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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:भारत में ग्रीष्म काल अवाम के लिए कठिन समय, नागपुर, अमरावती, खंडवा और बुरहानपुर बहुत अधिक तपते हैं

20 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

टी.एस. इलियट की पंक्ति का अनुवाद है कि अप्रैल क्रूरतम मास है, पलाश के पत्तों में खून उतर आता है। पलाश के पत्ते ग्रीष्म काल में लाल रंग के हो जाते हैं। भारत में ग्रीष्म काल अवाम के लिए कठिन समय होता है। नागपुर, अमरावती, खंडवा और बुरहानपुर बहुत अधिक तपते हैं और पारा 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इन स्थानों का अवाम प्रातः 6 से 10 और रात 7 बजे से 10 बजे तक काम करता है। दोपहर को कोई घर से बाहर नहीं निकलता, क्योंकि इस समय लू चलती है।

ग्रीष्म काल में गर्म हवाओं को सिरोको कहा जाता है। ये मध्य एशिया के रेगिस्तान क्षेत्र की हवाएं हैं। ज्ञातव्य है कि ‘सिरोको’ नामक फिल्म भी बनी थी, जिसके कुछ अंश अश्लील थे और सेंसर ने काट दिए थे, परंतु जाने कैसे हटाए गए दृश्यों को शामिल करके प्रिंट बने और फिल्म प्रदर्शित भी हुई। सेंसर द्वारा हटाए गए सीन को गैर कानूनी ढंग से जोड़े जाने को इंटरपोलेशन कहा जाता है। सभी स्थानों के रेगिस्तान अलग-अलग होते हैं।

राजस्थान में रेगिस्तान के निकटवर्ती क्षेत्रों में तापमान सुलगते हुए निमाड़ से कम होता है। रात में ठंडी हवाएं चलती हैं। मनुष्य दचका खाता है, परंतु गिरता नहीं है। राजस्थान में फिल्मों की शूटिंग का इतिहास पुराना है। श्रीदेवी अभिनीत फिल्म ‘लम्हें’ में गीत है ‘मोरनी बागा मा बोले आधी रातमा।’ ईला अरुण राजस्थानी लोकगीत-संगीत में रमकर गातीं और नृत्य भी करती रहीं। अगर हम गायन की भोजन की थाली से तुलना करें तो ईला अरुण, दाल -बाफले में खट्टी कढ़ी की तरह हैं, उनका गायन अचार की तरह भी माना जा सकता है।

सुभाष घई ने फिल्म ‘खलनायक’ में ईला को भी ‘चोली के पीछे क्या है’ गीत में शामिल किया था। पंजाब के किसानों द्वारा हड़ताल जारी है। मीडिया में इन्हें नदारद कर दिया गया है। इन तपते दिनों और सुलगती रातों में आंदोलनकारियों का रक्त, पसीना बनकर धरती पर गिर रहा है। क्या यह पसीना बीज बनेगा और नस्लों की फसल लहराएगी?

कुदरत का कमाल देखिए कि हेलीकॉप्टर में बैठकर रेगिस्तान देखें तो भ्रम होता है कि सागर देख रहे हैं, लहरें अठखेलियां कर रही हैं। हवाएं रेत को बहाकर छोटा पहाड़ सा कुछ बनाती हैं, जो कुछ क्षणों के लिए दिखता है, फिर नजरों से ओझल हो जाता है। कुदरत धरती के कैनवास पर चित्रकारी करती है। अप्रैल माह में जगह-जगह मतदान हो रहा है, गंगा किनारे मेलों में, चुनावी सभाओं में भीड़ आ रही है। किसी को कोरोना फैलने का डर नहीं है।

इन लोगों का व्यक्तिगत साहस पूरे समाज को कष्ट दे सकता है। कोई विश्वास से नहीं कह सकता कि कौन हैं ये लोग? क्या ये अंतरिक्ष से आए हैं। दरअसल इसमें कोई रहस्य नहीं है। ये हम लोगों में से ही आए हैं, अजनबी से लगते हैं परंतु हैं अपने ही लोग। इस वहशत का डी.एन.ए को खोजा जाना चाहिए। कुदरत का एक और कमाल देखिए कि आकाश में बादल घिर आते हैं तो कुछ पौधों में फूल खिल जाते हैं।

गौरतलब है कि बादल और जिसकी जड़ें धरती के भीतर हैं, उनमें भी अनाम सा रिश्ता है। अप्रैल माह का पहला सप्ताह चल रहा है और 29 दिन पश्चात चुनाव परिणाम घोषित होंगे। मतदान गणना का दिन पारंपरिक रूप से मजदूर दिवस माना गया है। वामपंथी विचारधारा का घोषणा पत्र उजागर किया गया है। यह सबके सामने सबके द्वारा बनाया गया कार्यक्रम है।

दूसरी ओर संकीर्णता के मेनिफेस्टो को सीक्रेट एजेंडा कहा गया। यथार्थ यह है कि उजागर होकर भी वह दुबका रहा, ये सीक्रेट होकर भी गुप्त नहीं रहा। प्रचंड प्रचार तंत्र की हवाएं सिरोको की तरह हैं। हम विचार प्रक्रिया का इंटरपोलेटेड फिल्म प्रिंट मान सकते हैं। याद आता है पुराना गीत, दोस्त दोस्त न रहा, प्यार-प्यार ना रहा, खुल गए भेद, सभी राज राजदार न रहा।

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