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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:किसी दौर के फिल्मी गीतों में की जाती थीं समाज की चिंताएं, भय और आशा- निराशा अभिव्यक्त

2 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

फिल्मकार जोया अख्तर की रणवीर सिंह और आलिया भट्ट अभिनीत फिल्म ‘गली बॉय’ को खूब सराहा गया है। फिल्म में मुंबई के साधनहीन लोगों की बस्ती, धारावी में रहने वाला युवा, उत्साह से भरा हुआ रहता है और अपनी गरीबी का भी जश्न मनाता रहता है। यह एक पूंजीवादी पैंतरा रहा है कि गरीबी को भी इतना अधिक आभा मंडित कर दो कि लोग फक्र से कहें कि हम गरीब हैं, मां के नसीब के बेटे हैं।

इस पूंजीवादी पैंतरे को फिल्मों ने भी बहुत सम्मान दिया है। प्राय: नायक गरीब और नायिका अमीर प्रस्तुत की गई है। कभी-कभी जोड़ियों में उलटफेर भी किया जाता है। गरीब नायिका प्राय: विद्या और अमीर नकारात्मक पात्र को माया नाम देकर उसे काल्पनिक प्राचीन कथाओं से जोड़ दिया जाता है। बहरहाल, धारावी क्षेत्र में जन्मा युवा प्राय: रैप गायन शैली में अपनी बात कहता है। दर्द से रिश्ते का निर्वाह करता है।

वह अपनी ही बस्ती की आलिया भट्ट अभिनीत पात्र से प्रेम करता है। ज्ञातव्य है कि हिंदुस्तानी सिनेमा में पहला रैप गीत, अशोक कुमार पर फिल्माया गया है, ‘रेल गाड़ी, रेल गाड़ी छुक छुक छुक छुक.. धरमपुर-ब्रह्मपुर, ब्रह्मपुर-धरमपुर, मंगलौर-बैंगलोर, बैंगलोर-मंगलौर, मांडवा-खांडव, खांडवा-मांडवा, रायपुर-जयपु, जयपुर-रायपुर, तालेगांव-मालेगांव, मालेगांव- तालेगांव, नेल्लूर-वेल्लू, वेल्लूर-नेल्लू..तड़क-भड़क...रेल गाड़ी, रेल गाड़ी।’

रैप भले ही तुकबंदी नहीं हो परंतु कविता भी नहीं है। रैप गायन से भिन्न है, रॉक संगीत। इम्तियाज अली की रणबीर कपूर और नरगिस फाखरी अभिनीत फिल्म ‘रॉकस्टार’ रही, जिसका गीत ‘साड्डा हक ऐथे रख’ इरशाद कामिल का लिखा प्रमुख गीत था। ‘रॉकस्टार’ में शम्मी कपूर ने मात्र दो सीन अभिनीत किए, परंतु विद्रोही नायक के चरित्र का सार इस संवाद द्वारा अभिव्यक्त किया गया है कि नायक जंगल का आज़ाद परिंदा है, जिसे किसी पिंजरे में कैद नहीं किया जा सकेगा।

ज्ञातव्य है कि अपनी प्रारंभिक फिल्मों के असफल होने के बाद मसाला फिल्मों के पुरोधा, शशधर मुखर्जी ने शम्मी कपूर को नई छवि देकर अपनी मानस पुत्री सायरा बानो के साथ फिल्म ‘जंगली’ में प्रस्तुत किया और अपने प्रचारकों से कहा कि शम्मी कपूर को रिबेल (विद्रोही) नायक की तरह प्रचारित करें। यह हॉलीवुड के स्टार जेम्स डीन की स्क्रीन इमेज की तरह थी। समय का खेल देखिए कि ऊर्जा से भरे याहू स्टार, शम्मी कपूर उम्रदराज होने पर व्हीलचेयर पर बैठे इबादत करते हुए प्रस्तुत किए गए हैं।

कुछ इसी तरह ‘आवारा’ और ‘मेरा नाम जोकर’ बनाने वाले राज कपूर उम्रदराज होने पर अपने पुत्र रणधीर कपूर की फिल्म ‘धरम-करम’ में मजरूह सुल्तानपुरी के लिखा गीत गाते हुए प्रस्तुत हैं कि ‘एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल।’ यही दुखद घटना घटी जब उनका आर.के स्टूडियो बेच दिया गया, लोनी स्थित फार्म हाउस बेचा गया परंतु उनके बोल अर्थात फिल्में आज भी बड़े प्यार से देखी जा रही हैं। बहरहाल, जावेद अख्तर ने भी समय की मांग के अनुरूप कुछ अलग अंदाज के गीत लिखे हैं।

‘मिस्टर इंडिया’ के लिए उन्होंने जिबरिश का इस्तेमाल किया था। फिल्म ‘तेज़ाब’ के लिए ‘एक दो तीन.. तेरा करुं दिन, गिन-गिन के इंतजार’ लिखा। ‘आधा गांव’ जैसे प्रसिद्ध उपन्यास को लिखने वाले राही मासूम रजा, जावेद अख्तर को ‘जादू’ कहकर संबोधित करते थे। वर्तमान में ‘गली बॉय’ और ‘रॉकस्टार’ का जिक्र इसलिए किया जा रहा है कि आज सभी क्षेत्रों में रैप और रॉक ही चल रहा है। बड़े-बड़े लोकप्रिय लोग आम सभाओं में भाषा का सबसे कमजोर अलंकार अनुप्रास का उपयोग कर तालियां बजवाते हैं।

किसी दौर के फिल्मी गीतों में समाज की चिंताएं, भय और आशा- निराशा अभिव्यक्त की जाती थीं। बसंत देव ने ‘उत्सव’ के लिए लिखा ‘रात शुरू होती है आधी रात को’ और इसी फिल्म में रेखा पर फिल्माया गीत है, ‘नीलम के नभ छाई पुखराज़ी झांकी, मेरे तो नैनों में किरणों के पाखी।’ गोया कि, भाषाओं में बहनापा होता है, वें शत्रु नहीं हैं परंतु वोट बैंक छद्म युद्ध कराता है।

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