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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:रबर की गेंद की तरह भूमिकाएं विचार की दीवार से टकराकर नए स्वरूप में आ जाती हैं वापस

14 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

ताजा खबर यह है कि श्रद्धा कपूर अभिनीत फिल्म ‘चालबाज इन लंदन’ की शूटिंग महामारी के चलते फिलहाल स्थगित कर दी गई है। गौरतलब है कि इससे पहले भी ‘राम और श्याम’, ‘सीता और गीता’ और ‘चालबाज’ जैसी इन तीनों फिल्मों में हमशक्ल पात्रों को लेकर पैदा हुई धुंध के मनोरंजक मोड़ और रोचक घटनाक्रम प्रस्तुत किए गए हैं। फिल्म ‘राम और श्याम’ में दिलीप कुमार हमशक्ल भाई हैं।

राम का पात्र एक सहमा हुआ व्यक्ति है क्योंकि नकारात्मक शक्ति के लिए उसका बुजदिल होना जरूरी है। इसके लिए रोज उसकी पिटाई होती है और उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है। फिल्म निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी की फिल्म ‘सीता और गीता’ में भी एक जुड़वां बहन अन्याय सहती है उसे निरंतर प्रताड़ित किया जाता है।

इत्तेफाक से डरी हुई बहन सीता घर से भाग जाती है और हमशक्ल दबंग गीता उसका स्थान लेती है और खलनायकों की जमकर पिटाई करती है। ‘राम और श्याम’ में चंचल श्याम, राम का स्थान लेते ही खलनायकों को जमकर सबक सिखाता है और उनकी खूब धुनाई करता है। ‘चालबाज’ फिल्म में श्रीदेवी अभिनीत हमशक्ल बहनें एक-दूसरे की जगह पहुंच जाती हैं।

इस फिल्म में दरअसल दब्बू पात्र को निरंतर घर में डरा कर रखा जाता है, वहां उसका भाई, बहन को रोज पिटते हुए और अत्याचार सहते हुए देखता है। उस अबोध बालक के लिए दबंग श्रीदेवी पात्र हाथ में कोड़ा लेकर दुष्टों की पिटाई करती है। आगे की कहानी में घर का पुराना वफादार सेवक, दबंग श्रीदेवी अभिनीत पात्र को सारा सच बताता है कि उसके स्वर्गीय पिता उसके लिए बहुत संपत्ति छोड़ गए हैं।

दुष्ट लोगों की निगाह उस दौलत पर है। फिल्म में दुष्ट खलनायक पात्र अपने साहसी रिश्तेदार को बुलाते हैं कि वह श्रीदेवी की पिटाई करें परंतु उलटा उस साहसी पात्र के ही बुरे हाल हो जाते हैं। बहरहाल, ‘चालबाज’ के नए संस्करण ‘चालबाज इन लंदन’ की अभिनेत्री श्रद्धा कपूर प्रसिद्ध फिल्मी खलनायक शक्ति कपूर की ही पुत्री हैं। संयोग की बात है कि रबर की गेंद की तरह भूमिकाएं विचार की दीवार से टकराकर नए स्वरूप में वापस आ जाती हैं।

संजीव कुमार ‘सीता और गीता’ फिल्म में नायक रहे, तो ‘चालबाज’ में सनी देओल ने यह भूमिका अभिनीत की थी। ऐसा माना जाता है कि हर एक कालखंड में इंसान के कम से कम 7 हमशक्ल होते हैं। कहा जाता है, जब विनोद खन्ना, आचार्य रजनीश के साथ अमेरिका गए थे तब वहां अपने एक हमशक्ल से उनकी भेंट हुई थी। कुछ लोग मानते हैं कि इसी घटना के बाद विनोद खन्ना भारत लौट आए।

दरअसल, उनके हमशक्ल ने उन्हें बताया कि वह अपराधी है और पुलिस उसे खोज रही है। विनोद खन्ना को लगा था कि अमेरिका में रहते हुए कहीं उन्हें ही अपराधी की जगह पकड़ नहीं लिया जाए! संभवत: इसलिए उन्होंने वापसी का निर्णय लिया था। गौरतलब है कि हमशक्ल विषय पर अनेक फिल्में बनी हैं ‘फेस ऑफ’ नामक फिल्म में भी इस विषय को लेकर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया था।

फिल्मकार टीनू आनंद ‘शिनाख्त’ नामक फिल्म बनाना चाहते थे। इस तरह की कहानी में नीम बेहोशी में मरीज सुनता है कि डॉक्टर को भय है कि इस तरह के मामले में याददाश्त चली जाती है। इसके बाद वह चंगा होकर अपनी याददाश्त चले जाने का स्वांग रचता है। लेकिन सत्य जानकर उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है। उसे ज्ञात होता है कि उसकी प्रेमिका उसके नजदीकी मित्र को चाहती है। उसकी संपत्ति हथियाने के लिए उसके अपनों के द्वारा ही नाटक किया जा रहा है।

उसके वारिस उसके मरने का इंतजार कर रहे हैं ताकि उसकी जायदाद का बंटवारा हो सके। अंत में नायक अपने वकील मित्र से दस्तावेज बनवाता है कि सारी जायदाद अवाम की सहायता के लिए काम कर रहे एक ट्रस्ट को दी जाएगी। यह कार्य करके वह अनजान जगह चला जाता है। अंतत: वह समझ गया कि ‘कसमें वादे, प्यार-वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या, कोई किसी का नहीं ये झूठे नाते हैं नातों का क्या।