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दीपेश सालगिया का कॉलम:हिंदी की यात्रा में उसके हमसफर; उर्दू, अंग्रेजी से तकनीक तक, इसके ऐतिहासिक साथी

11 दिन पहले
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दीपेश सालगिया, स्तंभकार और निदेशक, शापूरजी पालनजी रियल एस्टेट - Dainik Bhaskar
दीपेश सालगिया, स्तंभकार और निदेशक, शापूरजी पालनजी रियल एस्टेट

वैसे तो हिंदी भाषा की उम्र लगभग 1000 वर्ष है, पर खड़ी बोली की आयु तो सिर्फ 200 वर्ष है और अगर घटनापूर्ण इतिहास की बात करें तो जितने घटनापूर्ण हिंदी के लिए ये 100 वर्ष रहे हैं, उस उच्च स्तर का उतार-चढ़ाव किसी और भाषा ने कदाचित ही देखा होगा। 1920 के दशक में हिंदी की सबसे प्यारी हमसफर थी उर्दू।

असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन के आपसी तालमेल के दौरान, दोनों भाषाओं में प्रेम इतना गाढ़ा हो गया था कि बोलते वक्त पता नहीं चलता था कि कहां उर्दू खत्म हुई और हिंदी शुरू हो गई। बिना उर्दू के हिंदी भाषियों को हक की लड़ाई के लिए न वकील मिलता, न हलफनामा।

इसी तरह बिना हिंदी व्याकरण के उर्दू लड़खड़ा कर गिर पड़ती। भाव वाचक संज्ञाओं (जरूरत, मेहनत, मदद, मजबूरी) के लिए जहां हिंदी बे-झिझक उधार मांगने उर्दू के पास जाती, तो उर्दू हिंदी से क्रियाएं (बोलना, खाना, हंसना, खेलना) कर्ज पर लेती। इसी मोहब्बतनुमा माहौल को बंटवारे के ऐलान ने मलीन किया और साथ ही उर्दू के एक संप्रदाय-विशेष की भाषा होने का ऐलान भी कर दिया।

फिर क्या था, धीरे-धीरे उर्दू के साथ-साथ हिंदी भी सियासती रंगों में रंग गई। रंग इतने गहरे चढ़े कि जहां उर्दू ने संस्कृत, हिंदी, पंजाबी को अलविदा कर अरबी-साहेबजादे का जामा पहन लिया, वहीं हिंदी सिर्फ संस्कृत की बेटी बनकर रह गई और अरबी, उर्दू, प्राकृत से उसने फासले बढ़ा लिए। हिंदी को उसका नाम देने वाली फारसी से दूर कर दिया और उर्दू को जन्मभूमि से। एक समय तो लगने लगा कि हिंदी का भविष्य प्रांतीय भाषा के रूप में सिमट कर रह जाएगा।

वक्त का पहिया पलटा और 2000-2010 के दशक में हिंदी के प्रचार और प्रयोग में नई तेजी आई। इसका महत्वपूर्ण कारण बना तेजी से बढ़ता हिंदी फिल्म और टेलिविजन जगत। अधिक से अधिक ब्रांड भी उपभोक्ताओं तक संदेश पहुंचाने के लिए हिंदी प्रयोग करने लगे। कॉरपोरेट जगत को हिंदी में व्यावसायिक मूल्य दिखने लगा। लोकप्रियता की इस दौड़ में हिंदी की नई हमसफर बनी इंग्लिश। फिर दोनों के समन्वय से बनी हिंग्लिश। हिंग्लिश ने पहले विज्ञापन जगत में और फिर ओटीटी में नई क्रांति पैदा की। साथ ही, दक्षिणी प्रदेशों में भी लोग हिंग्लिश बोलने में सहज महसूस करने लगे।

2010-2020 के काल में हिंदी के इतिहास में फिर तेजी का रुख आया। जो हिंदी-भाषी जिंदगीभर हिंदी टाइपिंग या लेखन से कतराते रहे, वे मजेे से हिंदी टाइप करने लगे। अब हिंदी की टाइपिंग मात्र दो इंच की छोटी-सी स्क्रीन पर भी आसानी से हो जाती है। इसकी बदौलत टेक्स्टिंग और सोशल मीडिया मीम्स में हिंदी की दृश्यता में कई गुना वृद्धि हुई है। और हिंदी की इस नई उपलब्धि में उसकी हमसफर बनी तकनीक।

भाषा के इतिहास का मुआयना करने निकलते हैं अब भारत की सीमा से बाहर। मस्कट, दुबई और दोहा में हिंदी एक लिंक-भाषा के रूप में विशिष्ट स्थान बना चुकी है। कोई कहे कि आज इन शहरों में हिंदी समझने वालों की संख्या अरबी समझने वालों से ज्यादा है तो शायद अतिशयोक्ति न होगी।

अब जरूरी है कि हिंदी को शुद्धता की जंजीरों में बांधने का प्रयास न हो। बॉलीवुड को हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा के प्रयोग पर बहुत लताड़ा गया। पर उसी मिश्रित भाषा के बलपर बॉलीवुड ने पूर्वी व दक्षिण राज्यों में हिंदी का प्रचलन बढ़ाया और वैश्विक स्तर पर हिंदी को ग्लोबल सॉफ्ट पॉवर के रूप में प्रस्तुत किया। उसने मिश्रित हिंदी के जरिए बांग्लादेश, मालदीव, अफगान, तुर्की, मोरक्को, फिजी जैसे कई देशों में अपना झंडा गाड़ा है।

दूसरी बात, जब-जब हिंदी ने नए हमसफ़र से दोस्ती की उसकी लोकप्रियता को नई दिशा मिली। हिंदी को जरूरत है कि वह संस्कृत के आंचल से निकलकर, नए हमसफर का साथ ले और अपना खुद का वजूद बनाए। फिर वो नया हमसफर पुर्तगाली भाषा हो या फ्रेंच। अगर अंग्रेजी दूसरी भाषाओं का समावेश न करते हुए सिर्फ लैटिन पर निर्भर रहती तो क्या इतनी बड़ी हो पाती?

तालाब सिर्फ बरसाती पानी पर निर्भर होता है इसलिए उसका साम्राज्य सीमित रह जाता है। सागर की कोई सरहद नहीं होती। उसका काम तो सिर्फ़ एक भूखंड को दूसरे से जोड़ना होता है। सागर जिस तट को छूता है, वही तट उसका नया हमसफर हो जाता है। यह समय हिंदी को सागर बनाने का है, तालाब नहीं।

  • भाषा की लोकप्रियता व शुद्धता में समझौताकारी समन्वय होता है। जब-जब हिंदी को शुद्धता की जंजीरों में बांधा गया, तब-तब वह लोकप्रियता के पायदान पर नीचे खिसक गई।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)