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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:मर्दानगी का परचम लिए घूमने वालों औरत जमीन नहीं कुछ और भी है

6 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय के आदेश पर अब महिलाओं को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रशिक्षण के लिए चुना जा रहा है। इस प्रशिक्षण के लिए कुछ महिलाएं फौजी परिवार से आई हैं परंतु 60 फ़ीसदी महिलाएं गैर फौजी परिवारों से हैं। एकेडमी में दाखिले के लिए कठिन परीक्षा पास करनी पड़ती है। ज्ञातव्य है कि एक दौर में केवल जासूसी के क्षेत्र में ही महिलाओं को प्रवेश मिलता था। जासूस माताहारी किंवदंती बन चुकी है।

फ्योदोर दोस्तोवस्की के उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में धन, ब्याज पर देने का काम महिला करती है। बहरहाल, समाज में यह माना जाता रहा है कि लड़की के वयस्क होने पर उसकी स्वतंत्रता समाप्त कर दी जाए। चीन में किसी लड़की को बचपन से ही लकड़ी के तंग के जूते पहनाए जाते हैं ताकि उसके पैर छोटे रहें। वहां छोटे पैर सुंदरता का मानदंड हैं। दक्षिण अफ्रीका में महिला के मोटे होंठ सौंदर्य का प्रतीक हैं।

‘फिल्म चक दे इंडिया’, ‘दिल बोले हड़िप्पा’ ‘मैरीकॉम’ महिलाओं के ऐसे ही संघर्ष की दास्तां हैं। कुछ महिला लेखिकाओं ने छद्म नाम रखकर अपनी रचनाएं प्रकाशित की क्योंकि महिला के लिए स्वतंत्र विचार प्रक्रिया रखना वर्जित था। दरअसल प्रतिभा और प्रशिक्षण के चलते कोई लिंग भेद नहीं हो सकता। आदिम काल से महिलाएं अपनी शारीरिक चपलता और अचूक निशाने की वजह से पुरुषों से आगे रहीं।

हम जैसे-जैसे विकसित होते गए, वैसे-वैसे ही कुछ मामलों में पिछड़ते गए। हमारे अंधविश्वास और पूर्वाग्रहों के कारण महिलाओं को कमतर आंका गया। सभ्यता की गाड़ी एक पहिए पर ही घिसट रही है। दोनों पहियों को समान महत्व दिया होता, तो हम समानता और न्याय की मंजिल पर पहुंच जाते। सिमोन द बोउआर ने सदियों से अत्याचार झेलती महिलाओं पर ‘सेकंड सेक्स’ नामक ग्रंथ रचा।

प्रसिद्ध लेखिका एमिली डिकेंस वर्षों अपने घर के बाहर नहीं निकलीं परंतु उनके लेखन से लगता है कि पृथ्वी की तरह निरंतर घूमती रहीं। उन्होंने उन भू-भागों का विवरण लिखा, जहां पर वे कभी गई ही नहीं थीं। वर्जीनिया वूल्फ ने भी एकांकीपन में अपनी शक्ति को खोजा। ओटीटी मंच पर प्रस्तुत ‘बंदिश बैंडिट्स’ में प्रस्तुत किया गया है कि नसीरुद्दीन शाह अभिनीत पात्र शास्त्रीय गायक है और अपने जीवन काल में एक किंवदंती बन गया है।

एक संगीत समारोह में उसने अपने से अधिक प्रतिभाशाली गायिका को सुना। प्रतियोगिता से डरे हुए इस पात्र ने उसे अपनी बहू बना लिया और उसके गायन पर प्रतिबंध लगा दिया। उस महिला ने बाद में उसके पोते को गायन कला में प्रवीण कर एक प्रतियोगिता में अपने ससुर को पराजित करवाकर वर्षों का हिसाब बराबर किया। सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक क्रांति कर दी। महिला शिक्षा अधिकार के लिए उन्होंने संघर्ष किया।

फिल्म उद्योग में भी पुरुष कलाकारों को महिला कलाकार से कहीं अधिक मेहनताना दिया जाता रहा है। इसके विरुद्ध करीना कपूर ने संघर्ष किया है। इसके कारण कुछ फिल्मों में उन्हें नहीं लिया गया। बाद में आदित्य चोपड़ा ने बीच का रास्ता सुझाया। पाकिस्तान की लेखिका सारा शगुफ़्ता ने महिला समानता पर कई रचनाएं कीं। लेकिन भयभीत पुरुष समाज ने उनका कत्ल करवाकर उसे आत्महत्या की तरह प्रचारित कर दिया।

सारा शगुफ़्ता की एक कविता का आशय है कि ‘मर्दानगी का परचम लिए घूमने वालों औरत जमीन नहीं कुछ और भी हैमर्दानगी का परचम लिए घूमने वालों औरत जमीन नहीं कुछ और भी हैमर्दानगी का परचम लिए घूमने वालों औरत जमीन नहीं कुछ और भी हैमर्दानगी का परचम लिए घूमने वालों औरत जमीन नहीं कुछ और भी है।’ स्मरण रहे कि पृथ्वी को मातृभूमि कहा जाता है। बहरहाल, महिलाओं का नेशनल डिफेंस एकेडमी में स्वागत किया जाएगा। इंदिरा गांधी और मार्गरेट थैचर और सिरिमावो भंडारनायके ने उच्च पदों पर रहकर साहसी निर्णय लिए।

एक देश की महिला प्रधानमंत्री सदन में अपने शिशु को स्तनपान कराती है और कभी किसी ने आपत्ति नहीं उठाई कुछ देश सचमुच स्वतंत्र हो गए हैं। कुर्तुल-ऐन-हैदर का उपन्यास ‘आग का दरिया’ भी महिला कृति है।