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शमिका रवि का कॉलम:सरकार की वित्तीय प्रतिक्रिया; लोगों को कैश मदद देने से नहीं, सरकार के खर्च से बढ़ेगी मांग

एक महीने पहले
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शमिका रवि, प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की पूर्व सदस्य - Dainik Bhaskar
शमिका रवि, प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की पूर्व सदस्य

अगर हम कोविड-19 के सिर्फ कंफर्म केस की बात करें तो वे काफी तेजी से घट रहे हैं। लेकिन जब हम मृतकों की संख्या देखते हैं तो अभी भी औसत संख्या 3000 मौतें हैं। यह बड़ी संख्या है। लेकिन हर जगह सरकारें संख्या छिपाने की कोशिश कर रही हैं, ऐसा भी सही नहीं है। कई जगह उनके पास आंकड़े इकट्‌ठे करने की क्षमता नहीं है।

अब कई राज्यों में डेटा रीकंसीलिएशन (आंकड़ों का मिलान) हो रहा है। इसे और बढ़ावा देना चाहिए। यह होता है क्योंकि सरकार के पास रियल टाइम में मृत्यु पंजीकरण की क्षमता नहीं है। पहली लहर में जब पीक था, तब 1500 मौतें होती थीं। तो दूसरी लहर संभली तो है, लेकिन यह नहीं कह सकते कि इसका असर खत्म हुआ है।

दूसरी लहर के कमजोर पड़ने के साथ अर्थव्यवस्था की रिकवरी भी बात भी हो रही है। दूसरी लहर में आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं और लगभग सभी जगह आर्थिक मोबिलिटी (लोगों का आवागमन) कम हुई। जब तक अर्थव्यवस्था से जुड़े स्पष्ट आंकड़े नहीं आते, यह मोबिलिटी अर्थव्यवस्था की स्थिति का कुछ अंदाजा दे सकती है।

मोबिलिटी यानी लोग कितना चले-फिरे, रेस्त्रां में कितना जा रहे हैं, घूमने-फिरने कितना जा रहे हैं आदि। पहले अप्रैल से यह मोबिलिटी बिल्कुल क्रैश हो गई। तब तक राज्यों ने लॉकडाउन नहीं किए थे, लेकिन संक्रमण इतना बढ़ गया था कि लोगों ने खुद ही मोबिलिटी कम कर दी। अब जून के पहले हफ्ते से मोबिलिटी फिर बढ़ी है। यह करीब माइनस 67% पर पहुंच गई थी। अब पिछले तीन हफ्तों में बढ़कर करीब माइनस 40% के पास हैं।

इधर यह बात भी हो रही है कि सरकार की क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए। यह प्रतिक्रिया भी वैज्ञानिक होनी चाहिए। हमने जो रिसर्च की उसमें साफ नजर आ रहा है कि शुरुआत में जो बहुत गरीब, 40% आबादी थी, सबसे ज्यादा उन्हीं की खपत (कंजम्पशन) में गिरावट आई थी। खपत यानी आप एक हफ्ते में कितना खर्च करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे महामारी बढ़ी, सभी वर्गों की खपत गिरी।

इसमें शीर्ष 20% की तो फिर भी रिकवरी हो गई, लेकिन जो नीचे के 80% हैं, जिसमें मध्यमवर्ग भी शामिल है, उनकी रिकवरी नहीं हुई। इसमें मध्यमवर्ग पर भी ध्यान देना जरूरी है क्योंकि अब तक जो वित्तीय सहायता, खाद्य सहायता है, वो नीचे के 30-40% तक को ही मिली है।

मध्यम आय वालों की 30-35% खपत गिरी है, जो लगभग गरीबों के ही बराबर है। भले ही उनके खर्च का स्तर अलग-अलग हो, पर खपत में गिरावट हुई है इसलिए मध्यमवर्ग को भी मदद चाहिए। इसलिए सरकार जो भी वित्तीय प्रतिक्रिया सोचे, उसमें सिर्फ 20% गरीबों के साथ मध्यमवर्ग को भी लक्ष्य बनाए।

इसे कैसे करें, यह मुद्दा है। इसके लिए पहले जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) को विस्तार दिया जाए। अभी जो अतिरिक्त अनाज दिया जा रहा था, उसे अब 80% आबादी को देना चाहिए। देश में 80% आबादी अमीर नहीं है इसलिए पीडीएस को मध्य आयवर्ग तक विस्तार दिया जाए। दूसरा आ‌वश्यक सामग्रियों पर जीएसटी में कुछ राहत दी जाए। यह अभी जरूरी है। लेकिन एक बारीक बात समझना बहुत जरूरी है कि नकद सहायता देना उचित विकल्प नहीं है।

इसकी बहुत मांग हो रही है कि सीधे लोगों के हाथ में नकद हस्तांतरण हो। लोगों को नकद दे भी देंगे तो वे खर्च किसपर करेंगे? ज्यादातर घरों में बंद हैं, कहीं आ-जा नहीं रहे। जो आधारभूत जरूरतें, भोजन आदि है, वही खरीद रहे हैं। आप नकद देंगे तो वह मुश्किल वक्त के लिए बचत बन जाती है। लोग खर्च नहीं करते, सेविंग कर लेते हैं।

नकद सहायता से मांग नहीं बढ़ेगी। इसके लिए सरकार को इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करना होगा। सरकार ने फरवरी में बजट में जो इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च की घोषणा उसे अब जमीन पर लागू किया जाए। अनिश्चित समय में निजी खपत नहीं बढ़ेगी क्योंकि ऐसे समय में लोग खर्च नहीं, बचत करते हैं। इसलिए आर्थिक गतिविधि बढ़ाने के लिए सरकार को खर्च करना होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च यानी ऐसी चीजों पर खर्च जो निवेश और उत्पादकता बढ़ाएं। इसमें रोड, स्कूल आदि लेकर स्वास्थ्य सुविधाएं और सेंट्रल विस्टा तक शामिल हैं। सरकार द्वारा खर्च करना ही उपाय है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)