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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:अफगान संकट में अब भारत की पहल जरूरी, क्या भारत गनी सरकार और तालिबान के बीच मध्यस्थता कर सकता है

6 दिन पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

काबुल सरकार और तालिबान के बीच ईद के बावजूद युद्ध-विराम नहीं हुआ। जबकि क़तर की राजधानी दोहा में दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही थी। इसका मूल कारण यह है कि अफगानिस्तान के लगभग 400 जिलों में ज्यादातर में तालिबान आगे बढ़ते जा रहे हैं। वे हेरात, कंधार और काबुल के काफी नजदीक पहुंच चुके हैं। अफगानिस्तान की सरकार भी उनका डटकर मुकाबला कर रही है। उसके प्रवक्ता का दावा है कि अफगान फौजों ने कई जिलों को वापिस हथिया लिया है। ईद के मौके पर यदि तालिबान अपने हमलों को रोक देते तो हो सकता है कि उन्हें मात खानी पड़ती।

दोहा में अफगानिस्तान के सीईओ (प्रधानमंत्री-सम) डॉ. अब्दुल्ला अब्दुल्ला तालिबान के नेताओं से दो दिन तक बात करते रहे। इससे यह उम्मीद बंधी कि दोनों पक्ष बीच का रास्ता शायद निकाल लेंगे लेकिन कोई ठोस रास्ता निकलना तो दूर, दो-तीन दिन का युद्ध-विराम भी नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि आज सुबह ही काबुल के राष्ट्रपति भवन के पास तीन रॉकेट दागे गए। ये उस वक्त तालिबान ने दागे, जबकि ईद की नमाज़ पढ़ी जा रही थी।

दूसरे शब्दों में तालिबान का संदेश बिल्कुल साफ है। वह यह है कि सिंहासन खाली करो कि तालिबान आते हैं। तालिबानी नेता बिल्कुल नहीं चाहते कि वे काबुल की अशरफ गनी सरकार के साथ कोई अस्थायी मंत्रिमंडल बनाएं और आम चुनाव के बाद अफगान जनता की पसंद के मुताबिक सरकार बनाएं। काबुल में बनी सरकारों को मुजाहिदीन और तालिबान योद्धा रूसी और अमेरिकी कठपुतलियां कहकर पुकारते रहे हैं।

अमेरिका की जबर्दस्त कोशिशों की वजह से तालिबान बातचीत के लिए तैयार हुए, वरना उन्हें पूरा विश्वास है कि वे काबुल पर कब्जा कर लेंगे। काबुल पर कब्जे के लिए उन्हें अफगान फौजों का डर नहीं है। वे सिर्फ यह चाहते थे कि किसी तरह अमेरिकी फौजें वापस चली जाएं। जैसी रूसी फौजों की वापसी के साथ ही नजीबुल्लाह सरकार धराशायी हो गई थी, वैसे ही तालिबान का गणित है कि अब गनी सरकार के दिन भी गिने-चुने ही हैं।

तालिबान का यह सपना सच होता लग रहा है। इसीलिए अमेरिका उन 2500 अफगान नागरिकों को अपने देश ले आया है, जो पिछले 20 साल से अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों की मदद कर रहे थे। बाइडेन-प्रशासन को पता है कि काबुल की अगली सरकार के राज में इन नागरिकों की जान को पूरा खतरा है।

दुनिया के कई शक्तिशाली राष्ट्रों ने मिलकर तालिबान की इस घोषणा के विरुद्ध बयान दिया कि तालिबान मिल-बैठकर अफगान-संकट को हल करना चाहते हैं। उन्होंने तालिबान पर आरोप लगाया कि वे निहत्थे लोगों पर हमले कर रहे हैं, संपत्तियां लूट रहे हैं और पिछले कई हफ्तों से दोहा में बातचीत का ढोंग रचाए हुए हैं।

जिन 15 राष्ट्रों ने यह संयुक्त बयान जारी किया है, उनमें ज्यादातर वे हैं, जिन्होंने अमेरिकियों के साथ-साथ अपनी फौजें भी काबुल में डटा रखी थीं या अफगानिस्तान में काफी पैसा लगाया था। तुर्की को भी आश्चर्य है कि काबुल हवाई अड्डे को संभालने के उसके इरादे का तालिबान ने विरोध किया है।

ध्यान देने लायक बात यह है कि अफगानिस्तान के दो पड़ोसियों की हवा खिसकी हुई है। भारत और पाकिस्तान, दोनों की बोलती बंद है। दोहा बातचीत के बारे में तालिबान नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने कहा है कि अभी काबुल सरकार से बातचीत टूटी नहीं है। शीघ्र फिर मिलेंगे। लेकिन होगा क्या? दोहा में बातचीत चलती रहेगी और काबुल की तरफ तालिबान का कब्जा बढ़ता चला जाएगा। न पाकिस्तान कुछ करता दिख रहा है और न ही भारत!

पाकिस्तान किसी भी हालत में तालिबान को नाराज़ नहीं करना चाहता। उसने अमेरिका को जरूरत पड़ने पर तालिबान पर हवाई हमले की सुविधाएं देने से साफ़ मना कर दिया है लेकिन वह घबराया हुआ है कि काबुल में तालिबान काबिज हो गए तो पहले की तरह लाखों अफगान पाकिस्तान में पसर जाएंगे। साथ ही यदि तालिबान सफल हो गए तो वे डूरेंड लाइन की भर्त्सना करेंगे और पेशावर को अफगानिस्तान में मिलाने की मांग भी कर सकते हैं।

इस बीच तालिबान ने अमेरिका, रूस, चीन, तुर्की, सऊदी अरब आदि देशों के साथ अपने संबंध सहज बनाने की कोशिश की है। भारत ने अफगानिस्तान में 3 बिलियन डॉलर लगाकर लोकप्रियता अर्जित की है। भारत चाहे तो वह गनी सरकार और तालिबान के बीच सार्थक मध्यस्थता कर सकता है लेकिन उसे इस वक्त अपने पाकिस्तान-विरोधी तेवरों को काबू करना होगा। यदि वह ऐसा कर सके तो अफगानिस्तान के साथ-साथ कश्मीर-समस्या के हल का रास्ता भी निकल सकता है।

भारत के पास क्या विकल्प?
भारत पिछले 20-22 साल से तालिबान का विरोध करता रहा है लेकिन वह गनी सरकार को बचाने के लिए फौजें भेजने की गलती कभी नहीं करेगा। भारत चाहे तो वह गनी सरकार और तालिबान के बीच सार्थक मध्यस्थता कर सकता है लेकिन उसे इस वक्त अपने पाकिस्तान-विरोधी तेवरों को काबू करना होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)