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  • In This New Phase Of The Epidemic, The Cleanliness Of The Environment And The Purity Of The Inner Self Is A Vaccine.

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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:महामारी के इस नए दौर में वातावरण की स्वच्छता और अंतर्मन की पवित्रता अपने आप में एक वैक्सीन

एक महीने पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

शुद्धता के लिए शास्त्रों में लिखा है, जब भी कोई विजातीय यानी बाहरी तत्व (फॉरेन एलिमेंट) मूल तत्व से मिलेगा, उसकी शुद्धता खत्म हो जाएगी। हम मनुष्यों के साथ भी ऐसा है। मूल रूप से हम शुद्ध हैं, क्योंकि हम आत्मा हैं। हमारे भीतर यदि बाहर से कुछ भी आया तो झंझट शुरू हो जाएगी।

पानी साफ-सुथरा, शुद्ध हो और उसी तरह दूध भी शुद्ध हो, फिर भी यदि दोनों को मिलाएं तो जो भी बनेगा, वह अशुद्ध होगा, क्योंकि दोनों में बाहर से कुछ आया है। शुद्धता का मतलब है स्वयं को ठीक से जान सकें।

इसीलिए शास्त्रों में इस बात पर जोर दिया गया है कि मनुष्य को भीतर भी शुद्ध रहना है, बाहर भी। बाहर की शुद्धता का नाम है स्वच्छता और भीतर की शुद्धता मतलब पवित्रता। महामारी के इस नए दौर में बाहर की शुद्धता यानी स्वच्छता तो पूरी सावधानी से और भीतर की पवित्रता पूरे समर्पण के साथ रखिए।

थोड़ा इन शब्दों पर ध्यान दें- ‘अनपेक्ष: शूचिर्दक्ष’। जो अपेक्षा से रहित हो, बाहर-भीतर से शुद्ध हो, वह परमात्मा को प्रिय होता है। हमें इस समय कोरोना को नहीं, परमात्मा को प्रिय होना है। ऐसा कोई भी काम न करें जिसमें इस वायरस को अनुकूलता मिले और वह आपके निकट आ सके। वातावरण की स्वच्छता और अंतर्मन की पवित्रता अपने आप में एक वैक्सीन है महामारी से बचने का।

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