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एन. रघुरामन का कॉलम:बच्चे बैठे हों तो उन्हें मानसिक रूप से सक्रिय रखें, शरीर की सक्रियता भी अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी

11 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस मंगलवार ज्यादातर भारतीय आसमान उदास, तेज हवाओं वाला था और थोड़ी बारिश भी हुई। मैं जिस एयरक्राफ्ट में सफर कर रहा था, उसे भी मौसम के कारण रास्तेभर झटके लगे, इसलिए क्रू ने यात्रियों को सीट से उठने से मना किया था। अलग-अलग जगह बैठे कुछ युवा यात्रियों ने शिकायत की कि वे एक जगह लंबे समय तक नहीं बैठ सकते और उन्हें वॉशरूम जाना है। लेकिन दुर्भाग्य से क्रू मदद नहीं कर सका और ‘फास्टन द सीट बेल्ट’ साइन को इसका कारण बताया जो लगभग पूरे समय ऑन था।

उनमें से एक ने अप्रत्यक्ष रूप से मेरी ओर इशारा करते हुए मजाक किया, ‘लगता है कुछ उम्रदराज यात्री युवाओं से ज्यादा अच्छे से ब्लैडर कंट्रोल कर लेते हैं।’ दरअसल क्रू नहीं समझ पा रहा था कि युवाओं को उनका अनियंत्रित ब्लैडर बेचैन नहीं कर रहा, बल्कि फ्लाइट में पढ़ने के लिए कोई मैगजीन नहीं थी, वे मोबाइल पर कुछ दिलचस्प नहीं देख पा रहे थे और उनके दिमाग के लिए कुछ काम नहीं था, जिससे वे चिढ़ रहे थे।

हम जानते हैं मानव शरीर चलने-फिरने के लिए बना है। इसकी गतिविधि सीमित करने से कमर बढ़ने और उच्च रक्तचाप से लेकर डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियां होने की आशंका रहती है। अब कई आंकड़े बता रहे हैं कि जब हम पर्याप्त चलते-फिरते नहीं तो दिमाग भी प्रभावित होता है। हालांकि इसके ठोस सबूत नहीं है, लेकिन अध्ययन ज्यादा निष्क्रियता को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ते हैं, जिसमें अवसाद और चिंता शामिल हैं, जो टीनएजर्स में आम हैं। शायद यही कारण था कि उस फ्लाइट में बुजुर्गों से ज्यादा बेचैन युवा हो रहे थे।

ओहायो की केंट स्टेट यूनिवर्सिटी के एक्सरसाइज साइंटिस्ट जैकब बार्कले ने मार्च 2020 में आमने-सामने की कक्षाएं बंद होने से पहले और बाद में कॉलेज के छात्रों और शिक्षकों का सर्व किया। अप्रैल से जून 2020 के बीच सर्वे में शामिल लोग हर हफ्ते आठ घंटे से ज्यादा बिना किसी गतिविधि के बैठे, जिसमें दिमागी गतिविधि भी शामिल है।

अक्टूबर 2020 में एक ब्राजीली अध्ययन ने पाया कि सर्वे में शामिल एक तिहाई लोग रोजाना 10 घंटे से ज्यादा बैठकर बिता रहे हैं, जिनमें अवसाद के लक्षण देखे गए। 12 से 16 वर्ष की उम्र में बैठकर बिताए गए हर अतिरिक्त घंटे का संबंध 18वें वर्ष में उच्च अवसाद से था। जबकि इसी उम्र के उन लोगों में यह नहीं देखा गया, जिन्होंने हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधियां कीं।

यह बर्तन धोने से लेकर अलमारी में कपड़े जमाने तक हो सकती हैं। विभिन्न जगहों के ज्यादातर शोधकर्ताओं के नतीजे यही बताते हैं कि ‘लंबे समय तक बैठने से बचने के लिए जो भी कर सकते हैं, करें। इससे मूड बेहतर होगा, तनाव कम होगा और सोच स्पष्ट होगी।’ कई नतीजों के विभिन्न सिद्धांत हैं, जैसे लंबे समय तक बैठने से शरीर और दिमाग में रक्त संचार धीमा होता है, जिससे ऐसी भावनाएं आती हैं।

अगर ऑनलाइन क्लास या वर्क फ्रॉम होम के जारी रहने से आपके बैठे रहने का समय बढ़ गया है तो चिंता न करें। लेकिन सुनिश्चित करें कि दिमाग बैठे हुए भी सक्रिय रहे। चिंताजनक सिर्फ मोबाइल पर वीडियो देखना है, जो दिमाग का निष्क्रिय तरीके से इस्तेमाल करता है।