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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:यह मानना मुश्किल है कि फिलीस्तीन और इजराइल के बीच शांति हो गई है, यह अशांत शांति है

5 महीने पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक

हमास और इजराइल के बीच चला 11 दिवसीय युद्ध बंद हो गया है, लेकिन यह मानना कठिन है कि फिलीस्तीनियों और इजराइलियों के बीच शांति हो गई है। यह अशांत शांति है। इसीलिए युद्ध-विराम की घोषणा के बावजूद अल-अक्सा मस्जिद में यहूदियों को आने दिया जा रहा है और उसे लेकर फिलीस्तीनी भड़क गए। उन्होंने इजराइली पुलिस पर पत्थर बरसाए और पुलिसवालों ने उन पर हथगोले और डंडे बरसाए। वैसे इस जानलेवा मुठभेड़ के खत्म होते ही दोनों पक्षों ने अपना-अपना विजयोत्सव मनाया।

गाजा क्षेत्र में हमास के समर्थकों ने बड़े-बड़े जुलूस निकाले और भविष्य में भी इजराइल को दांत खट्टे करने की धमकियां देते रहे। हमास और फिलीस्तीनियों का कितना भी नुकसान हो जाए लेकिन हमास ईंट का जवाब पत्थर से देने की कोशिश करेगा। 11 दिन चले इस युद्ध में हमास ने 4000 रॉकेट दागे। यदि इजराइल का लौह-स्तंभ इन राॅकेटों को ध्वस्त नहीं करता तो सैकड़ों यहूदी मारे जाते। इजराइल ने सिर्फ 1800 राॅकेट चलाए, लेकिन इतने जोरदार कि उन्होंने अरबों के 17 हजार घर ढहा दिए और करीब 1 लाख लोगों को गाजा क्षेत्र से भागने को मजबूर कर दिया।

अब युद्ध तो बंद हो गया है, लेकिन जिस मुद्दे पर शुरू हुआ था, वह ज्यों का त्यों खड़ा है। न तो अल-अक्सा मस्जिद के परिसर में यहूदियों का आना-जाना बंद हुआ, न ही पूर्वी यरुशलम की बस्ती शेख जर्रा में बसे फिलीस्तीनी सुरक्षित हैं। पिछले युद्धों में इजराइल ने जितने फिलीस्तीनी इलाकों पर कब्जा किया था, उसके आस-पास के इलाकों को भी वह खाली करवा रहा है। वहां वह नई यहूदी बस्तियां खड़ी कर रहा है। उसने अब तक न तो अल-अक्सा परिसर के बारे में कुछ कहा है और न ही शेख जर्रा के बारे में। शेख जर्रा का मामला अभी इजराइल के सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा है।

जहां तक हमास का प्रश्न है, इस संगठन को दुनिया के गोरे राष्ट्र आतंकवादी संगठन मानते हैं। इसे न तो अमेरिका ने मान्यता दी है और न ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन इजराइली और फिलीस्तीनी नेताओं से बात करने के लिए इजराइल पहुंच गए हैं। वे हमास के किसी नेता से बात नहीं करेंगे। यदि उन्हें हमास से संपर्क करना होगा तो वे मिस्र और जॉर्डन के जरिए करेंगे। इस युद्ध-विराम में मिस्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इस युद्ध-विराम का श्रेय बहुत हद तक अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन को भी है। उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से 11 दिन में 6 बार बात की और युद्ध-विराम के लिए प्रेरित किया। पहले 5-6 दिन तो ऐसा लगा कि इजराइल पर बाइडेन और ट्रम्प की नीति में कोई अंतर नहीं है, क्योंकि बाइडेन बार-बार दोहरा रहे थे कि इजराइल को आत्मरक्षा का पूर्ण अधिकार है।

उन्होंने सुरक्षा परिषद को भी कोई पहल नहीं करने दी, लेकिन उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेताओं ने इजराइल के अतिवाद पर उंगली उठाई और बाइडेन पर दबाव बनाया। बाइडेन ने अपनी लकीर बदली और कहना शुरू किया कि इजराइल और फिलीस्तीनी, दोनों को जिंदा रहने का अधिकार है।

अब अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकन की कोशिश है कि इजराइली हमलों से उजड़े गाजा-क्षेत्र में पुनर्निर्माण हो। बाइडेन प्रशासन कोशिश करेगा कि जैसे ओबामा ने राष्ट्रपति बनते ही अरब-इजराइल संवाद शुरू करवाया था, वैसा ही राजनयिक क्रम फिर शुरू हो। आज कई अरब राष्ट्रों से अमेरिका घनिष्ट संबंध हैं, उनका लाभ उठाकर वह मुस्लिम राष्ट्रों को फिलीस्तीन मसले के स्थायी हल के लिए तैयार कर सकता है।

वैसे इस्लामिक सहयोग संगठन के 57 सदस्यों ने इजरायली हमले की भर्त्सना की, लेकिन सिर्फ जुबानी जमा-खर्च करके रह गया। कई प्रमुख इस्लामी राष्ट्रों ने इजरायल को कूटनीतिक मान्यता दी और उसके साथ राजनयिक संबंध भी स्थापित किए हैं।

संयुक्तराष्ट्र संघ बहुत पहले प्रस्ताव पारित कर चुका है कि इजरायल के साथ फलिस्तीन को भी उस जमीन पर राष्ट्र के रूप में रहने का हक है, लेकिन फलिस्तीन में चल रही महमूद अब्बास की सरकार का कोई अंतरराष्ट्रीय महत्व नहीं है। उसकी टक्कर में हमास ने अलग सरकार गाजा पट्टी में बना रखी है। हमास के लोग अब्बास को पश्चिम का गुलाम कहते हैं।

इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू फलिस्तीनियों में पड़ी फूट का फायदा तो उठाते हैं, इस समय उन्होंने डगमगाती सरकार को टिकाने के हिसाब से भी तिल को ताड़ बना दिया। अल-अक्सा व शेख जर्रा के मसले बातचीत से हल हो सकते थे लेकिन युद्ध ने उन्हें महानायक की छवि पैदा करने का मौका दे दिया।

इजरायल का समर्थन करने के लिए नेतन्याहू ने दुनिया के 25 प्रमुख देशों को धन्यवाद दिया लेकिन उसमें भारत का नाम नहीं था। इधर नरसिम्हाराव-सरकार ने जबसे इजरायल से राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं, दोनों देशों के बीच सामरिक व व्यापारिक सहयोग काफी बढ़ गया है लेकिन भारतीय प्रतिनिधि ने 16 मई को सुरक्षा परिषद में जो बयान दिया था, उससे ऐसी ध्वनि निकल रही थी, मानो भारत युद्ध के लिए इजरायल को जिम्मेदार ठहरा रहा है, हालांकि 20 मई को बात संभाल ली गई।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)