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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:केरल सिनेमा आम आदमी के दिन-प्रतिदिन के जीवन को उसके विरोधाभास और द्वंद्व सहित प्रस्तुत करता है

10 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

दक्षिण भारत में तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और मलयाली भाषाओं में फिल्में बनती हैं परंतु यह लोकप्रिय मिथ है कि इन फिल्मों को साउथ इंडियन फिल्में कहकर वहां की विविधता को नजरअंदाज करके उनका साधारणीकरण कर दिया जाता है। इन फिल्मों के कथानक और प्रस्तुतीकरण कभी सामान नहीं रहे हैं। एक दौर में केरल में फिल्मों के नाम पर नीले फीते का जहर गढ़ा जाता था, जो लगभग अश्लील होता था।

केरल में बनी फिल्मों में सतत परिवर्तन हुए हैं। ‘चेम्मीन’ नामक मलयालम भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म को वहां स्वर्ण पदक दिया गया है। केरल में बनी फिल्मों को हिंदी भाषा में भी बनाया गया। सलमान खान, करीना कपूर अभिनीत फिल्म ‘बॉडीगार्ड’ भी केरल की बनी एक फिल्म से प्रेरित फिल्म थी, जिसके संवाद खाकसार ने लिखे थे।

बहरहाल, महामारी के दौर में केरल में बनी कुछ फिल्में ओटीटी मंच पर प्रदर्शित हुईं। चार्ली चैपलिन के गढ़े पात्र, बाहुबली नहीं है। उनमें अनेक कमजोरियां हैं परंतु वे बेहतर अवसर की तलाश में हैं। आर्थिक असमानता और सामाजिक अन्याय आधारित व्यवस्था का विरोध करते हैं। उनका विरोध अहिंसक है। वे एंग्री यंग मैन छवि में नहीं ढले हैं, वरन एंग्शस मैन हैं, जो जीवन की जटिलताओं को समझना चाहते हैं।

वे जीवन की भागमभाग में खोए हुए जीवन मूल्य को पुनः प्राप्त करना चाहते हैं। ज्ञातव्य है कि अजय देवगन अभिनीत ‘दृश्यम’ फिल्म केरल में बनी फिल्म से प्रेरित फिल्म है। केरल में ‘दृश्यम 2’ भी बन चुकी है। पहले भाग में पुलिस की आला अफसर के बिगड़ैल पुत्र की मृत्यु हो जाती है। फिल्म के मुख्य पात्र अजय देवगन की बेटी और पत्नी के साथ की गई अभद्रता उसकी मृत्यु की वजह बनती है। अजय देवगन अभिनीत पिता के किरदार ने उसका शव पुलिस विभाग के नए बन रहे दफ्तर के फर्श के नीचे गाड़ दिया है। केरल में बनी ‘दृश्यम 2’ में शव मिल जाता है।

दूसरी बार सघन जांच-पड़ताल चलती है। इस थ्रिलर को बहुत पसंद किया गया है। संभव है कि अजय देवगन इससे प्रेरित फिल्म बनाएं। 2020 में बनी ‘बिरयानी’ अत्यंत मनोरंजक फिल्म है। गौरतलब है कि केरल में बनी एक फिल्म में पुरानी डायरी के आधार पर वर्षों पहले गुमी हुई महिला की तलाश का विवरण प्रस्तुत किया गया है।

2021 में बनी फिल्म ‘ड्राइविंग लाइसेंस’ में प्रस्तुत किया गया है कि लाइसेंस पाने के लिए अफसर के 10 प्रश्नों का उत्तर देना होता है। इस प्रश्न-उत्तर को फिल्मकार ने लगभग इतना ही रोचक बनाया है, जितना उपन्यास ‘क्यू एंड ए’ से प्रेरित फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ थी।

हर प्रश्न का उत्तर पात्र के जीवन में घटी घटनाओं में ही छुपा हुआ है। दरअसल इस तरह की फिल्में इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि हमारे पाठ्यक्रम को दिन- प्रतिदिन के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए। व्यवस्था के भ्रष्टाचार को उजागर करने वाली कुंदन शाह की फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ सिने इतिहास की यादगार फिल्म मानी जाती है।

केरल में बनी एक फिल्म में संयुक्त परिवार के सदस्यों की बैठक चल रही है। युवा लड़की ने प्रेम विवाह के लिए आज्ञा मांगी है। परिवार में लड़की को खामोश रहने का फरमान जारी कर दिया गया है। परिवार आज्ञा नहीं देता। मुद्दा सदियों से जारी जातिवाद का है। ठीक उसी समय किचन में प्रेशर कुकर की सीटी बजती है। यह सीटी ही युवती का पक्ष प्रस्तुत कर देती है।

किचन की आवाजों को पार्श्व संगीत की तरह प्रयोग में लाया जाता है। दूध का फट जाना संयुक्त परिवार व्यवस्था के भंग हो जाने का रूपक है। वर्तमान में केरल सिनेमा, दिन-प्रतिदिन के जीवन को उसके विरोधाभास और द्वंद्व सहित प्रस्तुत करता है।

प्रतिदिन बढ़ती महंगाई और व्यवस्था की उदासीनता के कारण आम आदमी का जीना कठिन हो गया है। केरल में बनी इन फिल्मों के सार को हम चार्ली चैपलिन द्वारा कही बात से समझ सकते हैं। लांग शॉट में खुशहाल दिखने वाला जीवन, क्लोजअप में त्रासदी की तरह है।

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