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लेफ्टि. जनरल एसए हसनैन का कॉलम:1971 में पाकिस्तान पर जीत की रूपरेखा कैसे तैयार हुई, 16 दिसंबर को ऐतिहासिक जीत के 50 साल

6 महीने पहले
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लेफ्टि. जनरल एसए हसनैन, कश्मीर में 15वीं कोर के पूर्व कमांडर - Dainik Bhaskar
लेफ्टि. जनरल एसए हसनैन, कश्मीर में 15वीं कोर के पूर्व कमांडर

16 दिसंबर 1971 का दिन...भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण। ज्यों-ज्यों हम इसकी 50वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहे हैं, ये आधुनिक भारत के इतिहास का भावनात्मक लम्हा बनता जा रहा है। देश के अधिकांश लोगों को नहीं पता कि वह जीत कैसे हासिल हुई। यह आलेख मैंने ऐसे समय में लिखा है, जब इतिहास के उस सुनहरे अध्याय का जश्न मनाया जा रहा है और इसे जानना जरूरी है।

मार्च 1972 में दो घटनाओं ने पाकिस्तान (पूर्वी हिस्से में कहें तो ज्यादा ठीक होगा।) में संकट बढ़ा दिया। पहला बंगाल की खाड़ी में उठे भयंकर चक्रवाती तूफान ‘भोला’ ने पूर्वी पाकिस्तान में 5 लाख लोगों की जान लेकर उसे तबाह कर दिया। ऐसी स्थिति में भी पाकिस्तानी सरकार का रवैया ढुलमुल, असंवेदनशील और नाकाफी था और इसने असंतुष्ट बंगालियों को और परेशान कर दिया। उन्हें पहले से ही उर्दू ज़ुबान पश्चिमी पाकिस्तानियों से दिक्कत थी, जो बंगाली उप-राष्ट्रवाद की भावना की कद्र नहीं करते थे, ये असल में विश्वास नहीं बल्कि संस्कृति के कारण था।

इसके बाद आम चुनाव हुए और पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग आसानी से जीत गई। ना तो जुल्फिकार भुट्‌टो और ना ही भ्रष्ट सेना प्रमुख और राष्ट्रपति याह्या खान इसकी कल्पना कर सकते थे कि कोई बंगाली नेता पाकिस्तान पर राज करे। भावनाएं जुड़ने में 24 साल लगे और हालात नियंत्रण से बाहर होते ही भावनाएं भी मुंह के बल गिर गईं। भारतीय सेना और भारतीय नेतृत्व के रणनीतिक दृष्टिकोण को कम आंककर पाकिस्तानी सेना ने रणनीतिक रूप से सोच सकने में अपनी अक्षमता साबित कर दी।

मार्च 1971 के उत्तरार्ध में जब पाकिस्तानी सेना ने नरसंहार शुरू किया, फिर वापस लौटने का सवाल ही नहीं रहा। पाकिस्तान ने चीन और अमेरिका की क्षमता पर भरोसा किया। यह सोवियत संघ था, जिसके समर्थन ने भारतीय लीडरशिप को हालात से निपटने में मदद की। बाद में भारत-सोवियत शांति संधि, मित्रता और समन्वय ने चीनी खतरे से बचने और अमेरिका के सातवें बेड़े और यूएसएस एंटरप्राइजेज के बंगाल की खाड़ी में बढ़कर, दबाव डालने से रोका।

जनरल सैम मानेकशॉ(बाद में फील्ड मार्शल बने की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रणनीतिक सैन्य सलाह व्यावहारिक थी। मानेकशॉ ने सलाह दी थी कि भारत को युद्ध थोड़ा टालना चाहिए क्योंकि अप्रैल-जुलाई का मौसम सबसे फायदेमंद नहीं होगा। उत्तरी सीमा पर चीनी पाकिस्तान की मदद कर सकते थे। और पंजाब-राजस्थान मंे खड़ी फसल टैंक से चौपट हो सकती थी। इसके अलावा मानेकशॉ को लगा कि जरूरत का सामान और हथियार पहुंचाने में भी वक्त लगेगा। इसका आखिरी निर्णय इंदिरा गांधी ने लिया।

ये बहुत कम जानते हैं कि पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय सेना के अचानक आक्रमण की योजना को असरहीन बनाने के लिए पाकिस्तान की मूल रणनीति एक छोटे से लॉजिक पर आधारित थी कि- ‘पूर्वी पाकिस्तान की रक्षा पश्चिमी पाकिस्तान में है।’ प्रमुख पाकिस्तानी विश्लेषक व लेखक लेफ्टिनेंट जनरल अतिकुर रहमान मानते हैं कि अगर यह रणनीति थी तो पूर्वी पाकिस्तान में अधिक सेना नहीं भेजी जानी चाहिए थी और पूर्व में कार्रवाई रोकने के लिए भारत को पश्चिमी पाकिस्तान में उलझाना चाहिए था। हालांकि ये याद रखना जरूरी है कि युद्ध की स्थितियां अचानक नहीं बनी थी। पाकिस्तान के लिए पूर्वी पाकिस्तान को ऐसे ही बिना बचाव किए छोड़ना आसान नहीं था।

शायद युद्ध की शुरुआत में ही पाकिस्तान को हार का अहसास हो गया था। भारतीय नौसेना द्वारा कराची की नाकाबंदी की कोशिश का मनोवैज्ञानिक असर पड़ा। भारत की शीघ्र और जबरदस्त जीत का एक मुख्य कारण राजनीतिक उद्देश्यों का स्पष्ट होना था, जिससे सैन्य उद्देश्य निकले।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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