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शेखर गुप्ता का कॉलम:सरकार ‘आफस्पा’ रद्द नहीं करेगी, लेकिन जहां जरूरी है इसे वहीं लागू किया जाए

5 महीने पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

नागालैंड में म्यांमार की सीमा पर मोन जिले में हुई मौतों को दुर्भाग्यपूर्ण बताकर चुप हो जाना सुविधाजनक झूठ और बहाना ही होगा। यह हमारे नागा भाइयों को तो नहीं ही जंचेगा। विश्व स्तरीय सेना, जिसका शानदार इतिहास रहा हो, उसकी कोई यूनिट देश के किसी हिस्से में किसी वाहन पर बिना जांच किए क्या इस तरह ताबड़तोड़ गोलियां बरसा सकती है? उत्तर-पूर्व के सीमावर्ती क्षेत्र, खासकर वे राज्य जहां विद्रोह का इतिहास रहा हो, दूरदराज में होने की यातना भुगतते रहे हैं।

यह इलाका देश के ‘मुख्य भाग’ और राष्ट्रीय मीडिया से बहुत दूर है, यहां के लोग बहुत गरीब और पिछड़े हैं, तो यह सब किसे पता लगेगा? इसके अलावा, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आफस्पा) भी अहंकार को जन्म देता है। भाजपा की नागालैंड शाखा समेत उत्तर-पूर्व की अधिकतर प्रमुख राजनीतिक पार्टियां ‘आफस्पा’ को रद्द करने की मांग करती रही हैं। मेघालय और नागालैंड में भाजपा के गठबंधन के सहयोगी दलों के मुख्यमंत्री भी यह मांग करते रहे हैं।

इस कानून की ये तीन क्रूर सच्चाइयां हम जान चुके हैं:
1. ये वारदात नहीं होती अगर इस कानून के तहत मनमानी करने और उसकी जवाबदेही से बच निकलने का अधिकार न मिला होता। तब सेना की यूनिट को स्थानीय मजिस्ट्रेट और पुलिस को भरोसे में लेकर उन्हें साथ लेना पड़ता।
2. आफस्पा रद्द करने का वक्त आ गया है। कम-से-कम अपने वर्तमान और मनमाने रूप से लागू किए जाने की छूट के कारण यह न तो सेना के काम का है और न राष्ट्र हित में है।
3. सबसे कठोर सच यह है कि इन सबके बावजूद यह कानून रद्द होने वाला नहीं। किसी राजनीतिक दल ने भी इस पर विचार नहीं किया। न ही यूपीए ने 10 साल तक कुछ किया।

फिर भी, एक उपाय है। नागालैंड में इस भयानक कांड के बाद अगर इस पर जोर नहीं दिया जाता तो हम एक मौका गंवा देंगे और यह देश के हित में नहीं होगा। चूंकि कानून रद्द नहीं किया जाएगा, इसलिए इसके मामले में ‘जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल’ सिद्धांत की संभावना पर विचार करना चाहिए। आज जहां यह कानून लागू है, वे इलाके हैं- 1. जम्मू-कश्मीर, असम और नागालैंड के पूरे केंद्रशासित प्रदेशों और राज्यों में।

2. इंफाल नगरपालिका क्षेत्र को छोड़ पूरे मणिपुर राज्य में। 3. अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी जिलों तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग में और नामसाई जिले के नमसाई और महादेवपुर पुलिस थाना क्षेत्रों में। हम जम्मू-कश्मीर की स्थिति समझ सकते हैं। पाकिस्तानी सीमा होने के कारण यह सक्रिय फौजी क्षेत्र है। राजनीतिक रूप से भी यह इतना संवेदनशील है कि कोई भी सरकार यहां सुरक्षा संबंधी नीति में नरमी बरतती दिखना नहीं चाहेगी। लेकिन क्या सशस्त्र बलों को हर जगह ऐसे ही अधिकार चाहिए?

मणिपुर में सीमावर्ती इलाकों में छिटपुट वारदातें होती रहती हैं। दुर्भाग्य से हाल ही में चूड़चंद्रपुर जिले में असम राइफल्स के कमांडिंग अफसर, उनकी पत्नी, बेटे और चार जवानों को मार डाला गया। लेकिन व्यापक दायरे में देखें तो इस राज्य का अधिकांश भाग कुल मिलाकर शांतिपूर्ण रहा है। इसमें तंगखुल जिले को भी शामिल किया जा सकता है, जो कभी नागा विद्रोह का केंद्र हुआ करता था। अब विवेकपूर्ण कदम यही होगा कि राज्य में म्यांमार की सीमा से लगे इसके 25-30 किलोमीटर क्षेत्र को छोड़कर अधिकांश हिस्से से आफस्पा हटा लिया जाए।

सवाल है कि पूरे असम को आफस्पा के अंदर क्यों रखा जाए? वहां कभी कभार, कम क्षमता के विस्फोट हो रहे होंगे लेकिन इस तरह के इक्का-दुक्का विस्फोट पंजाब सहित देश के कई दूसरे इलाकों में भी होते हैं। पंजाब मेंं 1983 से 1997 तक आफस्पा रहा। जब आतंकवाद खत्म हुआ, आफस्पा को भी हटा लिया गया। असम को इससे क्यों वंचित रखा जाए?

उल्फा लगभग खत्म हो चुका है। बोडो विद्रोह शांत हो चुका है, उसके अधिकतर लोग मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हो गए हैं। अगर बोडो इलाकों में गड़बड़ी होती है या उत्तरी कछार हिल्स इलाके में बाकी बचे आदिवासी बागी गुट उपद्रव करते हैं, तो अर्द्धसैनिक बल जैसे मध्यभारत में नक्सलियों से जैसे लड़ते हैं, वैसे ही यहां कार्रवाई नहीं कर सकते? अगर इस विद्रोह से आफस्पा के बिना लड़ा जा सकता है, तो इनसे कहीं अधिक शांतिपूर्ण असम पर इसे क्यों थोपा जाए?

यही बात नागालैंड पर लागू होती है। बागी आदिवासी समुदायों ने 1975 के शिलांग शांति समझौते के बाद भारतीय संविधान को कबूल कर लिया और मुख्यधारा में शामिल हो गए। जो गुट भूमिगत हो गया और जब-तब लड़ता रहा उस एनएससीएन (आई-एम) गुट ने 1997 में युद्धविराम समझौते पर दस्तखत कर दिया।

इसके बाद करीब 25 साल से इस राज्य में पूरी शांति है। यहां तक कि उत्तर-पूर्व में मिजोरम को 1986 में शांति समझौते के बाद आफस्पा से मुक्त कर दिया गया। मुझे याद नहीं है कि करीब दो दशक से नागालैंड में सेना ने पहल करके कोई ऑपरेशन किया हो। तब पूरे राज्य को स्थायी तौर पर आफस्पा की गिरफ्त में क्यों रखा जाए?

आप अभी भी चाहेंगे कि राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में एनएससीएन-के जैसे इक्का-दुक्का गुटों की, जिन्होंने युद्धविराम को कबूल नहीं किया है, गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ‘आफस्पा’ लागू रखा जाए। मोन में जो बेकसूर लोग मारे गए उन पर ऐसी ही गतिविधियों में शामिल होने का शक था इसी तरह, अरुणाचल प्रदेश के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए भी यही सोचा जा सकता है क्योंकि सामरिक दृष्टि से वे काफी संवेदनशील हैं, वे म्यांमार के करीब के और आदिवासी कबीलों के ऐसे क्षेत्र हैं जो कम निगरानी में हैं। लेकिन बाकी 90 फीसदी नागालैंड से आफस्पा को बेहिचक हटाया जा सकता है।

देश के कई हिस्सों में यह केवल इसलिए लागू है कि कानून से मिले अधिकार एक तरह से नशीले होते हैं। वैसे भी भाव यह होता है कि क्या फर्क पड़ता है, भुगतना तो उत्तर-पूर्व के छोटे-से आदिवासियों को पड़ रहा है और फिर भी हम सवाल उठाते हैं कि वहां के लोगों में अलगाव की भावना क्यों है। इस सवाल को घुमा कर देखें। भारत में कश्मीर के बाहर बगावत सिर्फ आदिवासी नक्सल क्षेत्रों में हैं।

पिछले एक दशक में वहां हर साल जितने गुमनाम लोग मारे गए हैं उतने कश्मीर में भी नहीं मारे गए। फिर भी इसका मुकाबला केवल अर्द्धसैनिक बलों के जरिए क्यों कर रहे हैं? उन्हें हम आफस्पा की सुरक्षा क्यों नहीं दे रहे हैं? जवाब सीधा-सा है। यह मुख्य क्षेत्र है। क्या इसका अर्थ यह है कि उत्तर-पूर्व के आदिवासी या कश्मीरी कम भारतीय हैं? अब, मेरे साथ उत्तर-पूर्व चलिए। पड़ोस का पूर्वी पाकिस्तान 1971 में भाप बनकर उड़ गया। अब काफी करीबी दोस्त बांग्लादेश है, तो फिर, उत्तर-पूर्व को शांति का लाभ क्यों न मिले? इसलिए कि आफस्पा सत्ता का एक घातक नशा है।

ऐसे अधिकार जरूरी हैं?
जम्मूू-कश्मीर की स्थिति समझ सकते हैं। पाकिस्तानी सीमा होने के कारण यह सक्रिय फौजी क्षेत्र है। राजनीतिक रूप से भी यह इतना संवेदनशील है कि कोई भी सरकार यहां सुरक्षा संबंधी नीति में नरमी बरतती दिखना नहीं चाहेगी। लेकिन क्या सशस्त्र बलों को हर जगह ऐसे ही अधिकार चाहिए? भाजपा की नागालैंड शाखा समेत उत्तर-पूर्व की अधिकतर प्रमुख राजनीतिक पार्टियां ‘आफस्पा’ को रद्द करने की मांग करती रही हैं। मेघालय और नागालैंड में भाजपा के गठबंधन के सहयोगी दलों के मुख्यमंत्री भी यह मांग करते रहे हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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