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नवनीत गुर्जर का कॉलम:क्या वाकई हमारे देश में कभी समानता पर भरोसा रहा है, हिंदुस्तान को आखिर और क्या चाहिए?

8 महीने पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन अभी-अभी भारत आए थे। रूस से याद आया, वहां किसी जमाने में साम्यवाद हुआ करता था और शामिल चौके हुआ करते थे। जज हो या चपरासी, सिंगल हों तो एक रूम किचन और परिवार वाला हो तो टू बेडरूम किचन अलॉट हुआ करते थे। तब वहां पद और पैसा महत्व नहीं रखता था। समानता की कद्र की जाती थी। जबसे ग्लास्तनोस्त ने सोवियत रूस का पलीता निकाला, दुनिया समानता के इस आदर्श को छूत की बीमारी मानने लगी।

सही है, भारत रूस का हमेशा से मित्र रहा है। मिखाइल गोर्बाच्योव के सोवियत संघ से आज के टुकड़ों में बंटे हुए रूस तक। लेकिन हकीकत तो यह है कि समानता पर हमारा भरोसा तब भी नहीं था, अब भी नहीं है। दरअसल, हमारे देश में गरीब, गरीब ही अच्छा लगता है और अमीर, और ज्यादा अमीर। गरीब की उन्नति होती है तो इतनी कि किसी सरकारी मेहरबानी के बावजूद अफसर रिश्वत लेने को मान जाए तो उसका चूल्हा लकड़ी की बजाय गैस से जलने लगता है। हालांकि, ये बात और है कि गैस एक बार खत्म होने के बाद वापस कुछ नहीं मिलता। लकड़ी और चूल्हा ही पहले की तरह साथ देते हैं। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में यह जरूर दर्ज हो जाता है कि इतनी महिलाएं चूल्हा फूंकने से बच गईं। देश की इच्छा पूरी। राष्ट्र समृद्ध और सत्ता मेहरबान।

अब आते हैं निम्न मध्यम और मध्यम वर्ग के हालात पर। यह एक ऐसा वर्ग है जिसका कोई धणी-धोरी नहीं। सरकार समझती है इसके पास कमाने-खाने के पर्याप्त साधन हैं। धनी लोग समझते हैं हमसे हर माह तनख्वाह तो पाता ही है।… और देश समझता है उसका कर्तव्य पूरा हो गया। दरअसल, इन मध्य और निम्न मध्यम घरों में झांकने की जुर्रत या सही मायनों में हिम्मत, कोई नहीं करता। न सरकार, न वो अभिजात्य वर्ग जिसके भरोसे, ये घर चलते हैं या जिनकी तथाकथित मेहरबानियों पर इनके चूल्हे जलते हैं!

दरअसल, मध्यम या खासकर, निम्न मध्यम घरों की एक खास गंध होती है। चारपाइयों के नीचे घुसाकर रखे हुए ट्रंकों और टीन के डब्बों की तरह हर समय घर में छिपकर बैठी हुई भी। खूंटी पर लटकते हुए मैले-कुचैले कपड़ों की तरह निशंक भी।… और राम-कृष्ण या हनुमान के कैलेंडरों की तरह घर की दीवारों पर अटल-अडिग तस्वीरों की तरह भी।

हर अमीर को गरीब, निम्न मध्यम और मध्यम वर्ग की यह पीड़ा सबसे बड़ा सुख देती है। यह भी कह सकते हैं कि गरीबों की यही पीड़ा सही मायनों में उन्हें वैचारिक रूप से धनवान बनाती है। इसीलिए, सिर्फ हिंदुस्तान में दिन-ब-दिन गरीब और गरीब तथा धनवान और धनवान होता जा रहा है।

यही वजह है कि भारत में पचास प्रतिशत आबादी की औसत आय 13 प्रतिशत घटकर 53,610 रुपए सालाना यानी मात्र चार हजार चार सौ सड़सठ रुपए मासिक रह गई है। अब हजार रुपए से महंगे गैस सिलेंडर और सौ रुपए से ज्यादा के पेट्रोल-डीजल के जमाने में बेचारे साढ़े चार हजार रु. महीना कमाने वाले की औकात क्या और बिसात क्या? बहरहाल, अयोध्या में मंदिर बन रहा है, कश्मीर से धारा 370 हट चुकी है। समानता कानून लाने की तैयारी है। हिंदुस्तान को आखिर और क्या चाहिए!

निम्न मध्यम और मध्यम वर्ग एक ऐसा वर्ग है जिसका कोई धणी-धोरी नहीं। सरकार समझती है इसके पास कमाने-खाने के पर्याप्त साधन हैं। धनी लोग समझते हैं हमसे हर माह तनख्वाह तो पाता ही है।… और देश समझता है उसका कर्तव्य पूरा हो गया।
● navneet@dbcorp.in

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