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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:जयप्रकाश चौकसे का कॉलम - प्रकाश देखने के लिए अंधकार की सुरंग से गुजरना ही होता है

9 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

ऋतिक रोशन ने अपने ही क्षेत्र में परेशान एक व्यक्ति को ढांढस बंधाया है। प्रकाश देखने के लिए अंधकार की सुरंग से गुजरना ही होता है। इस बात से याद आया कि फिल्म ‘आंधी’ में गुलजार का गीत- ‘पत्थर की हवेली को शीशे के घरौंदों में तिनकों के नशेमन तक इस मोड़ से जाते हैं।’ एक बीते हुए दौर में राजा और नवाब अपने महल में सुरंग बनवाते थे कि दुश्मन फौज किले को घेर लें और युद्ध में पराजय द्वार तक पहुंचने वाली हो तो सुरंग के रास्ते सुरक्षित स्थान तक पहुंचा जा सके।

अपनी सुरक्षा के लिए सौ जतन करने होते हैं। मसलन दीवार पर रेंगती हुई छिपकली को नुकसान पहुंचाने के इरादे से मनुष्य उठता है तो छिपकली अपनी दुम को नीचे गिरा देती है ताकि इंसान दुम को देखता रह जाए और छिपकली अपना सुरक्षित ठिकाना ढूंढ ले। इस तरह के कार्य हर क्षेत्र में किए जाते हैं। अमिताभ बच्चन और तापसी पन्नू अभिनीत फिल्म ‘पिंक’ में बचाव पक्ष का वकील जज का ध्यान इस ओर आकर्षित करता है कि पुलिस डायरी के रोजनामचे में अंतिम भाग में एक वाक्य में रपट दर्ज है।

स्पष्ट है कि यह किसी बड़े आदमी के दबाव में बाद में किया गया कार्य है। गुरुदत्त की फिल्म ‘साहिब बीवी और गुलाम’ का प्रारंभ ही होता है कि आम रास्ता चौड़ा करने के लिए की गई खुदाई में एक नर कंकाल निकलता है। जिसके हाथ में पहने कंगन से पहचाना जाता है कि वह जमींदार घराने की बहू का कंकाल है। छोटी बहू की हत्या बड़े जमींदार के इशारे पर ही की गई थी।

सत्य घटना से प्रेरित फिल्म ‘शशांक रिडम्पशन’ में सजायाफ्ता मुजरिम सुरंग बनाने का काम करता है और उस स्थान पर पहरेदार की इजाजत से कलाकार मर्लिन मुनरो का पोस्टर जेल की कालकोठरी में लगाता है। मर्लिन मुनरो की मृत्यु पर आज तक अटकलें लगाई जा रही हैं। जॉन एफ कैनेडी के भाई की मर्लिन से गहरी दोस्ती थी। मर्लिन का शरीर इच्छाएं जगाता था। क्या वह ‘कार नेम्ड डिजायर’ थी। डिजायर बनाम डिनायल भी सुरंग की मानिंद है। जिसके दूसरी और कोई प्रकाश नहीं है।

जुगनू राह दिखा सकते हैं। हर क्षेत्र में प्रतियोगिता और प्रतिद्वंदिता मौजूद होती है परंतु बर्बर हो जाना आवश्यक नहीं है। कभी प्रतिद्वंदी सेल्फ गोल भी मार देता है। इसे अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना भी कहा जा सकता है। कोई व्यक्ति सारा समय मूर्ख नहीं बना रह सकता। कभी-कभी मूर्ख सा दिखना लाभदायक हो सकता है। व्यक्ति का निरापद लगना उसका सुरक्षा कवच बन जाता है। गलती करने वाला गरीब का बेटा है तो उसे थप्पड़ भर मारा जा सकता है। सरकारी रोटी क्यों खिलाई जाए।

परंतु अगर गलती करने वाला अमीर परिवार का व्यक्ति है तो वह आसानी से नहीं छोड़ा जा सकता। हमारा दंड विधान हैसियत पर निर्भर करता है। अपराधी का मजहब भी गंभीर मसला है। ऋषि कपूर अभिनीत ‘मुल्क’ में बचाव पक्ष की वकील कहती है कि ‘हम’ और ‘वो’ के चश्में सबको पहना दिए गए हैं। दरअसल ‘हम’ और ‘वो’ चश्मे नहीं रहे। वरन् वह नजर और नजरिया बन चुके हैं। क्या अब इंद्रधनुष में एक ही रंग है? कबीर का पिया सतरंगी कहां चला गया।

याद आता है ‘दिल से’ का गीत- ‘तू ही तू सतरंगी रे...दिल का साया हमसाया सतरंगी रे, मन रंगी रे...कोई नूर है तू क्यों दूर है तू...जब पास है तू एहसास है तू...कोई ख्वाब है या परछाई है सतरंगी रे...इस बार बता मंजूर हवा ठहरेगी कहां।’ फिल्में और गानों से आवाम की सोच और रुझान को समझा जा सकता है। हवा ने दीवार पर इबारत लिख दी है। हम उसे पढ़ नहीं पा रहे हैं। जरा ‘हम’ और ‘वो’ का चश्मा उतारिए जनाब। आप सब पढ़ लेंगे। पढ़े लिखे अनपढ़ के लिए हवा कान में कुछ कह रही है। शोर भरे सन्नाटे में कुछ सुनाई नहीं देता।