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रीतिका खेड़ा कॉलम:देश के गांवों में 6% और शहरों में महज 25% लोगों के पास कंप्यूटर, ऐसे में ऑनलाइन लर्निंग कैसे कामयाब होगी?

एक वर्ष पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

इंग्लैंड में ऑनलाइन शिक्षा की वजह से पैदा हुए डिजिटल डिवाइड पर सूचनाप्रद कार्यक्रम देखते समय गोवा में उस 16 साल के छात्र की याद आई जिसने खुदकुशी इसलिए की क्योंकि परिवार का इकलौता फोन उससे गिर गया और उसे ठीक करवाने के लिए परिवार के पास 3000 रुपए नहीं थे। भारत में ऑनलाइन शिक्षा की सच्चाई क्या है?

मूल सुविधाओं की कमी
देश में कितने लोगों के पास लैपटॉप, कंप्यूटर या स्मार्टफोन है? नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार 2017 में ग्रामीण क्षेत्रों में 6% और शहरी क्षेत्रों में 25% के पास कंप्यूटर था। यह कमी कुछ हद तक स्मार्टफोन से पूरी कर सकते हैं, खासकर छोटी कक्षाओं में। ऐसे भी विद्यार्थी हैं जिनके परिवार में माता या पिता का एक ही मोबाइल है, जिसे परिवार के सभी सदस्य शेयर करते हैं। उनके लिए फोन का बंदोबस्त आर्थिक बोझ है।

केवल फोन या लैपटॉप का होना ही मुद्दा नहीं। बिजली की स्थिति सुधरी है, लेकिन लगातार बिजली ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी आम नहीं है। साथ ही ऑनलाइन शिक्षा के लिए विश्वसनीय इंटरनेट सुविधा भी अहम है। इंटरनेट की सुविधा 17% ग्रामीण और 44% शहरी के पास थी। काम करते-करते यदि बिजली चली जाए, या इंटरनेट रुक जाए तो बच्चों का काम खो जाता है, फिर से करना पड़ता है या परीक्षा में समय की कमी होती है।

हालांकि कई शिक्षा संस्थानों ने लाइव लैक्चर पर जोर नहीं दिया और रिकॉर्डिंग उपलब्ध करवा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ बच्चों को गांव से कई किमी दूर स्थित ई-कियोस्क या इंटरनेट कैफे जाकर लैक्चर डाउनलोड करने पड़ रहे हैं। चूंकि बिजली या इंटरनेट का भरोसा नहीं, तो परीक्षा के समय किसी परिजन के घर भी जाकर रहना पड़ रहा है।

घर का माहौल
बहुत से बच्चों के घरों में पढ़ाई का पर्याप्त माहौल नहीं है। जनगणना के अनुसार, देश की एक चौथाई आबादी एक कमरे के घर में रहती है। एक ही कमरे में 2-4 लोग हों और सभी को घर से काम करना हो या पढ़ाई करनी हो तो कैसे हो पाएगा?

लड़कियों पर एक और दबाव होता है। यदि वे घर पर हों तो मुमकिन है कि कई घरों में उनसे उम्मीद की जाएगी कि वे घर के कामों में हाथ बटाएं। लड़कों पर दूसरा दबाव हो सकता है कि वह दुकान पर मदद करे, ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार को खेत के काम में मदद की उम्मीद भी होगी। यह सब समस्या न भी हो, तब भी बच्चों के लिए घर पर मन लगाकर पढ़ना मुश्किल है।

क्लास में टीचर के डर से या आदर करने की वजह से, बच्चे ध्यान लगाने की कोशिश करते हैं। यदि क्लास में अनुशासन आसान नहीं, तो घर में तो और भी कठिन है। ऑनलाइन मीटिंग में भागीदारी कितनी आसान है। कैमरा और माइक ऑफ रखकर दूसरे काम भी चलते रहते हैं।

कॉलेज और स्कूल का माहौल
घर पर सब व्यवस्था होने से भी संपूर्ण शिक्षा पर प्रभाव पड़ रहा है। अलग उम्र के बच्चों के लिए भिन्न-भिन्न चुनौतियां हैं। छोटे बच्चों के लिए यह कि उनकी पढ़ाई का एक अहम हिस्सा है आंखों और हाथों में तालमेल (हेंड-आई कोऑर्डिनेशन)। इसके लिए कक्षा का माहौल और अन्य बच्चों का साथ मददगार होता है। अनुशासन की नींव (लाइन लगाकर खड़ा होना, समय पालन आदि) बचपन में पड़ती है। इनके लिए भी स्कूल का माहौल जरूरी है।

विश्वविद्यालय में जितना क्लास में सीखते हैं, उतना ही शायद क्लास से बाहर भी सीखते हैं। लैक्चर के बाद अन्य छात्रों के साथ मिलकर असाइनमेंट और चर्चा से पूरी समझ बनती है। जहां कॉलेज की शिक्षा अंग्रेजी भाषा में है और बच्चे हिन्दी या अन्य माध्यम के स्कूलों से आए हों, वहां नई चुनौती है।

कॉलेज में अंग्रेजी माहौल होने से अन्य भाषी बच्चे भी किसी न किसी तरीके से (दोस्तों से, सुनते-सुनाते) अंग्रेजी सीख जाते हैं। कभी-कभी कॉलेज की ओर से भी मदद मिल सकती है। लेकिन घर से पढ़ाई के चलते उनके लिए ये अहम सहारे छूट गए हैं।

काफी लोग ऑनलाइन शिक्षा से उत्साहित हैं
खुद को म्यूट करके और कैमरा ऑफ रखकर बिस्तर में लेटकर क्लास का मजा ही कुछ और है। लेकिन एक वर्ग के लिए ऑनलाइन शिक्षा ने उनकी कठिन जिदगी में एक नया मोर्चा खोल दिया है। केंद्रीय मंत्री लोक सभा में जब बयान देते हैं कि भारत में कोविड से कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं हुआ, तब वह इस वर्ग के संघर्ष को नजरअंदाज कर रहे हैं।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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