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आरती खोसला का कॉलम:हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों से बाढ़ का खतरा, त्रासदी से बचना है तो यहां से हाइड्रो प्रोजेक्ट्स दूर रखिए

10 दिन पहले
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आरती खोसला, निदेशक क्लाइमेट ट्रेंड्स - Dainik Bhaskar
आरती खोसला, निदेशक क्लाइमेट ट्रेंड्स

उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर टूटने से आई भीषण आपदा ने यह जताया है कि भारत को हिमालय क्षेत्र से बड़ी हाइड्रो पावर परियोजनाएं हटाने की जरूरत है। यह घटना बढ़ते तापमान के कारण खतरे के दायरे में आ चुके क्षेत्र में ढांचागत विकास से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं के निर्माण के कारण उत्पन्न जोखिम की तरफ इशारा कर रही है।

इसकी वजह सामान्य-सी है: हिमालय शृंंखला में लगभग 62 गीगा टन पानी का विशाल भंडार बर्फ और पत्थर की शक्ल में जमा है। यही बर्फ देश की नदियों के लिए जल का स्रोत है। वर्ष 1951 से 2014 के बीच हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र का तापमान तकरीबन 1.3 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है और द एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (टेरी) के मुताबिक इस सदी के मध्य तक तापमान में यह बढ़ोत्तरी तीन डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाएगी।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर बहुत तेजी से टूट रहे हैं, जिसकी वजह से वे और भी तीव्रता से पिघल रहे हैं। ग्लेशियरों को जोड़े रखने के लिए सब-जीरो टेंपरेचर्स की जरूरत है। वहीं, जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में बढ़ोत्तरी ने अभूतपूर्व पर्यावरणीय व आर्थिक नुकसान का खतरा बढ़ा दिया है।

दरअसल काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरमेंट एंड वॉटर द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 1970 के दशक से उत्तराखंड में भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने और बाढ़ की घटनाओं में चार गुना इजाफा हुआ है। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फेलो सुश्री मंजू मेनन के मुताबिक ‘सरकारों ने ऊर्जा के गैर जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोत के तौर पर बड़े बांधों के निर्माण को फिर से स्वीकृति दे दी है।

यह वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन नियंत्रण संबंधी नीतिगत कदमों के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण नतीजों में से एक है।’ सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की रिपोर्ट कहती है कि इस वक्त भारत के हिमालय क्षेत्र के राज्यों में 20 गीगा वॉट उत्पादन क्षमता की कुल 65 पनबिजली परियोजनाएं तैयार हो रही हैं। यह भी क़ाबिले जिक्र है कि हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में भूकंप के लिहाज से सक्रिय इलाकों में बनी 25,600 ग्लेशियल झीलों की वजह से विनाशकारी बाढ़ आने का खतरा पहले से ही मंडरा रहा है।

इस सब से सवाल खड़ा होता है कि आखिर कैसे लोगों की जान को खतरे में डाले बगैर इस क्षेत्र का आर्थिक विकास करें। उस प्रणाली के साथ छेड़छाड़ कितनी जरूरी है, जिसका संतुलन अलग-अलग स्थानों पर अनिश्चित हो चुका है?

खुशकिस्मती से हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र के समुदायों को प्रचुर मात्रा में पनबिजली उपलब्ध है जिसे समुदाय स्तरीय माइक्रो हाइड्रोसिस्टम के जरिये प्रयोग कर सकते हैं। जैसे यूरोपीय संघ से मिली मदद से नेपाल तथा उत्तरी पाकिस्तान के गांवों में ढाई हजार माइक्रो हाइड्रोसिस्टम स्थापित किए गए, जिनसे दूरदराज के ऊंचाई वाले गांव में 100 किलोवॉट तक बिजली उपलब्ध कराई गई।

हालांकि, इन प्रणालियों को ज्यादा रख-रखाव की जरूरत होती है। इससे स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिलता है और समुदायों को ग्रिड से कनेक्टिविटी के बगैर भी गरम पानी मिल सकता है। सबसे अहम यह है कि इन प्रणालियों की नींव रखने के लिए औद्योगिक स्तर पर खनन की जरूरत नहीं होती और विशाल बांधों के विपरीत माइक्रो हाइड्रोसिस्टम से पर्यावरण को कम से कम नुकसान होता है। हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र अपने बायो मास जलाने की लकड़ी, ऑर्गेनिक तथा पशु धन संबंधी अपशिष्ट के लिहाज से समृद्ध है।

यह संसाधन बारहमासी है और कम प्रभाव डालने वाले समुदाय आधारित विकल्प हैं। इन्हें बायो गैस प्लांट्स के जरिए इस्तेमाल कर सकते हैं। भारत के पास प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल का समृद्ध इतिहास है और इसके इस्तेमाल को यूएसएआईडी और डीए से एक बार फिर अच्छा सहयोग मिल रहा है।

हालांकि, ग्रामीण-स्तर की आत्मनिर्भरता उस आर्थिक विकास के समान नहीं है जो कि बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं से होता है, लेकिन यह पारिस्थितिकी तंत्र की नज़ाकत का ख्याल करने और समुदायों के जीवन को खतरे में डाले बगैर उनके लिए संसाधनों तक पहुंच बनाने का दोहरा फायदा मुहैया कराता है।

तकनीक में सुधार होने के साथ 450 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा उत्पादन के भारत के लक्ष्य को हासिल करने में सौर तथा वायु ऊर्जा का दबदबा होगा। ऐसे में हिमालय क्षेत्र में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं में निवेश स्वीकार करने योग्य नहीं है। खासकर तब, जब हम ऐसी परियोजनाओं का मूल्यांकन इनके कारण होने वाली सैकड़ों मौतों को ध्यान में रखकर करेंगे।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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