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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:प्रकृति की पुकार सुनिए, प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ हमारे स्वास्थ्य की भी रक्षा है

5 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

लंबे लॉकडाउन के बाद इस वक्त जब जिंदगी थोड़ी धीमी चल रही है, खामोशी से सुनिए प्रकृति क्या कहती है। हमारे स्वास्थ्य और प्रसन्नता का प्रकृति से सीधा संबंध है। किसी कवि ने लिखा है- ‘कर भला होगा भला, अंत भले का हो भला। चलती डगर ये दुनिया, एक आया एक चला।’ जाना सबको है। और, जब मालूम है कि जाना है तो जाने से पहले कुछ ऐसे काम करिए कि आने वाली पीढ़ी सुकून महसूस कर सके।

एक काम हो सकता है प्रकृति की रक्षा, उसके सम्मान का संकल्प। हमारे पास दस इंद्रियां हैं और प्रकृति के पास पंचतत्व (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश) हैं। इनका ठीक से तालमेल बैठाना प्रकृति के साथ-साथ हमारे स्वास्थ्य की भी रक्षा है। अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करिए। ये पुरुष की आरजू और स्त्री की तमन्ना को वासना के झूले में झुलाने में बड़ी माहिर होती हैं।

कछुआ इंद्रियों के नियंत्रण का प्रतीक है। समय आने पर जिस प्रकार वह पैरों को अपने कवच के भीतर समेटता है, ठीक ऐसे ही हम इंद्रियों का प्रयोग करें। कहा जाता है मेरूदंडधारी जानवरों में सबसे अधिक आयु कछुए की होती है। कुछ तो 300-400 साल तक जी लेते हैं। जो भी हो, हमें सिर्फ यह प्रतीकात्मक बात समझना है कि जिन लोगों ने इंद्रियों को नियंत्रित किया, प्रकृति का मान किया, वे जितना भी जीएंगे, बहुत अच्छे से जीएंगे।