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संजय कुमार का कॉलम:महिलाओं को शामिल करने से राजनीति का स्वरूप बदलेगा, महिलाओं के लिए कांग्रेस का पिंक मेनिफेस्टो

7 महीने पहले
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संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar
संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार

यूपी में सपा और भाजपा छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने में व्यस्त हैं, इस बीच कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने गुलाबी घोषणापत्र (पिंक मेनिफेस्टो) जारी किया है। इसका उद्देश्य महिला मतदाताओं को जुटाना है। कागज पर यह अच्छी रणनीति दिखाई देती है, क्योंकि राज्य में कांग्रेस के पास शायद ही कोर समर्थक बचे हैं और वापसी के लिए उसे लीक से हटकर सोचने की जरूरत है। प्रियंका गांधी की नजर राज्य की करीब 50% महिला वोटरों और उनके मुद्दों पर है। गुलाबी घोषणा पत्र जारी करने के बाद प्रियंका गांधी ने कहा कि जब तक महिलाओं को राजनीति में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, तब तक भारत का वास्तविक विकास एक सपना ही रहेगा।

गुलाबी घोषणा पत्र को छह क्षेत्रों में बांटा गया है जैसे आत्म-सम्मान, गरिमा, आत्मनिर्भरता, शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य। इससे पहले प्रियंका गांधी ने यूपी विधानसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों को 40% टिकट देने का ऐलान किया था। साफ है कि प्रियंका यूपी में महिला वोटरों को लामबंद करने की रणनीति पर काफी भरोसा कर ही हैं। उनकी ये घोषणाएं भले ही कांग्रेस के चुनावी भाग्य को नहीं बदल सकती, लेकिन निश्चित रूप से यह वो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिन्हें लेकर बड़ी संख्या में महिला मतदाता चिंतित हैं और इस बारे में उनकी पुख्ता राय है।

इन घोषणाओं से कांग्रेस को तत्काल चुनावी लाभ नहीं हो सकता, क्योंकि पार्टी का आधार काफी कमजोर है। हाल के वर्षों में 2009 के लोकसभा चुनावों को छोड़कर कांग्रेस यूपी में दोहरे अंकों में वोट प्रतिशत हासिल करने में असफल रही है। किसी भी पार्टी के लिए लगातार इस तरह के निराशाजनक चुनावी प्रदर्शन के बाद वापसी और चुनावों में करीबी टक्कर देना मुश्किल है। कांग्रेस यूपी के आगामी विधानसभा चुनावों में गंभीर प्रतियोगी होने की उम्मीद नहीं कर सकती है, लेकिन पार्टी ने निश्चित रूप से उन मुद्दों को छुआ है जो भारत में बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं को प्रिय हैं।

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के देशभर में महिला मतदाताओं के सर्वे का निष्कर्ष बताता है कि पुरुष उम्मीदवार बाकी सब मामलों में अगर समान है तो महिला मतदाता महिला उम्मीदवारों को वोट देना पसंद करेंगी। ऐसे में 58% महिलाएं महिला उम्मीदवार को वोट देंगी। केवल 12% ने कहा कि पुरुष उम्मीदवार को वोट देना पसंद करेंगी। इसलिए कांग्रेस का 40% महिला उम्मीदवारों को टिकट देने का निर्णय पार्टी के समर्थन आधार को बढ़ाने में मदद कर सकता है, हालांकि यह पार्टी को गंभीर मुकाबले में लाने के लिए यह पर्याप्त नहीं है।

आम धारणा है कि महिलाएं राजनीति में शामिल नहीं होना चाहतीं, लकिन सर्वेक्षण के निष्कर्ष इससे उलट हैं कि 28% भारतीय महिलाएं राजनीति में कॅरिअर बनाना चाहती हैं। यह राय हर क्षेत्र और सामाजिक समूहों की महिलाओं में समान है। फिर चाहे महिला ऊंची जाति की हो या ओबीसी या दलित परिवारों से। आदिवासी महिलाएं ही इसमें एकमात्र अपवाद हैं। बड़े शहरों की महिलाएं छोटे शहरों में रहने वाली महिलाओं की तुलना में राजनीति में शामिल होने के लिए अधिक इच्छुक हैं।

2019 की लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या सबसे अधिक है। इनमें ज्यादा संख्या तृणमूल कांग्रेस और बीजू जनता की सांसदों की है, क्योंकि इन दोनों ही दलों ने बड़ी संख्या में महिला उम्मीदवारों को टिकट दिए थे। महिला मतदाताओं में यह साझा धारणा है कि महिला प्रतिनिधि संसद और विधानसभाओं में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के हितों का बेहतर ध्यान रख सकती हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में ओडिशा में बीजद और पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने इसके लिए पहल की थी। कांग्रेस अभी इस दिशा में रुचि दिखा रही है। उम्मीद है कि अन्य दल भी इन दलों के नक्शेकदम पर चलेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)
●sanjay@csds.in