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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:क्या पिता की महत्वाकांक्षा और पुत्र का खुश बने रहना भी जीवन के सिक्के के दो पहलू है

9 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

मार्टिन स्कोर्सेसे और क्रिस्टोफर नोलन भारत के लोकप्रिय सितारे अमिताभ बच्चन को सम्मान देने जा रहे हैं। भारतीय फिल्में इंटरनेट पर देखी जा रही हैं। भारत में अधिकतम दर्शक संख्या होने के कारण भी भारत को महत्व दिया जाता है। बेंगलुरु के एक सिनेमाघर में नोलन की फिल्म ‘द प्रेस्टीज’ 25 सप्ताह तक चली थी। बेंगलुरु जानकारियों और ज्ञान का केंद्र बना हुआ है। अब तो यह काल्पनिक लगता है कि कभी सिनेमाघरों में फिल्में देखी जाती थीं।

वैक्सीनेशन तेजी से किया जा रहा है। महामारी भी पकड़ के बाहर जाती सी दिख रही है। गोयाकि ज्यों-ज्यों दवा की त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया। सारे सिलसिले जारी हैं। मनुष्य की संघर्ष क्षमता अपार है। शोध करने वाले दिन रात परिश्रम कर रहे हैं। डॉक्टर, नर्स व अस्पताल सदैव की तरह सजग और क्रियाशील हैं। ग्रामीण क्षेत्र के नागरिकों की शक्ति की कोई सीमा नहीं है। 4 महीने से अधिक समय से जुझारू लोग संघर्षरत है। ये लोग बैलों की जगह भी खेत में काम करते रहे हैं।

संघर्ष की चक्की में पिसे लोग मजबूत होते जाते हैं। बैठे ठाले लोग टीका टिप्पणी करते रहते हैं। हर व्यक्ति अपनी लीक पर चल रहा है। अमिताभ बच्चन ने बहुत बीमारियां झेली हैं। ‘कुली’ की शूटिंग के समय लगी चोट उन्हें मौत के मुंह में ले गई। वे मृत्यु से आंखें चार कर लौट आए। युवावस्था में ही पीठ से एक 2 किलो मोटी गठान निकाली गई थी। उस खंदक को भी वह कंधे पर बैठाए काम कर रहे हैं। एक समय उन्हें मायस्थेनिया ग्रेविस नामक रोग हुआ था जिसने धनाढ्य एरिस्टोटल ओनासिस के प्राण लिए थे। समय रहते बीमारी का इलाज निकल आया।

संघर्ष करने वालों का समय भी साथ देता है। उन्होंने हेमा मालिनी के साथ एक फिल्म की थी जिसका नाम ही इस उम्र में उनके संघर्ष और संग्राम का परिचय देता है- ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’। वे महत्वाकांक्षा के घोड़े पर सवार हैं। उनका पुत्र अभिषेक बच्चन पैदल सिपाही है। अभिषेक बच्चन अभिनीत ‘बोल बच्चन’ सोद्देश्य मनोरंजन प्रदान करती है। उसमें उन घटनाओं का संकेत है जो बाद में घटी हैं। अभिषेक बच्चन में खुश रहने की अपार क्षमता है।

क्या पिता की महत्वाकांक्षा और पुत्र का खुश बने रहना भी जीवन के सिक्के के दो पहलू है या ‘शोले’ की तरह इसके दोनों पहलू समान हैं। आज बाजार की ताकतों ने खोटे सिक्के चला दिए हैं। जो मिल जाए वही खरा है और जो खो जाए वह खोटा सिक्का था। हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा में कड़वा सच भी शामिल है। विशेषकर कर्कल प्रकरण। बताया जा रहा है कि अमिताभ बच्चन अपनी आत्मकथा नहीं लिखने वाले हैं।

अमिताभ बच्चन अत्यंत अनुशासित व समय के पाबंद रहे हैं। सुबह 10:00 बजे की शूटिंग के लिए 8:00 बजे मेकअप करके आते रहे हैं। पूरी फिल्म यूनिट पर इस आचरण का प्रभाव पड़ता है। हिंदी बांग्ला और अंग्रेजी भाषाओं में स्वयं को अभिव्यक्त कर सकते हैं। आवाज में असर है। हर कालखंड में अमिताभ बच्चन व्यवस्था के साथ खड़े रहे हैं।

सामाजिक आक्रोश को प्रभावोत्पादक ढंग से प्रस्तुत करना उनका विलक्षण अभिनय रहा है। अभिषेक बच्चन ने कभी अपने राजनैतिक आदर्श की बात अभिव्यक्त नहीं की है। वह अपने मन की बात अपनी माता जया बच्चन से करते हैं। ‘कुली’ दुर्घटना के समय अस्पताल में भर्ती हुए अमिताभ बच्चन ने कविता लिखी -
बाहर
‘ऊपर मंडराते दरख्ते अधियारे छाते थे बादल, नीचे काली कठोर भद्दी चट्टानों पर, उछलकर मैली जलधि तरंगों की क्रीड़ा’
भीतर
सब उज्जवल शुद्ध साफ चादर सफेद, कोमल तकिए, धीमे धीमे स्वर से सिंचित ममतामई सारी देख रेख और मेरी एकाकी पीड़ा’
अमिताभ बच्चन ने कुछ कविता रची परंतु अभिषेक बच्चन अनअभिव्यक्त कविता की तरह रहे हैं।