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मनीष अग्रवाल का कॉलम:इंफ्रा विशेष सरकार लाई शहरी बसों के लिए नया कार्यक्रम; क्या पीपीपी से बेहतर हो पाएगी हमारे शहरों की बस व्यवस्था?

4 महीने पहले
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मनीष अग्रवाल, पार्टनर, प्राइसवाटरहाउसकूपर्स - Dainik Bhaskar
मनीष अग्रवाल, पार्टनर, प्राइसवाटरहाउसकूपर्स

प्राइवेट बस का स्वामित्व और संचालन दशकों से इंटर-सिटी (अंतर्शहर) यात्रा को बदल रहा है। रेलवे टिकट मिलने में होने वाली मुश्किलों और बेहतर होती सड़कों के चलते निजी सेक्टर लोगों को 6 से 12 घंटे तक की लंबी यात्राओं के लिए आकर्षित करने में सफल रहा है। शहर के अंदर बसों के संचालन में इस सफलता को दोहराने के लिए शहरी प्रशासन को काफी प्रयास करने होंगे।

भारत सरकार ने शहरी बसों के लिए पीपीपी कार्यक्रम शुरू किया है। ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट इसका आधार मॉडल है। इसके तहत बसों के निजी मालिक-संचालकों को तय शेड्यूल पर बसें चलाने के लिए मासिक राशि दी जाती है, जिसका संबंध यात्रियों की संख्या से नहीं होता। फिनलैंड और स्वीडन के शहर इस मॉडल के तहत बसें हासिल करते रहे हैं। (दूसरा मॉडल नेट कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट है, जहां किराये का राजस्व निजी संचालक रखते हैं और अगर राजस्व लागत से कम हो तो सरकार सब्सिडी देती है। कुछ भारतीय शहरों ने भी इसे सीमित सफलता के साथ अपनाया है।)

ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट मॉडल से निवेशकों की रुचि जागी है क्योंकि प्रदर्शन निवेशक के नियंत्रण में है। सरकारी प्राधिकरण इससे बसों का किफायती रखरखाव कर सकेंगे नागरिकों के लिए बसों की क्वालिटी बेहतर होगी। पर मॉडल की सफलता के लिए कई कदम उठाने होंगे। भारतीय शहरों में बसों की कमी नहीं है। कोलकाता और बेंगलुरु में हॉन्गकॉन्ग व सिंगापुर के बराबर (प्रति 10 लाख आबादी पर 600 से ज्यादा बस) और चेन्नई, हैदराबाद, पुणे तथा चंडीगढ़ में दुबई व मेलबर्न के बराबर (प्रति 10 लाख आबादी पर 400 बस) बसें हैं।

साथ ही भारतीय शहरों की बसों में (60-90% औसत ऑक्यूपेंसी), दुनिया के अग्रणी शहरों (20-40%) से ज्यादा भीड़ रहती है। इसलिए भारतीय शहरों में भीड़ और बसों की औसत गति चुनौती है। इससे न सिर्फ यात्रा में ज्यादा समय लगता है, बल्कि यह अनुमान भी मुश्किल होता है कि यात्रियों को कितना इंतजार करना होगा। इस कारण खुद की गाड़ी (खासतौर पर टू-व्हीलर) या ऑटो आदि को प्राथमिकता मिलने लगती है। इस चुनौती का सामना करने के लिए कई शहरों ने बीआरटीएस प्रोजेक्ट अपनाए हैं (यानी बसों के लिए अलग लेन)।

शहरी प्राधिकरण की वित्तीय स्थिति भी चुनौती है। इससे रखरखाव पर खर्च व समय पर नई बसें खरीदने की क्षमता प्रभावित होती है। आधुनिक बसों में नागरिकों के लिए लो-फ्लोर वाली बसें ज्यादा आरामदेह होती है, लेकिन ये महंगी भी होती हैं। ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट से इनमें कुछ चुनौतियों का समाधान हो सकता है, लेकिन निवेशकों की चिंता यह है कि क्या प्राधिकरण समय पर भुगतान करेंगे।

सिटी बस प्लानिंग, खरीद और संचालन में अब सुधार बहुत जरूरी है। कार्यक्रम के कायाकल्प में प्रदर्शन आधारित पीपीपी मॉडलों के तहत बसों की खरीद जरूरी घटक है। इलेक्ट्रिक बसें खरीदने (केंद्र सरकार की सब्सिडी का लाभ लेकर) का भारतीय शहरों की हवा की गुणवत्ता पर गहरा असर होगा। बसों के बड़े बेड़े के लिए ज्यादा यात्री मिलें, इसले लिए मेट्रो रेल की तर्ज पर फीडर-कनेक्टिविटी (लोगों को बस स्टॉप या स्टैंड तक पहुंचाने की व्यवस्था) की जरूरत भी होगी।

पीपीपी अनुबंधों की सेवा के लिए राज्य सरकार से मिलने वाले नियमित कैशफ्लो को शहर के प्राधिकरण को मिलने वाली नियमित सब्सिडी तक भी पहुंचाना चाहिए, साथ ही उन्हें प्रदर्शन से जोड़ा जाना चाहिए। वित्तीय रूप से मजबूत प्राधिकरण बेहतर शहर यातायात योजानाएं दे सकता है।

शहरी प्राधिकरणों को प्रशिक्षण और संस्थागत क्षमता बनाने की जरूरत भी होगी ताकि वे पीपीपी कॉन्ट्रैक्ट में प्रभावी काउंटर-पार्टी के रूप में काम कर सकें। अंत में, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल (बस ट्रैकिंग, टिकट पेमेंट, पार्किंग आदि में) बढ़ रहा है, लेकिन यह भी जरूरी है कि इस क्षेत्र में स्टार्टअप्स के लिए उनके इनोवेशन लागू करना आसान बनाया जाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)