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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:भारत-रूस नया एशिया खड़ा कर सकते हैं, व्लादिमीर पुतिन की यह भारत यात्रा गुट-निरपेक्षता से एकदम उलट है

8 महीने पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस वक्त भारत आए, यह अपने आप में बड़ी बात है। एक तो यह कोरोना महामारी का दौर है। दूसरा, अमेरिका के साथ इधर पिछले कई वर्षों से भारत की घनिष्ठता जगत विख्यात हो गई है। तीसरा, यूक्रेन के साथ रूस का गहरा तनाव बना हुआ है।

चौथा, चीन के साथ भारत का सीमांत-विवाद अभी 1962 के बाद सबसे ज्यादा जोरों पर है, लेकिन रूस-चीन संबंध अत्यंत घनिष्ठ हो गए हैं। इन अंतर्विरोधों के बावजूद व्लादिमीर पुतिन की यह भारत-यात्रा अंतरराष्ट्रीय राजनीति के पर्यवेक्षकों के लिए विशेष महत्व रखती है।

मेरी राय में पुतिन की यह भारत यात्रा गुट-निरपेक्षता से एकदम उलट है। गुट-निरपेक्षता के दौर में यह जरूरी समझा जाता था कि अमेरिका और सोवियत संघ के साथ तीसरी दुनिया के देश समान दूरी बनाकर रखें यानी वे दोनों महाशक्ति-गुटों से बराबर की दूरी बनाए रखें।

भारत, मिस्र और युगोस्लाविया जैसे देशों के नेताओं- नेहरू, नासिर, नक्रूमा- ने यह करके भी दिखाया, लेकिन पिछले 20-25 वर्षों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के ढांचे में मौलिक परिवर्तन हुआ है। जो राष्ट्र पहले दोनों महाशक्ति गुटों से अलग रहना चाहते थे, उन्हें गुट-निरपेक्ष कहा जाता था लेकिन अब जो राष्ट्र दोनों महाशक्तियों से निकटता बनाकर रखना चाहते हैं, उन्हें हम गुट-सापेक्ष्य भी कह सकते हैं। अंग्रेजी में उन्हें नाॅन-एलाइंड की जगह अब हम मल्टी-एलाइंड भी कह सकते हैं।

गुट-सापेक्ष्य होने का अर्थ यह नहीं है कि भारत इस या उस गुट में शामिल होना चाहता है। शीत-युद्ध के जमाने की गुटबाजी आजकल यों भी नहीं है। फिर भी अमेरिका ने प्रशांत सागर और पश्चिम एशिया में अपने समर्थक राष्ट्रों के गठबंधन खड़े किए हैं और रूस व चीन भी कुछ क्षेत्रीय संगठनों के जरिए आपस में जुड़े हुए हैं। लेकिन ये गठबंधन या संगठन सीटो, सेंटो, नाटो या वारसा पैक्ट की तरह नहीं है। इसीलिए भारत-जैसे राष्ट्रों को ये दोनों तरह के गठबंधन या संगठन मान्य हैं। वह अमेरिका के चौगुटे- ‘क्वाड’ में भी शामिल है और रूस व चीन के ‘शांघाई सहयोग संगठन’ का भी वह सदस्य है। इसे मैं समदूरी की जगह सम-सामीप्य की नीति कहता हूं।

इसीलिए पुतिन की इस भारत-यात्रा की निंदा न तो अमेरिका ने की है और न ही चीन ने। हां, रूसी विदेश मंत्री सर्गेइ लावरोव ने यह जरूर कह दिया कि अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत रूस से एस-400 एअर डिफेंस सिस्टम खरीदे। अमेरिका के इस प्रतिबंध को भारत ने नहीं माना और इतना ही नहीं उसने इस यात्रा के दौरान रूस के साथ एक सामरिक समझौता भी किया है, जिसके तहत दोनों देश मिलकर छह लाख से भी ज्यादा एके-203 रायफलें बनाएंगे। एस-400 एअर डिफेंस सिस्टम की कीमत 5.4 बिलियन डाॅलर है और अगले कुछ हफ्तों में ही ये भारतीय वायुसेना को सुसज्जित करना शुरू कर देंगे। राइफलों के निर्माण पर भारत 5100 करोड़ रुपए खर्च करेगा।

रूसी विदेश मंत्री लावरोव और रक्षामंत्री सर्गेइ शोइगु ने भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री जयशंकर से भी लंबा संवाद किया। लावरोव ने दो मुद्दे उठाए। एक अफगानिस्तान का और दूसरा अमेरिकी ‘क्वाड’ का भी। अफगानिस्तान के सवाल पर मोदी और पुतिन ने अपनी नीतियों और रवैयों में काफी समानता पाई। दोनों रूसी नेताओं ने तालिबान शासन को सर्वसमावेशी बनाने का समर्थन किया, आतंकवाद के खात्मे की मांग की और अफगान जनता की मदद की जरूरत पर जोर दिया।

अफगानिस्तान के मामले में भारत की नीति काफी संकोच ग्रस्त रही है। अमेरिका और रूस की फौजी कार्रवाइयों से अफगान जनता के कुछ न कुछ हिस्से काफी नाराज रहे हैं लेकिन भारत के प्रति समस्त अफगानों के मन में आदर का भाव है। इस पुतिन-यात्रा के दौरान भारत चाहता तो अफगान मामलों के बारे में कोई संयुक्त पहल शुरू कर सकता था।

जहां तक अमेरिकी ‘क्वाड’ का सवाल है, रूसी विदेश मंत्री ने उसका नाम लिए बिना उस पर हमला जरूर किया। उन्होंने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य-गुट बनाने को अनुचित बताया। दूसरे शब्दों में रूसी विदेश मंत्री ने इस मुद्दे पर चीनी विदेश मंत्री के स्वर में स्वर मिलाया। उन्होंने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है। इधर हमारे रक्षा मंत्री राजनाथसिंह भी चुप नहीं रहे।

उन्होंने चीन का नाम लिए बिना अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने कहा ‘महामारी, हमारे पड़ोस में असाधारण सैन्यीकरण, आयुधों का विस्तार और 2020 की गर्मियों से हमारी उत्तरी सीमा पर बिना उकसावे की आक्रामकता के कारण कई चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं।’ यदि रूसी विदेश मंत्री ने अमेरिका की टांग खींची तो भारतीय रक्षा मंत्री ने अमेरिका से चोंच लड़ाने वाले चीन की टांग खींच दी।

इस भारत-यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 28 समझौते हुए हैं। भारत और रूस के बीच प्रतिरक्षा समझौते और सौदे तो पिछले कई दशकों से होते रहे हैं। शीतयुद्ध के दौर में पाकिस्तान को अमेरिकी और चीनी अस्त्र-शस्त्र तथा सहायता दान में मिलती रहती थी जबकि भारत तो रूस का सबसे बड़ा सामरिक खरीदार रहा है। अब भी सामरिक खरीद में विविधता आ जाने के बावजूद भारत के लगभग 60 प्रतिशत अस्त्र-शस्त्र रूसी मूल के ही हैं। अब भारत और रूस, दोनों ने इच्छा प्रकट की है कि वे ऊर्जा, नदी-नहर निर्माण, खाद, स्टील, कोयला-उत्पादक, जहाज-निर्माण आदि क्षेत्रों में सक्रिय सहयोग करें।

2020 में भारत-रूस व्यापार 9.31 बिलियन डॉलर रहा। जबकि चीन-रूस व्यापार उससे दस गुना से ज्यादा है। जनवरी 2021 से जून 2021 तक यह 5.23 बिलियन डॉलर रहा। भारत-चीन व्यापार भी कई गुना ज्यादा है। यह ठीक है कि रूस अपने हथियार बेचने को इतना व्यग्र है कि अत्यंत व्यस्तता के बावजूद पुतिन सिर्फ 6 घंटे के लिए ही भारत दौड़े चले आए लेकिन मोदी और पुतिन को चाहिए था कि आपसी व्यापार बढ़ाने के लिए वे विशेष प्रयत्न करते। दोनों ने कहा है कि वे अगले 4-5 साल में आपसी व्यापार 30 बिलियन और निवेश 50 बिलियन डाॅलर तक बढ़ाने की कोशिश करेंगे।

यह कोशिश तभी सफल होगी जबकि भारत से रूस तक जाने-आने का थल-मार्ग सुलभ हो। ईरान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के पांचों गणतंत्र से थल-मार्ग और चेन्नई से व्लादिवस्तोक तक जल-मार्ग को उपलब्ध करवाने के लिए रूस और भारत को उच्चतर चिंतन और गहन कूटनीति का सहारा लेना होगा। भारत सरकार चाहे तो इन सारे पड़ोसी राष्ट्रों को एक सूत्र में बांधकर दक्षिण और मध्य एशिया के कल्याण का मार्ग खोल सकती है। इन राष्ट्रों में दबी अकूत प्राकृतिक संपदा का दोहन तथा करोड़ों नए रोजगारों का सृजन भारत और रूस मिलकर कर सकते हैं।

क्यों थलमार्ग जरूरी है
पुतिन की इस भारत-यात्रा की निंदा न तो अमेरिका ने की है और न ही चीन ने। इस दौरान दोनों देशों के बीच 28 समझौते हुए हैं। यह कोशिश तभी सफल होगी जबकि भारत से रूस तक जाने-आने का थल-मार्ग सुलभ हो। ईरान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के पांचों गणतंत्र से थल-मार्ग और चेन्नई से व्लादिवस्तोक तक जल-मार्ग को उपलब्ध करवाने के लिए रूस और भारत को उच्चतर चिंतन और गहन कूटनीति का सहारा लेना होगा। भारत सरकार चाहे तो इन सारे पड़ोसी राष्ट्रों को एक सूत्र में बांधकर दक्षिण और मध्य एशिया के कल्याण का मार्ग खोल सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

● dr.vaidik@gmail.com