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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:हर क्षेत्र में कुछ लोग मलाई खा रहे हैं और अधिकांश का गुजारा छाछ पीकर हो रहा है

7 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

फिल्म सितारों की पोषाक बनाने के लिए उनके अपने ड्रेस डिजाइनर होते हैं। ये डिजाइनर निर्देशक से पात्र की जानकारी लेकर पोषाक बनाते हैं। फिल्म में भीड़ का हिस्सा बने जूनियर कलाकारों को अपने कपड़े स्वयं बनवाने होते हैं। यही नहीं जिस जूनियर कलाकार के पास अच्छे वस्त्र हों तो उसे काम आसानी से मिल जाता है। एक दौर में मगनभाई ड्रेस वाला से जूनियर कलाकार शूटिंग के लिए कपड़े किराए से लिया करते थे।

अपने कॅरिअर के प्रारंभ में सलीम खान, अभिनेता बनना चाहते थे। कुछ फिल्मों में उन्होंने छोटी-मोटी भूमिकाएं अभिनीत की हैं। एक बार निर्माता ताहिर हुसैन से सलीम ने एक फिल्म में अभिनय के लिए 1500 रुपए मांग लिए। ताहिर का कहना था कि पिछली फिल्म में तो पांच सौ ही दिए थे अब 1500 क्यों? सलीम साहब जिद पर अड़ गए तो ताहिर ने उन्हें 1500 रुपए दिए। ताहिर की मजबूरी यह थी कि उनकी एक फिल्म के लिए सलीम खान ने अपने लिए एक महंगा सूट बनवाया था क्योंकि पटकथा की मांग थी।

उसी सूट के लिए ताहिर साहब 1500 देने को राजी हुए। इस तरह वस्त्र भी फिल्म उद्योग में मनुष्य को रोजी-रोटी दिला सकते हैं। फिल्म ‘श्री 420’ में संवाद का आशय है कि मनुष्य वस्त्र धारण करता है न कि वस्त्र मनुष्य को धारण करते हैं। एक बार एक सनकी बादशाह ने ऐलान करवाया कि सबसे महीन वस्त्र बनाने वाले को इनाम से नवाजा जाएगा। एक चतुर व्यक्ति दरबार में वस्त्र टांगने का हैंगर लेकर आया और उसने स्वांग रचा कि यह महीन वस्त्र वह एक दरबारी को पहना रहा है।

दरबारी से उसके पहने हुए वस्त्र उतारने को कहा। इसके बाद उसने उस दरबारी को अपने बनाए महीन वस्त्र पहनाए। दरअसल वह दरबारी निर्वस्त्र ही घूमता रहा। कुछ दिन तक यह ठगी का सिलसिला चलता रहा। धीरे-धीरे सारी बस्ती निर्वस्त्र घूमने लगी। एक दिन दरबार के एक बुद्धिमान ने आईना दिखाकर यह ठगी बंद करवा दी। भानु अथैया, नामक ड्रेस डिजाइनर को सर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ की ड्रेस डिजाइनिंग के लिए ऑस्कर से नावाजा गया था। ‘मुगल-ए-आजम’ में अनारकली को लोहे की जंजीरों में बांधा जाता है।

के.आसिफ ने असली लोहे की जंजीर बनवाईं। ‘बेकस पे करम कीजिए सरकार-ए-मदीना’ नामक गीत के लिए बीमार चल रहीं मधुबाला को असली जंजीर पहनाई गईं। असल लोहे की जंजीरें पहनाना फिल्मकार की अपनी ख़ब्त होती है। फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ के लिए बिमल रॉय उस कलाकार को लेना चाहते थे जो गरीब और कई दिनों का भूखा लगे। इस भूमिका के लिए बलराज साहनी सूट पहनकर बिमल रॉय से मिलने आए तो वे उन्हें लेना नहीं चाहते थे।

बिमल रॉय के साथियों ने कहा कि बलराज से कलकत्ता में हाथ रिक्शा खिंचवाया जाए और रश प्रिंट देखकर ही निर्णय लें। फिर क्या था बलराज के अभिनय ने सबको दंग कर दिया। इसी तरह फणीश्वर नाथ रेणु भी राजकपूर को फिल्म ‘तीसरी कसम में’ गाड़ीवान हीरामन की भूमिका में नहीं लेना चाहते थे। शैलेंद्र जिद पर अड़ गए कि कुछ दिन की शूटिंग करके देखी जाए।

यह प्रयोग करते ही फणीश्वर उछल पड़े और बोले यही तो मेरा गाड़ीवान हीरामन है। फिल्म जगत में संजीव कुमार पूरी पटकथा सुनने के पश्चात अपनी पोशाक अपने खर्च पर स्वयं ही बनवाते थे। आम आदमी की बात करें तो उनके लिए आजकल तो शादी पर पहनने वाली महंगी शेरवानी भी किराए पर मिल जाती है। कुछ अत्यंत लोकप्रिय कलाकार अपने रिश्तेदार को ड्रेस डिजाइनर नियुक्त करते हैं। हर क्षेत्र में मलाई कुछ लोग खा रहे हैं और अधिकांश का गुजारा छाछ पीकर हो रहा है। बहरहाल, इन लोगों को भूख बड़े प्यार से पाल रही है।