एन. रघुरामन का कॉलम:‘ग्रीन’ ही गरीबी और प्रदूषण दूर करने का साझा उपाय है

15 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

वह हरियाली से भरपूर घाटी थी। फिर भी कैलिफोर्निया के पास सन होआकिन घाटी के आर्थिक रूप से पिछड़े इस हिस्से के रहवासी श्वास संबंधी बीमारियों से जकड़े थे, क्योंकि अधिकारियों ने 4 ईंधन रिफायनरी को राज्य के वायु गुणवत्ता नियम के पूरी तरह पालन से छूट दी थी।

उन्होंने सोचा होगा कि दूसरे कारणों के बीच रिफायनरी से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और वे गरीबी से बाहर आ सकेंगे। चूंकि ये निचले तबके के हिसपेनिक समुदाय वालों का इलाका है, जहां बहुत सारे विदेशी मजदूर हैं, अधिकारियों को लगा होगा कि वे कुछ नहीं कहेंगे। यहां खिड़की-दरवाजे बंद होने के बावजूद कच्चे तेल की गंध घरों के अंदर आती है और सांस लेना मुश्किल हो जाता है।

बाद में एक शोध में साबित भी हुआ कि वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य परिणामों और गैर-स्वास्थ्य परिणामों, दोनों पर प्रभाव पड़ता है और ये हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी पर भी असर डालता है। उदाहरण के लिए अगर कोई किसान बहुत ज्यादा वायु प्रदूषूण के संपर्क में रहे, तो इससे शायद अस्थमा न बिगड़े, पर इससे सांस लेने में तकलीफ हो सकती है या हृदय गति में परिवर्तन हो सकता है, जिससे काम करने की क्षमता पर असर पड़ता है और जो अंतत: प्रदर्शन पर असर डालता है।

आश्चर्य नहीं कि राज्य के अटॉर्नी जनरल ऑफिस ने स्थानीय लोगों का समर्थन किया है और पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन के ऑफिस ने पूरे अमेरिका के हद से ज्यादा पिछड़े समुदायों की रक्षा के लिए ‘कैलिफोर्निया एनवॉयरमेंट स्क्रीन’ मॉडल दोहराने पर काम शुरू कर दिया है। इस हफ्ते मानव सेवा मंत्रालय प्रदूषण-गरीबी के बीच रहने वाले समुदायों की रक्षा के लिए हर उपाय पर काम करेगा।

दुनिया में आर्थिक रूप से संघर्षरत आस-पड़ोस को अधिकारी कम आंकते हैं और अमेरिका अपवाद नहीं। ऐसा पहली बार हो रहा है कि दबे समुदायों की रक्षा के लिए संघीय पर्यावरण रक्षा एजेंसी व राज्य के बीच साझेदारी हो रही है। पर इस रविवार को कर्जत स्थित ‘कर्नल फार्म’ की यात्रा से मेरा ये पक्का नजरिया बदल गया।

थोड़ी प्रदूषित मुंबई से 100 किमी दूर इस जगह पर बॉलीवुड की टॉप हस्तियों से लेकर राजनैतिक परिवारों जैसे ठाकरे के हरियाली से भरे, पहाड़ों से घिरे, आसपास बहती नदी के बीच छोटे-छोटे अपने ‘स्वर्ग-से’ जमीन के टुकड़े हैं। बाहरी लोगों के लिए भी खुला सेवानिवृत्त कर्नल सुनील शर्मा का फार्महाउस ये सीखने के लिए मेरे लिए क्लासरूम-जैसा था कि कैसे हरी-भरी जमीन का छोटा-सा टुकड़ा लेकर भी हम आस-पड़ोस के इलाकों को न सिर्फ गरीबी बल्कि प्रदूषण से भी बचा सकते हैं, जिसे हम औद्योगीकरण के नाम पर शहरों में ले आए हैं।

आमतौर पर कम से एक एकड़ से ज्यादा जमीन पर फैले फार्म माली, गार्ड से लेकर सफाईकर्मी, रसोइए मिलाकर दर्जन भर लोगों को रोजगार देते हैं। और वे सब आसपास के गांवों से आते हैं। दिलचस्प रूप से इन गरीबों की अंगुलियां जादुई होती हैं, जो इलाके को और ज्यादा हरा-भरा बना देती हैं और फार्म की सुरक्षा के प्रति भी वफादार होते हैं।

मैंने वाकई में सीखा कि कैसे आधुनिक उपकरणों, जिनके साथ हमने जीवन जीना सीख लिया है और प्रकृति की प्रचुरता के बीच संतुलन बनाया जाए, जो हमें स्वस्थ व लंबी उम्र का वरदान देती है। मैं तो कहूंगा कि हम शहरी लोगों को ऐसी जगहों पर जरूर जाना चाहिए।

फंडा ये है कि हममें से अधिकांश लोगों को पता भी नहीं कि आपका हरा (बिना प्रदूषण की जीवनशैली पढ़ें) कितनों की जिंदगी हरा-भरा (स्वस्थ और समृद्ध पढ़ें) कर सकता है। ये इसलिए क्योंकि ग्रीन ही गरीबी और प्रदूषण दूर करने का साझा उपाय है। बस, अलग होने के लिए एक नजरिया चाहिए।

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