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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक:कलम से भी ऐसे बिंब रचे जा सकते हैं, जैसे कैमरा रचता है और कैमरे से लिखा जा सकता जैसे कलम से लिखा जाता है

4 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

फिल्मकार सुभाष कपूर और लेखक उमा शंकर सिंह की रचना ‘महारानी’ का प्रदर्शन हो चुका है। इसके विज्ञापनों में लेखक के नाम का उल्लेख नहीं किया जाना कोई नई बात नहीं है। लेखकों के साथ यह सलूक मुंशी प्रेमचंद के दौर से ही जारी रहा है। सलीम और जावेद ने इस अधिकार के लिए संघर्ष किया। इरशाद कामिल को भी पोस्टर में अपने नाम दिए जाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। बाद में उनका चित्र भी प्रकाशित किया गया। वे सितारा फिल्म गीतकार हो चुके थे, यह तो ‘जग घूमिया’ की बात है।

‘डॉली की डोली’ के संवाद लेखक उमाशंकर सिंह तो लंबे समय तक उन तालियों को सुनते रहे जो बजाई ही नहीं गईं। उसके टिके रहने की जिद की प्रशंसा करनी होगी। स्पष्ट है कि फिल्म राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बन जाने की घटना से प्रेरित है। महिला मुख्यमंत्री बन जाने के विषय पर गुलजार और कमलेश्वर की फिल्म ‘आंधी’ का सबसे बड़ा संबल संजीव कुमार और सुचित्रा सेन थे।

उन जैसे विलक्षण कलाकार बार-बार जन्म नहीं लेते। बहरहाल सुभाष कपूर और उमाशंकर सिंह ने जो कुछ उपलब्ध रहा, उसी से उनका श्रेष्ठ लिया है। हुमा कुरैशी ने उम्दा अभिनय किया है। ‘जॉली एलएलबी’ में उन्हें सीमित अवसर मिला था, परंतु उनका बिम्ब दर्शकों के साथ रहा है।

सुभाष कपूर और उमाशंकर सिंह बिहार की माटी से बने हुए व्यक्तित्व हैं। फणीश्वरनाथ रेणु और शैलेंद्र की बिहारी यादें तीन ही क्या, कितनी भी कसमें खा लें, हम भूल नहीं सकते। सुभाष कपूर की फिल्म ‘बुरे फंसे ओबामा’ स्मृति में कौंधती रहती है। भारतीय राजनीति, सामंतवाद का मुखौटा मात्र है, इसलिए महाराजा और महारानी शब्दों का उपयोग किया जाता है।

ज्ञातव्य है कि प्रकाश झा ने भी अपनी फिल्म ‘राजनीति’ में कैटरीना कैफ को मुख्यमंत्री की भूमिका में प्रस्तुत किया था। प्रदर्शन पूर्व फिल्म का प्रचार मिथ्या संकेत देता था, जबकि फिल्म मारियो पुजो की ‘गॉडफादर’ की पीलिया ग्रस्त रोगी से अधिक कुछ नहीं थी। कैटरीना कैफ की तरह अवसर हुमा कुरैशी को नहीं मिले परंतु कुछ लोग जो मिला उसी की सीमा को बढ़ाते हैं।

सुभाष कपूर ने पत्रकारिता का प्रशिक्षण लिया और नेताओं को बिना मुखौटे धारण किए हुए भी देखा है। चुनाव का विवरण प्रस्तुत किया है। पत्रकारिता क्षेत्र से सफल निर्देशन में आए हैं। उन्हें जमीनी खेल का अनुभव है। वह यह भी जानता है कि हकीकत को अफसाने के तौर पर कैसे प्रस्तुत करते हैं।

इस तरह ‘महारानी’ के निर्माण में एक अनुभवी पत्रकार-फिल्मकार और मिट्टी पकड़ लेखक का साथ हुआ है। ओ.टी.टी मंच पर सेंसरशिप लगाने के प्रयास जारी हैं। दरअसल सेंसरशिप कभी मनुष्य की अभिव्यक्ति को रोक नहीं सकती। बाहुबली सत्ता के सिंहासन पर पहले भी बिराजे, परंतु मनुष्य के उजागर होने की आकांक्षा को दबा नहीं पाए।

‘महारानी’ के निर्माण से जुड़े लोग अगले भाग की तैयारी कर रहे हैं। स्पष्ट है कि पूंजी उपलब्ध है। राजनीति की पृष्ठभूमि पर ओलिवर स्टोन की फिल्म ‘जे.एफ.के’ इस श्रेणी की महान फिल्म मानी जाती है। अमेरिकन फिल्मकार को जो स्वतंत्रता उपलब्ध कराई जाती है, वह भारत में संभव नहीं है।

वह दिन शायद ही कभी आए जब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डॉलर और रुपया एक साथ खड़े नजर आएं। हम अभिव्यक्ति के माध्यम में सामाजिक सरोकार के महत्व का कितना ही गुणगान कर लें परंतु यथार्थ के धरातल पर पूंजी की अवहेलना सिनेमा माध्यम में नहीं कर सकते। कागज, कलम की तरह कैमरा सस्ते में और सहज रूप में नहीं मिल सकता कलम से भी ऐसे बिंब रचे जा सकते हैं, जैसे कैमरा रचता है तथा कैमरे से लिखा जा सकता जैसे कलम से किया जाता है। कलम और कैमरा दोनों ही अभिव्यक्ति के साधन हैं। साधनों की पवित्रता पर ही माध्यम निर्भर करता है।