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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:बेहतर इंसान बनने में मदद करती हैं ‘चक दे इंडिया’ जैसी फिल्में

8 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

गौरतलब है कि खेल-कूद की पृष्ठभूमि पर आमिर खान और आशुतोष गोवरिकर की फिल्म ‘लगान’, निखिल आडवाणी निर्देशित ‘पटियाला हाउस’, अक्षय कुमार अभिनीत ‘गोल्ड’, राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फरहान अख्तर अभिनीत फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ तथा प्रियंका चोपड़ा अभिनीत ‘मैरी कॉम’ जैसी फिल्में सराही गई हैं। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद पर भी बायोपिक बनाई जा रही है।

बहरहाल, इन दिनों क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेल का हल्ला जोरों पर है और वर्तमान में टी-20 विश्वकप के क्रिकेट मैचों की दीवानगी अपने चरम पर है। हाल ही में भारत-पाकिस्तान के बीच एक क्रिकेट मैच के दौरान एक भारतीय गेंदबाज पर आरोप लगे कि उसने पाकिस्तान के खिलाफ जानबूझकर खराब गेंदबाजी की। अखबारों और सोशल मीडिया पर भी इस मसले को लेकर बातें हुईं और तमाम लोगों के बयान भी आए।

गौरतलब है कि आदित्य चोपड़ा और शिमित अमीन की फिल्म ‘चक दे इंडिया’ भी इसी मुद्दे से मिलती-जुलती है इसलिए इस फिल्म का जिक्र यहां फिर जरूरी हो जाता है। महिला हॉकी टीम प्रतियोगिता केंद्रित फिल्म ‘चक दे इंडिया’ का मुख्य पात्र, कोच कबीर भी इसी तरह के आरोपों का शिकार हुआ था। उसे भी गद्दार कहा गया था। हॉकी संगठन में उसके एक हितैषी ने सिफारिश की कि आगामी प्रतियोगिता में महिला हॉकी टीम का कोच कबीर को बनाया जाए।

अत: ऑस्ट्रेलिया में आयोजित होने वाली महिला हॉकी प्रतियोगिता के लिए बहुत जद्दोजहद के बाद बदनाम हुए खिलाड़ी कबीर को कोच बनाया जाता है। फिल्म में विभिन्न प्रांतों से महिला खिलाड़ी कोचिंग कैंप में प्रशिक्षण के लिए आती हैं। हर खिलाड़ी अपना परिचय देते हुए अपने नाम के साथ अपने प्रांत का नाम बोलती है। केवल एक खिलाड़ी अपने नाम के साथ भारत का नाम लेती है और यही दृश्य प्रभावोत्पादक है, जहां कोच इस खिलाड़ी के इस अंदाज से बेहद प्रसन्न होता है।

गोया की कोच कबीर का पहला प्रयास यही है कि उनकी टीम की हर खिलाड़ी प्रांतीयता के दायरे से बाहर निकलकर भारतीय होने पर गर्व करे। ज्ञातव्य है कि कोच कबीर प्रैक्टिस मैच में खिलाड़ियों की पोजिशन बदलता है। अग्रिम पंक्ति के खिलाड़ी को कुछ दिन गोल रक्षण के स्थान पर खिलाता है। बाद के दौर में उन्हें आक्रमण की अगली पंक्ति में स्थान देता है और दौड़ाता भी है। उसकी धारणा यह है कि हर खिलाड़ी हर स्थान पर खेलने की अभ्यस्त हो जाए।

ठीक इसी तरह अन्य क्षेत्रों में भी एक बेहतर प्रशिक्षक अपने प्रशिक्षणार्थियों के लिए बेहतर प्रयास करता है। मिसाल के तौर पर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की पाठशाला में नायक की भूमिका अभिनीत करने वाले कलाकार को पहले कुछ दिन तक खलनायक की भूमिका अभिनीत करने को कहा जाता है। स्कूल की गुरु अल्का जी द्वारा हर कलाकार को हर भूमिका अभिनीत करने के लिए कहा जाता था। इस तरह हर कलाकार को नाटक के सारे संवाद याद हो जाते थे।

यही नहीं अगर हम पौराणिक काल का जिक्र करें, तो गुरु द्रोणाचार्य तीरंदाज को गदा चलाने और गदा चलाने वाले को तीरंदाजी का प्रशिक्षण देते थे। द्रोणाचार्य, रथ चालक को भी शस्त्र चलाना सिखाते थे। उन्होंने तो अपने शिष्यों से आश्रम भी बनवाया और प्रशिक्षण पूरा होने के बाद आश्रम तोड़ने का आदेश भी दिया। दरअसल, आश्रम तोड़ना मोह-माया से मुक्ति पाने का प्रशिक्षण था।

बहरहाल, इस लेख को लिखने व ‘चक दे इंडिया’ जैसी फिल्म को पुन: याद करना यहां जरूरी हो जाता है। इस तरह अपनी बात कहने का उद्देश्य मात्र इतना है कि हमें संत कबीर के सतरंगी समाज की तरह बनना चाहिए। तमाम क्षेत्रियताओं और संकीर्णताओं से मुक्त होकर सच्चे अर्थ में स्वतंत्र होना चाहिए। अपने पूर्वाग्रह की बेड़ियों को हमें काटना होगा। ‘चक दे इंडिया’ और इस तरह की फिल्में हमें बेहतर इंसान बनने में मदद करती हैं।