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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:भूत-प्रेत की फिल्में और अंधविश्वास; भूतों में भी होता है हास्य पैदा करने का माद्दा

3 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

आश्चर्यजनक है कि आधुनिक अमेरिका में भी कुछ लोग भूत-प्रेत के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। कई शोध संस्थान इस विषय पर वर्षों से काम कर रहे हैं। दरअसल, विज्ञान फंतासी जासूसी फिल्मों और भूत- प्रेत की फिल्मों में अंतर कर पाना कठिन होता है। यह श्रेणियां प्राय: मिल जाती हैं। इनके बीच की सरहदें समाप्त हो जाती हैं।

भारत में फिल्मकार एन.ए अंसारी की फिल्म कंपनी बुंदेलखंड फिल्म संस्था पहली भारतीय फिल्म कंपनी थी जो भूत-प्रेत की फिल्मों का निर्माण करती थी। चलते-फिरते व्यक्तियों की तस्वीर लेने की विधा का आविष्कार 1895 में हुआ और पहली भूत-प्रेत की फिल्म ‘डॉक्टर कलहारी का केबिन’ 1916 में प्रदर्शित हुई। इस श्रेणी की ‘गोलम’ नामक फिल्म भी बनी थी।

प्राचीन पुस्तक में लिखा है कि जीव की विविध योनियों में भूत को भी एक योनि माना गया है। तर्क तो यह कहता है कि मनुष्य अपने भय से ही भूत आकल्पन को जन्म देता है। महमूद ने इसी विषय पर हास्य फिल्म ‘भूत बंगला’ बनाई थी, जिसमें महमूद के मित्र संगीतकार राहुल देव बर्मन ने भी अभिनय किया था। उपन्यास ‘ड्रेकुला’ से प्रेरित अनेक फिल्में बनाई गई हैं।

मनुष्य का रक्त पीने वाला पात्र ड्रेकुला विविध भेष धारण करने में प्रवीण है। वह आम आदमियों के बीच उन्हीं की तरह रहते हुए अपने शिकार की खोज करता है। एक कल्पना यह भी की जा सकती है कि क्या कोरोनावायरस का खून पीने से ड्रेकुला को भी महामारी हो सकती है और उसके संसार में वैक्सीन काम नहीं आ सकती, इसलिए भूत-प्रेत की आबादी कम हो सकती है।

अमोल पालेकर की फिल्म ‘पहेली’ की कथा में प्रस्तुत है कि विवाह के अगले ही दिन पिता के आदेश पर पुत्र, धन कमाने दूसरे शहर जाता है। उसका हमशक्ल एक भूत उसकी जगह पर घर आ जाता है। इस भूत को विवाहिता से प्रेम हो जाता है। कुछ समय बाद भूत अन्य स्थान पर चला जाता है। विवाहिता की ननद कहती है कि वह कोई विशेष पूजा करे ताकि उसका पति शीघ्र ही लौट आए।

पत्नी जवाब देती है कि जो व्यक्ति विवाह के अगले ही दिन, धन कमाने अन्य शहर चला जाए, ऐसे लोभी की वापसी के लिए मन्नत करना या पूजा और उपवास करना उसे व्यर्थ लगता है। गौरतलब है कि पीटर निकोलस ने अपनी किताब ‘फैंटास्टिक सिनेमा’ में भूत-प्रेत फिल्मों के विकास का पूरा विवरण प्रस्तुत किया है।

प्रसिद्ध फिल्मकारों ने इस श्रेणी की फिल्में कई सारी फिल्में बनाई हैं, जिनकी फेहरिस्त बहुत लंबी है। इस विधा में अजीबोगरीब कल्पना भी की गई है कि एक भूत और महिला की अंतरंगता से जन्मा शिशु एक भला मनुष्य सिद्ध होता। मनुष्य की गर्भ रसायनशाला हमेशा अच्छाई को ही जन्म देती है। उसे बिगाड़ती तो अन्याय आधारित व्यवस्था है।

भूत-प्रेत फिल्मों में प्राय: भूत एक विशेष धार्मिक प्रतीक से डरता है और उस प्रार्थना स्थल का पवित्र जल छिड़कने से भूत भाग जाता है। इस तरह धार्मिक प्रचार का माध्यम भी ये फिल्में बनी हैं। डर के समय निकली चीख भी प्रार्थना बन जाती है। इन हालात में ध्वनि बहुत उपयोगी सिद्ध होती है।

किसी भी व्यक्ति को लंबे समय तक खामोश रहने देना भी चिंताजनक होता है। इसीलिए जिस महिला का पति मरता है उसे रोने के लिए कहा जाता है। दुख के अतिरेक में भी व्यक्ति खामोश रह जाता है। एक फिल्म में विधवा रोती नहीं है। विधवा को इंश्योरेंस कंपनी से धन मिलता है, जिसे वह लोभी रिश्तेदारों को देकर चली जाती है।

उसे यह संदेह भी है कि बीमा राशि पाने के लिए ही उसके पति को मारा गया है। नदी किनारे दो व्यक्ति बात कर रहे हैं। एक-दूसरे से कहता है कि क्या वह भूत में विश्वास करता है? जवाब आता है कि मैं भूत में विश्वास नहीं करता। अगले ही क्षण सवाल पूछने वाला गायब हो जाता है। अत: भूत में भी हास्य पैदा करने का माद्दा होता है।