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योगेन्द्र यादव का कॉलम:सरकारें कोरोना त्रासदी पर परदा तो न डालें, सरकारों द्वारा कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े छुपाना दुर्भाग्यपूर्ण है

4 महीने पहले
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योगेन्द्र यादव, सेफोलॉजिस्ट और अध्यक्ष, स्वराज इंडिया - Dainik Bhaskar
योगेन्द्र यादव, सेफोलॉजिस्ट और अध्यक्ष, स्वराज इंडिया

पहले संकेत दिखे, फिर अनुमान आए और अब प्रमाण भी मिलने लगे हैं। इसमें संदेह नहीं कि कोरोना की दूसरी लहर में देश में हुई मौत पिछले सौ वर्ष में किसी भी देश में हुई सबसे बड़ी त्रासदी बनने वाली है। साल पूरा होते-होते मृतकों की संख्या 25 से 50 लाख तक कहीं भी पहुंच सकती है। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे शर्मनाक अध्याय में शामिल होने जा रहा है।

पिछले सप्ताह ‘दैनिक भास्कर’ में मध्य प्रदेश में मौत के जो आंकड़े छपे, वह सबसे विश्वसनीय और खौफनाक आंकड़े हैं। उसके बाद उसी पत्रकार रुक्मिणी एस ने आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु के आंकड़े सार्वजनिक कर दिए हैं। सब को जोड़कर पहली बार पूरे देश में दूसरी लहर में हुई मौत के आंकड़ों का मोटा अनुमान लगाया जा सकता है।

यह दो-चार शहरों के आंकड़ों पर आधारित अनुमान नहीं हैं। अब हमें मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से पूरे राज्य के हर जिले व तहसील में हुई मौत के आंकड़े मिल गए हैं। ये आंकड़े सरकार के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम पर आधारित है जो भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा संचालित है।

संयोग से ये दोनों राज्य कुलमिलाकर देश की औसत तस्वीर पेश करते हैं। यह दोनों राज्य न तो देश के महामारी के सबसे बुरी तरह शिकार राज्यों (जैसे महाराष्ट्र या दिल्ली) में हैं, और न ही सबसे बेहतरीन प्रबंधन (तमिलनाडु, केरल) का नमूना हैं। इन दोनों के औसत के आधार पर पूरे देश में हुई मौतों का अनुमान लगा सकते हैं।

सिर्फ एक महीने की कहानी समझ लीजिए। ‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में पिछले साल मई के महीने में 34,320 मौतें हुई थीं। इस साल मई में 1,64,838 की मौत की खबरें आ चुकी हैं। यानी सामान्य से करीब पांच गुना ज्यादा मौत मई में हुई। आंध्र का आंकड़ा कमोबेश यही कहानी बताता है। आंध्र में सामान्यतः मई महीने में 27,100 मौत होती हैं, लेकिन इस वर्ष 1,39,273 मौत हुई, यानि यहां भी 4.8 गुना ज्यादा।

अब जरा देखिए, भारत सरकार के मुताबिक पिछले डेढ़ साल से पूरे देश में कोरोना महामारी में 3 लाख 70 हजार लोग मरे हैं। जबकि यहां सिर्फ दो राज्यों में, सिर्फ एक महीने में 2 लाख 60 हजार अतिरिक्त मौत होने का अनुमान है। बेशक, सारी अतिरिक्त मौत कोरोना से नहीं हुई होंगी। इन दिनों अस्पतालों पर बोझ और ऑक्सीजन संकट की वजह से अन्य बीमारियों के मरीजों की कुछ मृत्यु भी हुई है। लेकिन इन दिनों सामान्य से अधिक इतनी ज्यादा मौत होने का प्रमुख कारण कोरोना ही हो सकता है।

अगर हम मान लें कि मप्र और आंध्र का औसत बाकी देश पर लागू किया जा सकता है तो हम पूरे देश में पिछले महीने में हुई अतिरिक्त मौत का अनुमान लगा सकते हैं। पिछले साल पूरे देश में प्रतिमाह औसतन कोई 6 लाख मौत का आंकड़ा था। अगर मई में मप्र और आंध्र प्रदेश की तरह देशभर में सामान्य से 4.8 गुना ज्यादा मौत हुईं तो पूरे देश में लगभग 29 लाख मौत हुई होंगी, यानी सामान्य से 23 लाख ज्यादा। अगर इसमें सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम में दर्ज करने की देरी या कमी का अनुमान भी जोड़ दें तो एक महीने में मौत का आंकड़ा 27 लाख के करीब हो सकता है।

अब इस आंकड़े में बाकी महीनों का हिसाब भी जोड़ दीजिए। मप्र और आंध्र प्रदेश के आंकड़ों के अनुसार शीर्ष तक पहुंचने से पहले जनवरी, फरवरी, मार्च व अप्रैल के 4 महीने में मौत की संख्या सामान्य से औसतन 1.4 गुना अधिक थी। शीर्ष से उतरने के चार महीने, जून से सितंबर तक भी ऐसी ही स्थिति होने की आशंका है।

इन चार महीने में भी मौत सामान्य से 1.4 गुना ज्यादा हो सकती है। इस हिसाब से ग्राफ की चढ़ाई और उतराई के इन आठ महीनों में कुल 20 लाख के करीब मौत का अनुमान बैठता है। इसमें मई के महीने का आंकड़ा भी जोड़ दें तो दूसरी लहर में कुल मौत की संख्या लगभग 47 लाख पहुंच सकती है।

देश के स्तर पर यह अभी भी एक अनुमान है, प्रमाणिक आंकड़ा नहीं। अभी यह कहना कठिन है कि संख्या 47 लाख या उससे ऊपर या कुछ कम पर रुकेगी, या 20 से 30 लाख के बीच में रुक जाएगी। यह इस पर निर्भर करेगा कि बाकी राज्यों के आंकड़े मप्र व आंध्र से बेहतर होते हैं या बदतर। लेकिन इसमें शक नहीं कि मौत के सरकारी आंकड़े हास्यास्पद हैं। अब तक अंतराष्ट्रीय संस्थाओं और मीडिया के अनुमान भी इस नरसंहार को कम कर आंकते हैं। हमें लाखों नहीं दसियों लाख मौतों की बात करनी चाहिए।

इस सिलसिले में कम से कम सरकार की एक जिम्मेदारी बनती है कि वह पूरे देश में मौत के आंकड़ों का सिविल रजिस्ट्रेशन का आंकड़ा सार्वजनिक कर दे। इन आंकड़ों की जांच के लिए केंद्र सरकार प्रति माह सैंपल सर्वे भी करवाती है। यह भी जरूरी है कि पिछले 5 महीने के इस सर्वे के आंकड़े भी तुरंत सार्वजनिक किए जाएं।

सबसे बड़ी त्रासदी!
इसमें संदेह नहीं कि कोरोना की दूसरी लहर में देश में हुई मौत पिछले सौ वर्ष में किसी भी देश में हुई सबसे बड़ी त्रासदी बनने वाली है। साल पूरा होते-होते मृतकों की संख्या 25 से 50 लाख तक कहीं भी पहुंच सकती है। इस भयानक त्रासदी को सरकारें रोक नहीं पाईं तो कम से कम उस पर परदा तो न डालें। देश इतनी उम्मीद तो कर सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)