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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:कब तक टिकेगी नेपाल में देउबा सरकार, अधर में लटकी नेपाल की राजनीति से भारत की दूरी ही अच्छी है

2 महीने पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दोनों की हालत बुरी कर दी है। उसने राष्ट्रपति के आदेश को दूसरी बार असंवैधानिक बताया। राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने पहले दिसंबर 2020 में और फिर मई 2021 में संसद भंग कर दी। दोनों बार उन्होंने ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री के.पी. ओली सदन में बहुमत सिद्ध नहीं कर सके। दोनों बार नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति के कदम को असंवैधानिक घोषित किया और इस बार नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा को प्रधानमंत्री की शपथ दिलाने का आदेश दे दिया।

नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री तो बन गए हैं लेकिन असली सवाल यह है कि उनकी सरकार कितने दिन टिक पाएगी? यह ठीक है कि उन्हें ओली की तरह नवंबर में संसद के चुनाव नहीं करवाने होंगे लेकिन क्या वे संसद में अपनी सरकार का बहुमत सिद्ध कर पाएंगे? नेपाली संसद के कुल 275 सदस्यों में से नेपाली कांग्रेस के सिर्फ 61 सदस्य हैं। बहुमत के लिए देउबा को नेपाल की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी, माधव नेपाल की एमाले, यादव-भट्टराई की जनता समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनमोर्चा जैसी पार्टियों से भी हाथ मिलाना होगा।

इन सभी पार्टियों के 149 सांसदों के हस्ताक्षर अपने समर्थन में देउबा ने राष्ट्रपति को भिजवाए थे लेकिन माधव नेपाल ने अपनी पार्टी के 23 सांसदों को अब इस गठबंधन से अलग कर लिया है। देखना यह है कि देउबा अपने समर्थन में 138 सदस्य कैसे जुटाएंगे? सर्वोच्च न्यायालय ने देउबा के लिए एक नई कठिनाई भी खड़ी कर दी है। उसने सांसदों के मतदान पर से ‘व्हिप’ का बंधन हटा लिया है यानी प्रत्येक सांसद जिसे चाहे, उसे अपना वोट दे सकेगा। दूसरे शब्दों में अब देउबा को पार्टियों के नेताओं को नहीं, प्रत्येक सांसद को मनाना होगा।

नेपाल में भी वंश, जाति, मजहब, क्षेत्र आदि का प्रभाव जरूरत से ज्यादा है। यह ठीक है कि देउबा के हाथों में सत्ता का लाॅलीपाॅप है। इसी लाॅलीपाॅप को दिखा-दिखाकर के.पी. ओली ने नेपाल की कई पार्टियों में फूट डलवा दी और अपनी सरकार काफी लंबी खींच ले गए। क्या ओली अभी भी चुपचाप बैठेंगे? वे चाहेंगे कि देउबा की सरकार ज्यों ही सदन में मतदान करवाए, वे उसे अल्पमत में धका डालेंगे। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला प्रकट होते ही ओली और देउबा ने अपने-अपने गठबंधनों की बैठकें तड़ातड़ बुलाई हैं।

देउबा के सामने बड़ी समस्या यह भी है कि अपने गठबंधन की लगभग आधा दर्जन पार्टियों में से किसे कौनसा मंत्रालय दे? ओली और प्रचंड के गठबंधन के टूटने का बड़ा कारण यह भी था कि ओली ने वसूली के लगभग सभी मंत्रालय अपने लोगों को दे रखे थे। इसके अलावा पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ इससे भी नाराज थे कि ओली से जो समझौता हुआ था कि दोनों नेता आधी-आधी अवधि में राज करेंगे, उसका भी ओली ने उल्लंघन किया।

हैरानी नहीं कि ऐसा ही समझौता देउबा व ओली अपने-अपने समर्थक नेताओं से दोबारा कर सकते हैं। जो नेपाली कांग्रेसी और माओवादी एक-दूसरे के कभी जानी दुश्मन थे, वे साथ आने तैयार हैं और जो नेपाली व मधेसी नेता एक-दूसरे पर खुलकर प्रहार कर रहे थे, उन्हें भी सत्ता की खातिर एक-दूसरे से हाथ मिलाने में एतराज नहीं है।

नेपाली पार्टियों का यही हाल विदेश नीति के मामले में भी है। ओली ने खुद को नेपाली राष्ट्रवाद का प्रखर प्रवक्ता सिद्ध करने और प्रचंड की भारत-विरोधी छवि को फीका करने के लिए लिपुलेख-विवाद खड़ा कर दिया और भारतीय जमीन को नेपाली नक्शे में दिखाकर उस पर संसद का ठप्पा भी लगवा लिया। उन्होंने नेपाली संसद में हिंदी बोलने और धोती-कुर्ता पहनने पर रोक लगवा दी।

चीन की महिला राजदूत हाउ यांकी प्रचंड और ओली के बीच मध्यस्थ बन गईं लेकिन जैसे ही अदालत ने ओली की खाट खड़ी की, ओली भारत की तरफ फिर झुकने लगे। यह अच्छा है कि नेपाल के इस आतंरिक दंगल से भारत ने खुद को अलग रखा है। नेपाल की राजनीति अभी अधर में लटकी हुई है। देउबा का दौर जितने दिन भी चले, यह बेहतर होगा कि नेपाल में अब जो भी सरकार बने, वह जोड़-तोड़ की बजाय जनता के स्पष्ट बहुमत से बने।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)