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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:प्रेम को आवश्यकता से अधिक महत्व देने की अपेक्षा, काम को पूरी लगन और क्षमता से करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए

10 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

एक प्राचीन कथा में एक पात्र को साहित्य से बड़ा लगाव है। उसी कथा में एक अन्य पात्र एक महिला से प्रेम करता है लेकिन वह साहित्य प्रेमी नहीं है। साहित्य से परहेज करने वाला यह व्यक्ति अपने साहित्य प्रेमी मित्र से निवेदन करता है कि वह उसे कुछ प्रेम पत्र लिखकर दे, जिसे वह अपनी प्रेमिका को देकर उसे इम्प्रेस करेगा, क्योंकि साहित्य प्रेमी होने के कारण वह सुंदर शब्दों और अभिव्यक्ति के साथ प्रेम पत्र लिख सकता है।

उन दोनों की शादी हो जाती है और महिला उसके दिए प्रेम पत्रों से बहुत इंप्रेस होती है। बहरहाल उनकी शादी के बाद, देश में छिड़ी जंग में महिला का पति और उसके लिए प्रेम पत्र लिखने वाला साहित्य प्रेमी दोनों ही मारे जाते हैं। महिला को किसी तरह ज्ञात होता है कि शादी से पहले वे प्रेम पत्र उसे उसके पति ने नहीं बल्कि पति के साहित्य अनुरागी मित्र ने लिखे थे और उन पत्रों को पढ़कर उसे पति से प्रेम हुआ था।

युद्ध क्षेत्र में मृत पड़े अपने शौर्यवान और साहित्यकार प्रेमी के शव को देख कर वह मन ही मन कहती है कि उसने जीवन में एक बार प्रेम किया परंतु प्रेम को दो बार खोया। एक अन्य कहानी में एक 90 पार व्यक्ति की 88 वर्षीय पत्नी को पुराने कबाड़े से एक प्रेम पत्र मिलता है। महिला को यह पता चलता है कि दशकों पूर्व उसके पति को किसी अन्य महिला से प्रेम हुआ था। यह जानकर वह पति से झगड़ती है।

पड़ोसियों ने उसे समझाया कि इतनी पुरानी बात पर अब हंगामा अनुचित है। यह सुनकर पति- पत्नी मिलकर पड़ोसियों से झगड़ जाते हैं। उनका कहना था कि उनके व्यक्तिगत मामले में दूसरे दखल न दें। मनुष्य स्वभाव से ही विचित्र है। हम मनुष्य सारे समय अनुमान लगाते रहते हैं। अत: इस तरह की पुरानी बातों से भी बखेड़ा शुरू हो जाता है। फिल्म ‘संगम’ का गीत है, ‘ओ मेरे सनम, ओ मेरे सनम, जो सच है सामने आया है, जो बीत गया एक सपना था, ये धरती है इंसानों की कुछ और नहीं इंसान हैं हम।’

दरअसल हम सब आधे-अधूरे माटी के पुतले हैं और व्यक्तित्व में संपूर्णता की तलाश करना हमारा आदर्श है। आदर्श हकीकत में बदले या न बदले पर उसका होना जरूरी है। फिल्म जगत में कई सफल कलाकारों की ऐसी अधूरी प्रेम कहानियां हैं जहां प्रेम के मारे इन सितारों ने धन-दौलत, इज्जत-शोहरत सबकुछ होते हुए भी मनचाहा जीवन साथी न मिलने के कारण आत्महत्या जैसे कदम तक उठाए हैं और अपनी जीवन लीला तक समाप्त कर ली है।

मेरी व्यक्तिगत राय है कि प्रेम को आवश्यकता से अधिक महत्व देने की अपेक्षा, अपने काम को पूरी लगन और क्षमता से करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए। मिलावटी प्रेम से बेहतर है प्रेमविहीन जीवन होना। जोया अख्तर की फिल्म ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ में व्यक्ति की मनोदशा की मनोरंजक कथा है, जहां जिंदगी से ऊब चुके लोग जीवन को एक अलग अंदाज में जीना चाहते हैं।

फिल्म, बचपन के तीन ऐसे दोस्तों की कहानी है, जिसमें वे एक-दूसरे के साथ एक बार फिर से जुड़ते हैं, वे अपनी व्यस्तताओं में काफी उलझ चुके हैं। अपने रुटीन से वे सभी दोस्त ऊब चुके हैं और अब वे जिंदगी का आनंद एक बार फिर से लेने के लिए वो भी अपने अंदाज में। इस दौरान वे कई सारे एडवेंचर करते हैं। फिल्मकार मधुर भंडारकर ने फिल्म ‘कॉर्पोरेट’ में कॉर्पोरेट जगत की हृदयहीनता अभिव्यक्त की है।

कॉर्पोरेट जगत में जासूसी भी होती है। प्रतियोगी, बाजार में कौन सा नया प्रोडक्ट लाने वाला है इसकी जानकारी पाने के लिए सारे हथकंडे आजमाए जाते हैं। बिपाशा बसु अभिनीत पात्र प्रतियोगी कंपनी के मालिक के साथ प्रेम का दिखावा करती है। कॉर्पोरेट जगत में लाभ कमाने के लिए किया गया सब काम, जायज माना जाता है।

मानवीय भावनाओं का शोषण भी किया जाता है। यहां मनुष्य को गिनी पिग की तरह इस्तेमाल किया जाता है। शरीर विज्ञान के क्षेत्र में दवा खोजने के लिए जानवरों पर प्रयोग किए जाते हैं। इन्हें ही गिनी पिग कहा जाता है। एक किताब में ऐसे ही व्यक्ति की आत्मकथा वर्णित है।