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अभय कुमार दुबे का कॉलम:सचिन वझे मामले का कितना असर?, सिर्फ एक गिरफ्तारी से वसूली का रैकेट बंद नहीं होगा

एक महीने पहले
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अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, दिल्ली में प्रोफेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक - Dainik Bhaskar
अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, दिल्ली में प्रोफेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक

जो लोग यह समझते हैं कि मुंबई पुलिस के सब इंस्पेक्टर सचिन वझे की गिरफ्तारी के बाद महाराष्ट्र में सैकड़ों करोड़ रुपयों की वसूली का राजनीतिक पुलिसिया रैकेट बंद हो गया होगा, वे गलतफहमी में हैं। इसी तरह वे लोग भी गलतफहमी में हैं, जो यह मानते हैं कि ऐसा रैकेट केवल मुंबई में ही चल रहा था, और दूसरे प्रदेशों में इस तरह का भ्रष्टाचार नहीं होता होगा। दरअसल, यह भारतीय राजनीति का एक अनकहा लेकिन सर्वज्ञात तथ्य है कि वोट के दम पर चुन कर आई सरकारें अपने प्रशासनिक अमले का इस्तेमाल इसी तरह की उगाही के लिए करती हैं।

जो सत्ताधारी जितना चतुर होता है, वह इस तरह के सुनियोजित भ्रष्टाचार का उतना ही मजबूत तंत्र तैयार कर लेता है। कुछ मुख्यमंत्रियों ने तो ‘सिंगल विंडो क्लियरेंस’ जैसे बंदोबस्त के जरिये राजनीतिक भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने का कमाल कर दिखाया है। इसका मतलब होता है लायसेंस, परमिट, ठेका या खरीद का आदेश एक ही जगह से मिलना, उसी जगह ‘कटमनी’ जमा कराना, और दी गई तारीख पर वहीं से अगला आदेश प्राप्त करना। व्यापारियों को इस तरह के इंतजाम से सुविधा होती है।

वे खुश रहते हैं कि इस हाथ कमीशन दे कर उस हाथ मुनाफा कमाया जा सकता है, और विभिन्न स्तरों पर एक से ज्यादा लोगों के बीच रिश्वत बांटने का झंझट भी नहीं करना पड़ता। मुंबई की खास परिस्थितियों को अगर अपवाद माना जाए तो भ्रष्टाचार की यह मशीन तकरीबन हर सरकार में लगातार चलती रहती है। एक चुनाव जीतते ही अगले चुनाव के लिए फंड जमा करने की कवायद शुरू हो जाती है।

सचिन वझे के पास एक नोट गिनने की मशीन मिली थी। ऐसी मशीनें हर प्रदेश की राजधानी में कुछ खास तौर से चिह्नित किए गए बंगलों या फ्लैटों में लगाई जाती हैं। जितना बड़ा प्रदेश होता है, उतने ही बड़े स्तर पर उगाही होती है। इतनी अधिक कि उसे हाथ से गिना ही नहीं जा सकता।

क्या यह भ्रष्टाचार बंद नहीं हो सकता है? हो सकता है। लेकिन उसके लिए गहन और विस्तृत चुनाव सुधार, पुलिस सुधार, प्रशासनिक सुधार और न्यायिक सुधार करने होंगे। कोई भी निज़ाम हर तीन दशकों में अपने कील-कांटे दुरुस्त करने की मांग करता है। लेकिन पिछले पचास साल से हमारा लोकतंत्र इस तरह के सुधारों से वंचित है।

नतीजे के तौर पर वह धीरे-धीरे भीतरी सडांध का शिकार हो गया है, सचिन वझे प्रकरण में से उसी की बदबू निकल रही है। राष्ट्रवाद और विकास के नाम पर चलने वाले राजनीतिक तंत्र की नींव खोखली हो चुकी है। यह एक ऐसा हमाम है जिसमें सब नेता और सारी पार्टियां एक साथ नहा रही हैं।

हो सकता है कि कोई नेता या अफसर व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हो, लेकिन उसे भी एक ऐसे तंत्र का संचालन करना पड़ रहा है, जो लाजिमी तौर पर भ्रष्ट है। 2011 से 2013 के बीच इस देश में एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चला था- क्या सचिन वझे प्रकरण वैसे ही किसी आंदोलन को जन्म दे सकता है?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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