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मनीष अग्रवाल का कॉलम:भारतीय रेलवे ने निजी सेक्टर को यात्री ट्रेनें चलाने की अनुमति दी, इससे कितनी चुनौतियां कम होंगी?

8 महीने पहले
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मनीष अग्रवाल, पार्टनर, प्राइसवाटरहाउसकूपर्स - Dainik Bhaskar
मनीष अग्रवाल, पार्टनर, प्राइसवाटरहाउसकूपर्स

भारतीय रेलवे ने 12 क्लस्टर के 300 से ज्यादा मार्गों पर खुद की पैसेंजर ट्रेन चलाने के लिए प्राइवेट सेक्टर को आमंत्रित किया है। अनुमान है कि हर क्लस्टर में रेलगाड़ियां प्राप्त करने में 2000 से 3000 करोड़ रुपए का निवेश होगा और इससे देश में एयर-कंडीशन्ड कोच की क्षमता में बढ़ोतरी हो सकती है। प्राइ‌वेट कंटेनर ट्रेन ऑपरेशन में और रेलवे लाइन में PPP के 4 मॉडल में प्राइवेट सेक्टर के साथ भारतीय रेलवे के गड़बड़ ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए इस पहल की सफलता पर कुछ शंका जताई जा रही है।

एक और आलोचना यह भी की जा रही है कि निजी सेक्टर को उच्चवर्गीय यात्रियों को सेवाएं प्रदान करने वाली ट्रेनें चलाने की अनुमति देने से रेलवे की मुख्य चुनौतियों का हल नहीं निकलेगा। जिसमें संचालन में कार्यक्षमता बढ़ाने और नेटवर्क के विस्तार और अपग्रेडेशन में निवेश शामिल है। हवाई और लग्जरी बस यात्रियों को ट्रेनों के प्रति आकर्षित करने के अपेक्षित लाभ के अलावा तीन व्यापक लाभों की संभावना है। ये फायदे उठाने के लिए भी भारतीय रेलवे को पहल करनी होगी, जो निवेशकों की चिंता को संबोधित करे।

पहला, प्राइवेट सेक्टर की सफलता महत्वपूर्ण रूप से रेलवे के ट्रैक के ऑपरेशन और स्टेशन तक पहुंच पर निर्भर करेगी। बोली लगाने वालों को संचालन प्रक्रियाओं की स्पष्ट जानकारी, तय जिम्मेदारी और रेलवे द्वारा शर्तों के पालन न किए जाने पर सख्त पेनाल्टी के प्रावधान की जरूरत होगी। भारत में PPP अनुबंधों में आखिरी कारक कमजोर रहा है। अगर पेनाल्टी का खतरा निवारक का काम करता है, तो इससे शेड्यूलिंग में उच्च स्तरीय अनुशासन के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ेगा। बेहतर और अच्छे पूर्वानुमान वाली शेड्यूलिंग से ट्रैक का बेहतर इस्तेमाल हो पाएगा, जिससे सभी को लाभ होगा।

दूसरा, निजी ऑपरेटर्स की व्यावहारिकता में ट्रैक इस्तेमाल के चार्ज (हॉलेज चार्ज) भी महत्वपूर्ण होंगे, जिनका भुगतान रेलवे को किया जाएगा। आदर्शत: विभिन्न गतिविधियों में रेलवे की पूंजी और संचालन लागत के पारदर्शी आवंटन से नेटवर्क लागतों के घटकों का स्पष्ट निर्धारण हो सकेगा। लागत आवंटन की पारदर्शी प्रक्रिया से कार्यक्षमता की छुपी खामियां पहचानने में मदद मिलेगी।

वहीं ट्रैक की पूरी लागत के निर्धारण के बाद मुख्य सवाल यह होगा कि प्राइेवट ट्रेन ऑपेरटर से कितना हॉलेज चार्ज लिया जा सकता है। प्राइवेट ऑपरेटर्स की प्रतिस्पर्धा रेलवे की प्रीमियम ट्रेनों से होगी, इसलिए बराबरी का मौका देने के लिए यह तय करना जरूरी होगा कि रेलवे की प्रीमियम ट्रेनों के कीमत निर्धारण में इंफ्रास्ट्रक्चर लागत का कितना भार है। इससे प्रति इकाई रेवेन्यू और लागत की समझ में पारदर्शिता आएगी। इससे कीमत को लेकर भी स्पष्टता प्राप्त होगी। लागत का मापदंड भी स्पष्ट होगा।

तीसरा, प्राइवेट ट्रेनों की शुरुआत होने पर उनकी योजना और संचालन से यह समझ सकेंगे कि विभिन्न तकनीकों और सेवा स्तरों पर कितना पैसा खर्च किया जा सकता है। इसके अलावा इन ट्रेनों के संचालन से प्राप्त डेटा कीमतों के बढ़ने पर होने वाली बहस में भी जानकारी दे सकता है (हालांकि, यात्रियों का राजनीतिक रूप से संवेदनशील वर्ग, टार्गेट सेगमेंट से बाहर रह सकता है)

ऊपर दिए गए सभी मुद्दे, यानी रेलवे का प्रदर्शन, तय लागतों की सीमा के लिए प्रतिबद्धता और ट्रैफिक तथा रेवेन्यू का आकलन, बोली लगाने वालों के लिए बहुत जरूरी होंगे। शॉर्टलिस्ट होने के बाद बोली लगाने वालों की रुचि इस पर निर्भर करेगी कि रेलवे इन कारकों पर उन्हें कितनी सहजता प्रदान कर सकता है।

इसलिए इस पहल की सफलता के लिए इन पर ध्यान देना जरूरी है। ज्यादा अनुशासित संचालन और विभिन्न यात्री वर्गों को सेवा प्रदान करने के आर्थिक पहलुओं की समझ के अतिरिक्त लाभ की भी रेल सेक्टर की सुधार की यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)