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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:अस्थिर अफगानिस्तान पर भारत की भावी भूमिका, विदेश नीति पर सवाल, अफगान-फिलस्तीन पर हम लड़खड़ा गए?

5 दिन पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

पिछले एक-दो हफ्तों से हमारी विदेश नीति बड़े असमंजस में फंसी दिख रही है। अफगानिस्तान और फिलस्तीन-इजरायल के मामलों में भारत किंकर्तव्यविमूढ़-सा लग रहा है। अफगानिस्तान के मामले में चीन व पाकिस्तान मिलकर भारत को पीछे छोड़ने में लगे हैं और फिलस्तीन-इजरायल के मामलों में भारत न इधर का रहा और न ही उधर का! पिछले 30-35 साल में जब से अफगानिस्तान अस्थिर हुआ है, भारत ने वहां 3 बिलियन डाॅलर से ज्यादा धन उसके नव-निर्माण में खर्च किया है। लेकिन जब अफगानिस्तान से 20 साल बाद अमेरिकी फौज वापस जा रही हैं, भारत की भावी भूमिका नगण्य-सी लग रही है।

जब अमेरिका, अशरफ गनी सरकार और तालिबान के बीच अमेरिकी वापसी की बात चल रही थी, तब भी भारत हाशिए पर दिखा, जबकि पाकिस्तान की भूमिका अति महत्वपूर्ण थी। अमेरिका ही नहीं, तुर्की, रुस और चीन ने भी अफगान-संकट के बारे में जितनी पहलें कीं, उनमें भारत की भूमिका नगण्य रही। अफगान-संकट का समाधान पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना हो नहीं सकता लेकिन निर्णायक देशों द्वारा भारत की उपेक्षा और भारतीय विदेश नीति का आलस्य देखकर दुख होता है।

उधर चीन व पाक मिलकर अफगानिस्तान के बारे में अब भारत की भाषा बोल रहे हैं। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन के विदेश मंत्रियों के एक संयुक्त संवाद में कहा गया कि अमेरिका जल्दबाजी न करे। अपनी फौज को अफगानिस्तान में टिकाए रखे। नए बाइडेन-प्रशासन ने उसे 11 सितंबर तक आगे बढ़ा दिया है।

इन अमेरिकी और नाटो फौजों का मुख्य लक्ष्य क्या रहा है? तालिबान का उन्मूलन! तालिबान किसके दम पर रहे हैं? पाकिस्तान के! पेशावर, मिरानशाह और क्वेटा में तालिबान के अलग-अलग शूरा (संगठन) बने हुए हैं। यदि पाक तालिबान के विरुद्ध होता तो काबुल सरकार को कोई हिला नहीं सकता था।

अब अमेरिकी वापसी की घोषणा ने पाकिस्तान और चीन, दोनों को नया बुखार चढ़ा दिया है। पाक को डर है कि अमेरिकी वापसी होते ही काबुल पर तालिबान का कब्जा हो जाएगा। चीन डरा हुआ है। अफगान सीमा से लगे शिनच्यांग प्रांत के उइगर मुसलमानों पर उसने नकेल कस रखी है। लाखों उइगरों को ‘यातना शिविरों’ में रखा है।

यदि काबुल में तालिबान की निरंकुश सत्ता आ गई तो वे उइगरों के समर्थन में सारे मध्य एशियाई मुस्लिम राष्ट्रों के उग्रवादियों को जोड़कर चीन के लिए नया सिरदर्द पैदा कर देंगे। इसीलिए चीन व पाकिस्तान अफगान तालिबान से सीधी बात भी कर रहे हैं और अमेरिका से काबुल में टिके रहने का आग्रह भी। लेकिन भारत क्या कर रहा है?

इसी तरह जब इजरायल व ‘हमास’ में मुठभेड़ हुई तो भारत सिर्फ जबानी जमा-खर्च करता रहा। सुरक्षा परिषद में बोलते हुए भारतीय प्रतिनिधि ने पहले फिलस्तीन का परंपरागत समर्थन कर दिया और फिर संयुक्तराष्ट्र महासभा में भारत को तटस्थ घोषित कर दिया। नतीजा, इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने जिन 25 राष्ट्रों को समर्थन के लिए धन्यवाद दिया, उनमें भारत का नाम नहीं था। भारत व इजरायल के संबंध आज इतने घनिष्ट हैं कि सामरिक, व्यापारिक, वैज्ञानिक व तकनीकी मामलों में उनके बीच कोई पर्दादारी नहीं है।

यह ठीक है कि, भारत को हमास के अतिवाद का समर्थन नहीं करना चाहिए लेकिन फिलस्तीनी नेता यासर अराफात और वर्तमान राष्ट्रपति महमूद अब्बास तो भारत के अभिन्न मित्र रहे हैं। जब अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार संगठन में फिलस्तीन का मामला आया तो भारत तटस्थ हो गया जबकि इजरायली हमलों में सैकड़ों फिलस्तीनी मारे गए, हजारों घायल हुए और लाखों शरणार्थी बन गए। इसीलिए फिलस्तीन के विदेश मंत्री ने भारत की इस चुप्पी पर गहरी नाराजगी जताई है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)