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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:मनुष्य की संवेदनाएं बदलती हैं परंतु भयावह बात यह है कि भावनाहीन मनुष्य भी होने लगे हैं

एक महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

स्पाइडरमैन श्रृंखला की नई कड़ी क्रिसमस की छुटि्टयों में प्रदर्शित की जा रही है। 2002 में इस श्रृंखला की शुरुआत हुई थी। सोनी एंटरटेनमेंट कंपनी इसकी तीन कड़ियां बनाने जा रही है। किशोर उम्र के दर्शकों में यह अत्यंत लोकप्रिय है, पहले भाग का प्रमुख पात्र नई कड़ी में महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत कर रहा है। उसे अपनी पहचान छुपाना है और इस कार्य के लिए उसे एक जादूगर से मदद लेना है। मनोरंजन संसार में हैरी पॉटर का पात्र गायब कर दिया गया है। आभासी संसार को सत्य की तरह स्थापित करने का मंसूबा है।

ज्ञातव्य है कि आमिर खान की फिल्म ‘पी.के’ में यह आकल्पन प्रस्तुत किया गया है कि यह पृथ्वी तो एक छोटा गोला है। इसके अलावा और भी अनगिनत गोले हैं। दरअसल समय चक्र को सुरक्षित रखना आवश्यक है। इसी सुरक्षा की हिमायत के लिए ‘टाइम मशीन’ नामक फिल्म बनी थी। ‘स्पाइडरमन’ में डॉ. स्ट्रेंज नामक पात्र समय चक्र को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है।

स्पाइडर मैन में पीटर पार्कर का संवाद है कि ‘सब, कुछ न कुछ चुनना चाहते हैं, लेकिन जिनके पास सबकुछ है उनके सामने चुनने की समस्या ही नहीं है।’ यह असमानता आधारित व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष है। दरअसल सभी गोले अपने-अपने चक्र में घूम रहे हैं। कभी-कभी चक्र एक-दूसरे के इतने निकट से गुजरते हैं कि इधर के कुछ प्राणी उधर चले जाते हैं।

स्पाइडर मैन की नई कड़ी यह कहती है कि सभी अपने-अपने गोले में वापस चले जाएं क्योंकि साथ रहने पर टकराव होगा और व्यक्ति अपने गोले की सीमाएं लेकर एक-दूसरे से टकरा जाएंगे। लगभग एक सदी पहले टी एस एलियट द्वारा कहे गए एक कथन का भावार्थ है कि ‘गुजरा हुआ वक्त ही चक्र के घूमने से मौजूदा वक्त हो जाता है और सच तो यह है कि दोनों वक्त एक ही कोख में विराजे हैं। वह व्यक्ति मूर्ख होता है ,जो यह समझता है कि वह वक्त के चक्र को घुमा रहा है, जबकि वह उस विशाल चक्र का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है।’

मजाज़ लखनवी की मशहूर नज़्म का एक शेर है कि ‘ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूं ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं…।’ मजाज़ साहब की बेचैनी हम समझते हैं। ‘स्पाइडरमैन’ भी अपनी पहचान के लिए कुछ इसी तरह परेशान है। स्पाइडरमैन की व्याख्या दार्शनिक ढंग से भी की जा सकती है। उसकी ड्रेस मकड़ी के जाले की तरह है।

मकड़ जाल को ही हम नए ढंग से परिभाषित करें। ज्ञातव्य है कि मकड़ी अपने शिकार को पकड़ने के लिए ऐसी युक्ति अपनाती है कि सम्मोहित शिकार स्वयं उसकी ओर खिंचा चला आता है। हम सभी वशीभूत होकर मकड़ जाल की ओर जा रहे हैं। हम अपनी सीमित क्षमता के साथ मकड़ जाल में उलझते जा रहे हैं। निदा फ़ाज़ली ने फरमाया है कि ‘ये दुनिया जादू का खिलौना है, मिल जाए तो माटी है और खो जाए तो सोना है।’

सिनेमा टेक्नोलॉजी के विकास के कारण इस तरह की फिल्में लोकप्रिय हो रही हैं। हमने साधन को ही साध्य बना लिया है। हम भूल चुके हैं कि महात्मा गांधी का विचार था कि साधन अपवित्र होने पर साध्य भी कलंकित हो जाता है। आज चार्ली चैपलिन से प्रारंभ परंपरा, राजकपूर और ऋषिकेश मुखर्जी से होते हुए राजकुमार हिरानी पर ठिठक गई है। पर जादू का दौर थोड़े समय के लिए ही होता है।

फिल्म का नाम ही हमें कबीर की उलटबासी की याद ताजा कराता है। अगर वह स्पाइडर है तो मनुष्य नहीं हो सकता। यह भी तो सच है कि मनुष्य में जानवर बैठा होता है। कुछ मनुष्य बहुत हिंसक होते हैं। हिंसक प्राणियों में मानवीय करुणा देखी गई है। एक रचना में एक मनुष्य स्वयं को एक कीड़े में बदला हुआ पाता है। पहले पड़ोसियों को सहानुभूति होती है। रोज उसे देखते-देखते वितृष्णा होने लगती है।

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