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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:यदि प्रेमपूर्ण होना है, अपने शब्दों को मीठा बनाना है तो इसके लिए प्रकृति से प्रेम करना पड़ेगा

एक महीने पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

शब्द केवल सुनने-सुनाने का मामला नहीं हैं। इनको समझना और समझाना भी पड़ता है। राम इस कला में बड़े माहिर थे। विदाई के समय जब उन्होंने वानरों से कहा कि कभी किसी से डरना मत और मुझे सदैव याद करते रहना, तो इस पर वानरों का उत्तर बड़ा गजब का था। इसके जवाब में उन्होंने श्रीराम के व्यक्तित्व का विश्लेषण भी कर दिया। यहां तुलसीदासजी लिखते हैं- ‘प्रभुु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा।

हमरें होत बचन सुनि मोहा।’ हे प्रभु, आप जो ही कहें, आपको सब सोहता है, पर आपके वचन सुनकर हमको मोह होता है। यानी राम जो भी बोलते थे, उन पर खूब फबता था और सुनने वाले उनके शब्दों से मोहित हो जाते थे। सामने कोई शत्रु हो या मित्र, रामजी के शब्द सबके लिए एक जैसे प्यारभरे होते थे। सुनकर आश्चर्य होता है कि ब्रह्मचर्य से भी संतान पैदा हो सकती है, लेकिन कोई यदि पूरी प्रकृति से प्रेम करे तो ऐसा होता है।

इसका अर्थ है प्रेममय व्यक्तित्व। राम वैसे ही थे। उनके रोम-रोम में प्रेम भरा था। यदि प्रेमपूर्ण होना है, अपने शब्दों को मीठा बनाना है तो इसके लिए प्रकृति से प्रेम करना पड़ेगा। अधिकांश लोग परमात्मा को तो स्वीकार करते हैं, पर उसकी रची प्रकृति का मान नहीं करते, उससे प्रेम नहीं करते। इसीलिए कर्कश वाणी और विकृत मानसिकता से भर जाते हैं। अपने शब्द मधुर रखिए, आपका पूरा व्यक्तित्व निखर जाएगा।

humarehanuman@gmail.com

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