अभय कुमार दुबे का कॉलम:भारतीय अर्थव्यवस्था का सिर बड़ा और बाकी शरीर दुर्बल है, यह आकृति कुपोषण के शिकार बच्चे जैसी है

6 महीने पहले
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अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस - Dainik Bhaskar
अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस

क्या हमें इसमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाएं कोरोना की मार से डगमगा रही हैं, उस समय सारी दुनिया के अरबपतियों की संपत्ति और संख्या में असाधारण बढ़ोतरी हो रही है? पिछले 12 महीनों में जब लॉकडाउन से आमदनियों और रोज़गारों में तेज गिरावट आ रही थी, तब अरबपतियों की आमदनी 5 खरब से बढ़कर 13 खरब डॉलर हो गई।

उनकी संख्या भी 700 से बढ़कर 2700 हो गई। यह चमत्कार कैसे हुआ? जब सभी जगह उत्पादन बंद था, पेट्रोल-डीज़ल नहीं बिक रहे थे, दुकानें बंद थीं, रखा माल बिकने की स्थिति भी नहीं था और जीडीपी का ग्राफ नीचे जा रहा था, तब अरबपतियों की तिजोरी में दिन दूने रात चौगुने डॉलर कहां से आ रहे थे?

इसका एक जवाब यह है कि महामारी से आई मंदी पलटने के लिए दुनियाभर में सरकारों ने अपने खजानों से करीब नौ खरब डालर के राहत पैकेजों के रूप में अर्थव्यवस्था में झोंके। बजाय इसके कि यह रकम जनता की जेब में जाती, और उससे बाज़ारों में मांग बढ़ती, यह तथाकथित राहत वित्तीय बाज़ारों (स्टॉक एक्सचेंज, सिक्योरिटी मार्केट, बॉन्ड मार्केट) में पहुंची। वहां शेयरों और प्रतिभूतियों के खेल के ज़रिये अरबपतियों की कुल आमदनी में शामिल हो गई। जो आठ खरब डॉलर बढ़े हैं, वे इन्हीं नौ खरब डॉलरों से आए हैं।

भारत भी इस मामले में अमेरिका, चीन, स्वीडन, फ्रांस और जर्मनी जैसा साबित हुआ। मसलन, भारत के दो उद्योगपति इसी दौर में इतने अमीर हो गए कि उन्होंने अमेरिका के जॉन रॉकफेलर को पीछे छोड़ दिया है। इन उद्योगपतियों में से एक की अमीरी 2020-21 के बीच भारत के कुल घरेलू उत्पाद की 2.8 फीसदी और दूसरे की 1.7 फीसदी हो चुकी है। जबकि रॉकफेलर (जो कभी दुनिया में सबसे अमीर माने जाते थे) के लिए यह केवल 1.6 फीसदी ही है।

हम जानते हैं कि जब सारा देश बंद था, अस्पतालों और दवाओं की दुकानों के अलावा केवल स्टॉक मार्केट के दरवाज़े खुले थे। इन्वेस्टमेंट करने-करवाने वाली फर्में और दफ्तरों में नियमित काम हो रहा था।

क्या यह सच्चाई आसानी से लोगों के गले उतरेगी? अमीरों की संख्या और संपत्तियों में यह ज़बरदस्त इजाफा उनकी उत्पादक गतिविधियों के कारण नहीं हुआ है। यह पूंजी के सट्‌टे की करामात है, और पूंजी जहां से आई है, वहां सट्टा खेलने के लिए नहीं भेजी गई थी। पूंजीवाद के ज़मीनी विकास के एक अध्येता को लग रहा है कि यह परिस्थिति पूंजीवाद के खिलाफ दुनियाभर में एक जज़्बाती लहर दौड़ा सकती है।

इस लिहाज़ से देखें तो भारतीय समाज में भी ऐसी भावनाओं और उन पर आधारित राजनीतिक गोलबंदी उभर सकती है। भारत के अरबपतियों की कुल संपत्ति हमारे जीडीपी के 20% के बराबर हो गई है। यानी, भारतीय अर्थव्यवस्था का सिर बड़ा है और बाकी शरीर छोटा और दुर्बल है। यह आकृति कुपोषण के शिकार बच्चे जैसी है। लेकिन, क्या कोई इस चेतावनी को सुन रहा है? ऐसी कोई संस्था या व्यक्ति दिखाई तो नहीं देता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)