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कावेरी बामजेई का कॉलम:नाच-गाने ही हमारे सिनेमा की पहचान रहे हैं। ‘नाटु नाटु’ को मिले पुरस्कार से यह सिद्ध होता है

11 दिन पहले
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कावेरी बामजेई पत्रकार और लेखिका  - Dainik Bhaskar
कावेरी बामजेई पत्रकार और लेखिका 

वर्ष 1969 की फिल्म ‘प्रिंस’ में नृत्य के एक मुकाबले का दृश्य था, जो वैजयंती माला और हेलन पर फिल्माया गया था। वैजयंती एक भारतीय राजकुमारी की भूमिका में थीं और हेलन अंग्रेज युवती के रोल में। वैजयंती ने भारतीय नृत्य की प्रस्तुति दी- भरतनाट्यम से कथक तक, जबकि हेलन ने फ्लामेंको से बेली डांस तक का मुजाहिरा किया।

यह पूरब बनाम पश्चिम की टक्कर थी और दोनों के बीच शम्मी कपूर फ्रीस्टाइल शैली में नाच रहे थे। फिल्म की पृष्ठभूमि एक राष्ट्रीय कथानक पर आधारित थी, जिसमें ब्रिटिशों के प्रति वफादार एक रियासत को आजादी के बाद सरदार पटेल के नेतृत्व में भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनना था।

यह 2023 है, लेकिन आज भी राष्ट्रीय गौरव के तर्क के रूप में हम नाच-गान को प्रस्तुत कर रहे हैं और साम्राज्यवादी-पूर्वग्रहों का प्रतिकार कर रहे हैं। बात फिल्म ‘आरआरआर’ की हो रही है, जिसमें कोमुरम भीम और अल्लु सीताराम राजू को एक देसी मुकाबले में नृत्य करते हुए दिखाया गया है और उनकी कला एक फिरंगी महिला का दिल जीत लेती है।

मुकाबले से ठीक पहले भीम और राम का यह कहकर अपमान किया गया था कि उनमें आर्ट की समझ नहीं है। इससे जलसे में मौजूद अश्वेत ड्रमर्स और भारतीय सेवकों को बुरा लगता है। लेकिन जब नाच शुरू होता है तो बाजी उलट जाती है।

जब ‘नाटु नाटु’ गाने ने सर्वश्रेष्ठ गीत के रूप में अमेरिका का गोल्डन ग्लोब पुरस्कार जीता तो इसमें एक काव्य-न्याय ही निहित था। दशकों से नाच-गाने ही भारतीय सिनेमा की पहचान रहे हैं और ‘नाटु नाटु’ को मिले पुरस्कार से यह सिद्ध होता है कि हमें जो अच्छी तरह से करना आता है, उसी में हाथ साधते रहना चाहिए।

2009 में आई ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ को मिली अंतरराष्ट्रीय सफलता में उसके प्रसिद्ध गीत ‘जय हो’ का भी योगदान था, जो छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर डांस करते हुए देव पटेल और फ्रीडा पिंटो पर फिल्माया गया था। अतीत में यही विक्टोरिया टर्मिनस कहलाता था।

जब देव पटेल फ्रीडा पिंटो को देखते हैं, तब वे ब्रिटिश आर्किटेक्चरल इंजीनियर फ्रेडरिक विलियम स्टीवेंस की मूर्ति के पैरों में बैठे होते हैं, जिन्होंने इस टर्मिनस को डिजाइन किया था। यह 1887 में बनकर पूर्ण हुआ था, क्वीन विक्टोरिया के राज की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर। हाल ही में फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ को भी जो ध्यानाकर्षण मिला है, वह भी इस बात का प्रमाण है कि नाच-गाना भारतीय सिनेमा का प्राणतत्व है।

2002 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में इसी तरह से ‘देवदास’ ने सबका ध्यान खींचा था और ऐश्वर्या राय को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में ख्याति मिली थी। फिल्म का गीत ‘डोला रे’ बहुत प्रसिद्ध हुआ था। भारतीय फिल्मों के नृत्य-गीत इसलिए भी उल्लेखनीय हैं, क्योंकि उनमें अनेक लोकप्रिय धाराओं का समावेश हुआ है। भारतीय लोक और शास्त्रीय नृत्यरूपों के साथ ही हमारी फिल्मों में वॉल्ट्ज़, चा-चा-चा, ट्विस्ट, स्विंग, डिस्को, जैज़, हिप-हॉप, साल्सा, बेली डांसिंग यानी हर तरह के डांस-मूव्ज़ मिल जाएंगे।

ऐसा लगता है हाल के सालों में हिंदी सिनेमा अपनी यह डगर भूल गया है और इसके चलते अपनी यूएसपी से महरूम हो गया है। अलबत्ता साउथ के सिनेमा के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता, खासकर तमिल और तेलुगु फिल्मों के बारे में। कमल हासन ने तो भरतनाट्यम का प्रशिक्षण भी लिया है।

दुनिया के लिए फिल्में बनाने का यह मतलब नहीं कि हम उस चीज को भूल जाएं, जिसमें हमें महारत हासिल है। आज पश्चिम राजामौली से प्रभावित हुआ है तो उसका कारण यही है कि उन्होंने यह मानने की हिम्मत दिखाई कि पश्चिम के दर्शकों के लिए उन्हें अपनी फिल्म-निर्माण शैली को बदलने की जरूरत नहीं है।

वास्तव में जब लॉस एंजेलेस में ‘आरआरआर’ दिखाई गई तो दर्शक अपनी सीट छोड़कर उसके गानों पर थिरकने लगे थे। अब भी देर नहीं हुई है, हमें अपनी जड़ों की ओर लौट जाना चाहिए, क्योंकि उसमें ही हम अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाते हैं।

वर्ष 2011 में संजय लीला भंसाली ने उचित ही कहा था कि फिल्म उद्योग में आ रही नई लहर स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके फेर में हम कहीं अपने मेलोड्रामा, नाच-गाने, क्लासिकल साहित्य आदि को न भूल जाएं।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)