ओम गौड़ का कॉलम:कोरोना में घटते रोजगार पर पड़ी महंगाई की मार

4 महीने पहले
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ओम गौड़, नेशनल एडिटर (सैटेलाइट), दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
ओम गौड़, नेशनल एडिटर (सैटेलाइट), दैनिक भास्कर

कोरोना की दूसरी लहर अब महंगाई के रूप में अपना विकराल रूप दिखा रही है। थोक महंगाई दर 12.94% के रिकॉर्ड स्तर पर, तो खुदरा मुद्रास्फीति 2% बढ़ गई है। महंगाई के इन आंकड़ों का आम उपभोक्ताओं पर सीधा असर पड़ेगा। पिछले 5 माह से बाजार महंगाई में बढ़ोतरी का शिकार है।

इस बेतहाशा वृद्धि के पीछे पेट्रोलियम पदार्थों की दरों में आया उछाल वजह माना जा रहा है। दरअसल पेट्रोल-डीजल तो जैसे केंद्र व राज्य सरकारों के हाथ से बाहर हो गए हैं। राज्य न केंद्र की सुन रहे हैं और न ही उपभोक्ताओं के दर्द को समझ रहे हैं। पेट्रोलियम पदार्थों पर केंद्र के टैक्स के अलावा राज्यों ने अपनी मर्जी से अलग टैक्स लगा रखे हैं।

हालात यह है कि पिछले 6 सप्ताह में 24वीं बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े हैं। इससे पहले ऐसा कभी नहीं देखा गया। महज बंगाल के साथ जिन राज्यों के चुनाव हुए, उस वक्त 18 दिनों तक कोई वृद्धि नहीं हुई। जैसे ही चुनाव समाप्त हुए दामों में बढ़ोतरी शुरू हो गई।

आज देश में बढ़ती महंगाई आम आदमी के बीच चर्चा का विषय है, क्योंकि खाद्य तेलों में 30.4%, फल 11.96%, दालें 9.39%, पेय पदार्थ 15.10%, कपड़े व फुटवियर 5.32% और ट्रांसपोर्टेशन में 12.38% का उछाल देखा जा रहा है। वैसे तो कहने के लिए इसके पीछे पेट्रोलियम पदार्थों में वृद्धि को वजह माना जा रहा है लेकिन यही अकेली वजह नहीं है। बाजार पर सरकारों का नियंत्रण लगभग समाप्त है। बाजार में बिक रही वस्तुओं और ऑनलाइन बेचे जा रहे खाद्य पदार्थों के रेट का अंतर देखें तो यह पूरा मामला समझ में आता है। क्या वजह है कि ऑनलाइन सामान सस्ता मिल रहा है?

सरकारों ने अगर महंगाई के नियंत्रण का कोई फॉर्मूला नहीं निकाला तो आगे चलकर ये देश का सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा क्योंकि काेरोना में आय का ग्राफ गिरा है और ऊपर से महंगाई की मार उपभोक्ताओं को झकझोर रही है। अर्थशास्त्रियों ने सरकार को संकेत दिए हैं कि खुदरा महंगाई दर में वृद्धि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी। महंगाई के आंकड़ों में एक बड़ा अंतर गांव और शहर के बीच भी नजर आ रहा है।

शहरों के मुकाबले गांवों में महंगाई ज्यादा है। इधर मैन्यूफैक्चरिंग से जुड़े उत्पादाें में भी 10.83% की बढ़ोतरी उद्योगों को भी प्रभावित करेगी। इस बीच बेरोजगारी दर में भी वृद्धि हुई है। महंगाई और बेरोजगारी से उबरने की दिशा में सरकारों काे पहल करनी होगी वरना यह संकट आपराधिक रूप अख्तियार करने लगेगा। देश में लूट और चोरियों की वारदातों में बढ़ोतरी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

एक बार हम यह मान भी लें कि महंगाई और बेरोजगारी कोरोना की देन है। सरकार की आमदनी में कमी आई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार अपना सारा बोझ आम आदमी पर डाले। सरकार ने अपने रूटीन के खर्चों में कहीं कोई कटौती क्यों नहीं की? सरकार को क्यों लग्जरी हवाई जहाज और सेंट्रल विस्टा जैसे प्रोजेक्ट की जरूरत है।

डेढ़ साल से जो उपभोक्ता कोरोना की मार झेल रहा है, बेरोजगार है, आखिर कब तक झेलता रहेगा। सरकारों की कोई जवाबदेही उनके प्रति है कि नहीं। संकट की इस घड़ी में नेताओं को कम से कम राजधर्म तो निभाना ही चाहिए।