूर्ति करने में असफल रही हैं, ऐसे में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल और गैस कंपनियां भी निजीकरण के लिए दबाव डाल रही हैं। क्या निजीकरण सफलता का सूचक है? अगर ऐसा है तो नोकिया और कोडैक जैसी प्रतिष्ठित और बड़ी कंपनियां आज कहां हैं? सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां सरकार को वार्षिक डिविडेंड के रूप में मुनाफा बांटती हैं। विनिवेश तंत्र के हिस्से के रूप में कई कंपनियां शेयर बायबैक के जरिए भी सरकार को नकद भुगतान कर रही हैं।

वे परोपकारी कामों का विस्तार भी कर रही हैं। क्या LIC और BPCL जैसी कंपनियों का निजीकरण उचित है? अगर सरकार गंभीर है, तो इन सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का प्रदर्शन भी सुधारा जा सकता है। उदाहरण के लिए पूर्व रेल मंत्री लालू यादव ने जब रेलवे भारी घाटे से गुजर रही थी, उन्होंने रेलवे की दक्षता में सुधार किया। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम इसलिए मुश्किलों से गुजर रहे हैं, क्योंकि कई सरकारों ने इनकी कमियां दूर करने के लिए समय पर नीतिगत निर्णय नहीं लिए।

बेहतर है कि हम संबंधित उपक्रम के असफल होने के कारण खोजें, कुशल लोगों की नियुक्ति करें और आधुनिक तकनीक लाने की दिशा में निर्णय लें। दशकों तक निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां भारत के लिए दो आंखों की तरह रही हैं। एक आंख से यात्रा में छोटी अवधि के दौरान तो फायदे मिल सकते हैं, लेकिन लंबी अवधि में नहीं। इसलिए सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों पर ध्यान देना चाहिए और निजी कंपनियों को रेगुलेट करना चाहिए। नहीं तो आय में असमानता का खतरा हो सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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