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विराग गुप्ता का कॉलम:गवर्नेंस की बेहतरी के नाम पर गली-मुहल्लों और स्कूलों में भी आज सीसीटीवी लग रहे हैं

2 दिन पहले
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विराग गुप्ता लेखक और वकील - Dainik Bhaskar
विराग गुप्ता लेखक और वकील

सुप्रीम कोर्ट में तकनीकी के बढ़ते इस्तेमाल और कार्यवाही के सीधे प्रसारण के बारे में ‘न्याय होता दिखाने की शुरुआत’ शीर्षक से दैनिक भास्कर में 27 जुलाई 2015 को मेरा लेख प्रकाशित हुआ था। उसके तीन साल बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने रिटायरमेंट से पहले सितम्बर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के प्रसारण के लिए न्यायिक फैसला दिया।

फैसले के चार साल बाद चीफ जस्टिस रमन्ना ने रिटायरमेंट के आखिरी दिन चीफ कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण करवाया। और अब संविधान पीठ के मामलों के सीधे प्रसारण के लिए सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों की फुल बेंच ने हामी भरी है।

लाइव टेलीकास्ट से न्यायिक अनुशासन और पारदर्शिता बढ़ने के साथ बेवजह की सुनवाई पर लगाम लगेगी। इसलिए विलंब के बावजूद यह स्वागतयोग्य है। लेकिन कानूनी बदलाव नहीं होने और निचली अदालतों में अमल का रोड मैप नहीं बनने से तदर्थवाद बढ़ना न्यायिक व्यवस्था के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

इस मामले के चार अहम पहलू हैं। पहला, संसद की कार्यवाही का प्रसारण 1989 से शुरू हो गया। सुप्रीम कोर्ट में 1990 से कम्प्यूटरीकरण की शुरुआत होने के बावजूद कार्यवाही के प्रसारण की ठोस शुरुआत नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट की फुल बेंच ने 25 साल पहले प्रस्ताव पारित करके कहा था कि न्याय होने के साथ होता हुआ दिखना भी चाहिए।

अदालतों को तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर देने के साथ क़ानून में बदलाव करना चाहिए। कार्यवाही का लिखित विवरण मिले तो पांच करोड़ मुकदमों से पीड़ित लोगों को सही अर्थों में संवैधानिक सुरक्षा मिलेगी।

अयोध्या मामले की सुनवाई के सीधे प्रसारण और 2018 के फैसले पर अमल के लिए के.एन. गोविंदाचार्य की दायर याचिका पर पिछले तीन सालों से कोई सुनवाई ही नहीं हुई। इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार 25 हाईकोर्ट और लगभग 20,000 जिला अदालतों में कार्यवाही के प्रसारण या विवरण मिलने की ठोस और पारदर्शी व्यवस्था बननी चाहिए।

दूसरा, कोरोना-काल के बाद अदालतों में व्हाट्सअप और यू-ट्यूब आदि से डिजिटल सुनवाई का चलन बढ़ गया। सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी के बनाए नियमों के अनुसार सरकारी प्रसार भारती, एनआईसी या सुप्रीम कोर्ट के खुद के चैनल से ही इस पर अमल होना चाहिए। इसीलिए पिछले चीफ जस्टिस रमना ने रिटायरमेंट के आखिरी दिन कार्यवाही के सीधे प्रसारण के लिए एनआईसी के सरकारी प्लेटफार्म का चयन किया।

अगले हफ्ते संविधान पीठ की कार्यवाही के प्रसारण के लिए यूट्यूब का चयन नियम और सुरक्षा- दोनों लिहाज से गलत है। अमेरिकी गूगल और यूट्यूब जैसी कंपनियों का डाटा विदेश में रहता है। सीधे प्रसारण के बाद न्यायिक कार्यवाही के वीडियो और क्लिपिंग्स पर विदेशी कंपनियों का कॉपीराइट होना न्यायिक संप्रभुता के लिए खतरनाक हो सकता है।

इसलिए सीधी कार्यवाही का प्रसारण दूरदर्शन या फिर एनआईसी के नेटवर्क से ही होना चाहिए। तीसरा, अनेक जजों की शिकायत है कि कोर्ट रूम में मौखिक टिप्पणियों या अंतरिम आदेश को आखिरी फैसला मानने से न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप होता है। नूपुर शर्मा मामले में जजों की टिप्पणियों से बवाल हो गया था।

फिर सीधे प्रसारण के बाद व्हाट्सअप में क्लिपिंग सर्कुलेशन से पैदा गलतफहमियों से जज कैसे निपटेंगे? अदालतों की कार्यवाही और जजों के मौखिक बयानों को अंट-शंट तरीके से आईटी सेल के लोग इस्तेमाल करें तो इससे न्यायिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो सकती है। जज सिर्फ लिखित फैसले से अपनी बात रखते हैं और उस पर स्पष्टीकरण देने का उनके पास कोई तंत्र नहीं होता।

यूट्यूब की पुरानी वीडियोज की क्लिपिंग के प्रसारण और व्हाट्सएप फॉरवर्ड से फेक न्यूज़ और न्यायिक प्रक्रिया में अनुचित हस्तक्षेप को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में सोशल मीडिया टीम की नियुक्ति भी जरूरी है। वीडियोज के प्रसारण, एडिटिंग और टिप्पणियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए न्यायिक व्यवस्था के तहत संपादकीय नियंत्रण बनाने के लिए यूटयूब के साथ विशेष अनुबंध होना चाहिए।

चौथा, खुली अदालतों में कार्यवाही देखना अनुच्छेद-21 के तहत जनता का संवैधानिक अधिकार है। फिलहाल कई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में तदर्थ नियमों से सीधा प्रसारण हो रहा है। संविधान पीठ की कार्यवाही देखने से लोगों में जागरूकता बढ़ेगी, लेकिन मुकदमेबाजी से पीड़ित आम जनता को राहत नहीं मिलेगी। सीधे प्रसारण से ज्यादा ऑडियो रिकॉर्डिंग और कार्यवाही की स्क्रिप्ट मिलने का सिस्टम बनाने के लिए हमने 2018 के मामले में सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया था।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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