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लेफ्टि. जनरल एसए हसनैन का कॉलम:उरी में घुसपैठ पाकिस्तान के नए प्रयासों का संकेत! अफगानिस्तान की स्थिति के बहाने आतंकी समूह भारत में घुसपैठ की फिराक में

15 दिन पहले
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लेफ्टि. जनरल एसए हसनैन, कश्मीर में 15वीं कोर के पूर्व कमांडर - Dainik Bhaskar
लेफ्टि. जनरल एसए हसनैन, कश्मीर में 15वीं कोर के पूर्व कमांडर

हाल ही में उरी का घटनाक्रम चर्चा में रहा। 18 सितंबर 2021 को उरी गैरीसन पर हुए आत्मघाती हमले को पांच साल पूरे हुए थे। इसी दिन सेना ने आतंकियों की सलामाबाद नाला मार्ग से घुसपैठ की कोशिश को एलओसी पर नाकाम कर दिया। घुसपैठ की कोशिश कर रहे छह आतंकियों में चार पीओके में रह गए, जबकि दो हमारी तरफ फंस गए।

इन दो आतंकियों को खोजने के लिए उरी ब्रिगेड का दिन-रात लंबा ऑपरेशन चला। दो में से एक आतंकी मारा गया और दूसरा पकड़ा गया। पकड़ा गया 19 वर्षीय आतंकी अली बाबर गरीब पृष्ठभूमि से है। इधर 3 अक्टूबर 2021 को उरी सेक्टर में 25 करोड़ के ड्रग्स भी पकड़े जाने की खबरें भी आ रही हैं।

यहां महत्वपूर्ण यह है कि पाकिस्तानी भारत-विरोधी आतंकी समूह 2019 के बाद से लगातार चिढ़े हुए हैं, जबसे 5 अगस्त 2019 को राजनीतिक और संवैधानिक फैसलों ने भारत के प्रयासों को नई दिशा दे दी है और आतंकी अपनी करतूतों को अंजाम नहीं दे पा रहे हैं।

भारत की सफलता के पीछे जम्मू-कश्मीर में फलते-फूलते उन नेटवर्कों को निशाना बनाने की रणनीति थी, जो आतंकवाद और अलगाववाद को कुछ समय तक दबकर रहने और फिर ज्यादा तेजी से वापसी करने में मदद करते थे। यह मीडिया, वित्त, बौद्धिक, अकादमिक, कानूनी और राजनीति क्षेत्रों के संबंध में भी सही था, जो सभी ‘ओवर ग्राउंड वर्कर्स’ (ओडीडब्ल्यू) के तहत काम कर रहे हैं। हमारी एजेंसियों ने इन्हें रोकने में अच्छा काम किया है, पर अभी पूरी सफलता नहीं मिली है।

अब भी भारत-विरोधी तत्व सक्रिय हैं। आतंकी समूहों की गतिविधि ओजीडब्ल्यू पर काफी निर्भर है। अगर कश्मीर में 100 आतंकी भी सफलतापूर्वक घुसपैठ कर लें, तो मौजूदा माहौल में उनका बचना मुश्किल है। फिर भी उस तरफ वालों को मौके का इंतजार है क्योंकि वे सोचते हैं कि भारत की यह सफलता अस्थायी है।

तालिबान 2.0 के तहत अफगानिस्तान को ऐसा मौका देने वाला माना जा रहा है। स्पष्ट है कि पाकिस्तान के पास आतंकी समूहों में भर्ती होने वाले लोगों की कमी नहीं है, इसलिए नहीं क्योंकि ऐसे लोग लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूहों के उद्देश्य को अपना मानते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें अपने घरों में भूखे पेट भरने हैं।

ऐसे तत्व उनका पेट भरने वाले किसी भी समूह से जुड़ जाते हैं। उन्हें भारत से नफरत करने वाला बनाना मुश्किल नहीं है। पाकिस्तान में हथियार भी पर्पाप्त मौजूद हैं, पिर भी अफगानिस्तान की स्थिति से दो बातें पाकिस्तान और आतंकी समूहों के हित में हुई हैं।

पहली, अत्याधुनिक सैन्य हथियारों की भारी उपलब्धता। ऐसे कई हथियार तालिबान 2.0 से पाकिस्तान पहुंच सकते हैं। दूसरी, जिस तरह से अफगानिस्तान से अमेरिका गया है, इससे यह धारणा बन रही है कि तालिबान ने दो महाशक्तियों पर जीत हासिल कर ली है और इससे आतंकियों के प्रेरित होने की आशंका है। वे सोच सकते हैं कि जिहादी और अतिवादी होना अच्छा है। पाकिस्तान का डीप स्टेट इन भावनाओं का फायदा उठा सकता है।

हमें याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में छद्म युद्ध में काफी निवेश किया है। वह फिर से वैचारिक रूप से प्रेरित जिहादियों को घुसपैठ के जरिए तैयार करने की कोशिश करेगा। उसकी मंशा वर्षों से हासिल की उस बढ़त को फिर पाने की है, जो हाल ही में कम हो गई है।

पाकिस्तान में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति भी चिंता का विषय है। अफगानिस्तान में मानवीय त्रासदी से अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर अस्तव्यस्तता की आशंका है क्योंकि लाखों शरणार्थी पाकिस्तान पहुंचेंगे। आतंकवादी तत्व इसे पाकिस्तान में प्रवेश करने का एक सुविधाजनक तरीका मानेंगे।

इस प्रकार पाकिस्तान एक दुविधा में है, लेकिन अपने जम्मू-कश्मीर में निवेश को खोने का जोखिम नहीं उठा सकता। ऐसा कुछ भी करने की संभावना नहीं है जिसपर केंद्रित प्रतिक्रिया की जरूरत पड़ जाए। कोई बड़ी घटना की बजाय वह सोशल मीडिया, मस्जिद, विचारक और नेटवर्क संदेशों के जरिए भावनाएं जिंदा रखना चाहेगा।

इस विश्लेषण के आधार पर उरी घुसपैठ से मिले संकेतों में दो चीजें स्पष्ट होती हैं। पहली, जिहादी समूहों के लिए उनकी क्षमता के बारे में भावनाएं बनाए रखना जरूरी है, कहीं ऐसा न हो कि वे जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद में विश्वास करने वालों के बीच अपना महत्व खो दें। आतंकियों की बढ़ी हुई संख्या से उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और यहां तक कि छोटी-मोटी आतंकी गतिविधि के लिए भी इन आंकड़ों की जरूरत है। ठंड के मौसम में ऐसे प्रयास बढ़ जाएंगे क्योंकि उरी जैसे इलाके खुले रहेंगे।

दूसरा, पाकिस्तान 2016 जैसी कोई योजना बना सकता है। उस साल, सुरक्षा बलों की बहुत घनी उपस्थिति के कारण भीतरी इलाकों में हमला करना बेहद मुश्किल हो रहा था। इसलिए, एलओसी के आसपास (5-10 किमी) में लक्ष्य बनाना आम हो गया था। इसलिए पुंछ, टंगधर और अन्य इलाकों में लगातार आतंकी हमलों के प्रयास हो रहे थे। अंत में, यह संभावना है कि इस समय कुछ भी बड़ा न हो। हालांकि, गतिविधियों में सोची-समझी बढ़ोतरी और संख्या बढ़ाने के प्रयास देखने मिल सकते हैं।

उरी में नशीली दवाओं की खेप वित्तीय वृद्धि की दिशा में गंभीर प्रयासों का संकेत देती है, जो नेटवर्क के काम करने के लिए जरूरी है। भारत के लिए, अलगाववादी और वैचारिक भावना को बढ़ाने के अपरिहार्य प्रयासों का मुकाबला करने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के भीतर नेटवर्क को निरंतर निष्प्रभाव करना जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें एक समग्र रणनीति की दिशा में काम करना चाहिए जिसमें गतिशील, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक और शासन से संबंधित मुद्दे शामिल हों।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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