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एन. रघुरामन का कॉलम:चोट पहुंचाना आसान है, मरहम लगाना मुश्किल, शक्तिशाली लोगों को मरहम लगाने की कोशिश करनी चाहिए

10 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु। - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु।

सोमवार को बर्बर और भयानक घटना के एक वायरल वीडियो ने हम सभी को चौंका दिया। मध्य प्रदेश के गुना में एक गर्भवती महिला को उसके पति के परिवार के एक सदस्य को कंधे पर बैठाकर तीन किलोमीटर तक ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलने के लिए मजबूर किया गया।

हाथों में लाठियां और क्रिकेट बैट लेकर ग्रामीण साथ चल रहे थे। कुछ को महिला की बेइज्जती में आनंद आ रहा था, तो कुछ उसे लाठियों और बैट से मार भी रहे थे।

ऐसा शारीरिक अपमान शायद विकसित शहरों में दुर्लभ है लेकिन विकसित देशों समेत ज्यादातर मेट्रो शहरों में महिलाएं आज भी एक अलग प्रकार का अपमान सहती हैं, जिसकी ओर शायद दुनिया का ध्यान नहीं जाता। मैं ऐसी कई महिलाओं को जानता हूं जो पुरुषों और महिलाओं के साथ समान व्यवहार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करती है। लेकिन उनका अनकहा असंतोष यह है कि उन्हें मीटिंग्स में बोलने का पर्याप्त समय नहीं मिलता।

समय देने में इस भेदभाव के कारण कहीं दूरे बैठे बोर्ड ऑफ डायरेक्टर से अपनी बात कहने के लिए उन्हें समय चुराना पड़ता है, जिससे कभी-कभी नकारात्मक छवि बनती है।

कई शोधकर्ताओं ने साबित किया है कि जब केवल महिलाओं का समूह किसी विषय पर चर्चा करता है तो सभी को बोलने का बराबर मौका मिलता है और नकारात्मक व्यवधान नहीं होते। लेकिन जब उस समूह में पुरुष जुड़ जाते हैं, तो वे बराबर हिस्से से ज्यादा समय लेते हैं।

पुरुष चर्चा में महिलाओं को क्यों टोकते या रोकते हैं, इसपर 1975 के दौर से शोध हो रहे हैं। तब सांता बारबरा के डॉन जिमरमैन और कैडेंस वेस्ट ने महिला-पुरुष समूहों की 31 बैठकों का अध्ययन किया और पाया कि 48 में से 47 व्यवधानों के लिए पुरुष जिम्मेदार थे। इसी तरह जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी द्वारा 2014 में किए गए अध्ययन में पाया गया कि पुरुष के बोलने की तुलना में, महिला के बोलने पर पुरुष द्वारा टोकने की संभावना 33% ज्यादा होती है।

मैं हमेशा महिला मित्रों को सलाह देता हूं कि ऐसी स्थिति में वे अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के नक्शेकदम पर चलें। पिछले अक्टूबर तत्कालीन उपराष्ट्रपति माइक पेंस से बहस के दौरान हैरिस का एक वाक्य मशहूर हो गया। उन्होंने कहा, ‘वाइस प्रेसीडेंट जी, मैं बोल रही हूं। आपको एतराज न हो तो मैं अपनी बात पूरी कर लूं, फिर हम बात कर सकते हैं, ठीक है?’

उनके शब्द ‘आई एम स्पीकिंग’ (मैं बोल रही हूं) वायरल हो गए और टीशर्ट पर छपने लगे, जो 59 डॉलर तक में धड़ाधड़ बिकीं। आप समझ सकते हैं कि अमेरिका जैसे विकसित समाज में भी महिलाएं महसूस करती हैं कि उन्हें कार्यस्थल पर बोलने का बराबर मौका नहीं मिलता।

यही कारण है कि हैरिस के मामले में दो चीजें उनके पक्ष में रहीं। वे बहस के मंच पर आने वाली पहली अश्वेत और दक्षिण एशियाई महिला थीं और दूसरा, उनकी सख्त विनम्रता ने कई अमेरिकियों में उन्हें महत्वपूर्ण बना दिया। वे मजबूत थीं, उन्होंने समझौता नहीं किया और बिना गुस्से के बात रखी, ताकि उन्हें ‘एंग्री ब्लैक वुमन’ न कहा जाने लगे, जो उनकी राजनीतिक शोहरत को नुकसान पहुंचा सकती थी।

कई विशेषज्ञ कहते हैं कि बार-बार टोकना यह संकेत दे सकता है कि पुरुष अपना ओहदा ऊंचा मानता है। पुरुष वाद-विवाद जैसे प्रतिस्पर्धी सार्वजनिक माहौल में अपना प्रभुत्व दिखाने के लिए अक्सर समाज में ज्यादा दिखावा करते हैं और सोचते हैं कि टोकना शक्तिशाली कदम है। चोट पहुंचाना आसान है, मरहम लगाना मुश्किल। शक्तिशाली लोगों को मरहम लगाने की कोशिश करनी चाहिए।

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