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एन. रघुरामन का कॉलम:यह जानना अमीर बनाता है कि हम क्या खा-पी रहे हैं न सिर्फ हमें जागरूक बनाता है, बल्कि फिजूलखर्च से भी बचाता है

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कुछ समय पहले स्कूल के समय के मेरे मित्र डॉ विक्रम पत्तरकिने अमेरिका से मेरे घर आए थे और मैंने अनजाने में यही सोचा कि उनके जैसे दशकों अमेरिका में रहने वाले लोगों के खाने-पीने को लेकर बहुत नखरे होते होंगे। हम बारिश में घर पर आने वाले म्युनिसिपल के नल के पानी को छानकर या उबालकर पीते हैं। इसलिए उनके आने पर हमने बोतलबंद पानी लाने का सोचा क्योंकि मैं जानता था कि अमेरिका में वर्षों से सॉफ्ट ड्रिंक से ज्यादा पानी की बोतलें बिक रही हैं। कोरोनावायरस से पहले ही वहां प्रति व्यक्ति पानी की बोतलें रिकॉर्ड स्तर पर थीं और वायरस ने इसमें तेजी ला दी।

दिलचस्प यह है कि विक्रम आए तो उन्हें उबला पानी पसंद आया, जिसमें थोड़ी अजवाइन थी। उन्होंने बोतल से एक बूंद पानी नहीं पिया क्योंकि विक्रम और उनके जैसे पढ़े-लिखे अमेरिकी जानते हैं कि नल के पानी में कुछ गड़बड़ नहीं है और इसका प्रबंधन कई विकसित देशों से बेहतर है। वे यह भी जानते हैं कि बोतलबंद पानी देने वाले नल के पानी को सिर्फ छानकर भर देते हैं, जिसे वे सस्ते में म्यूनिसिपालिटी से खरीदते हैं और ऊंचे दाम में बेचते हैं।

विक्रम ने यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना में न्यूट्रीशन के प्रोफेसर बैरी पॉपकिन की बात बताई, जिन्होंने कहा, ‘अगर आपका नल का पानी पीने लायक है तो आपको बोतलबंद पानी की जरूरत नहीं।’ दरअसल बोतलबंद पानी की सफलता के पीछे उसकी स्वास्थ्यदायक छवि और उसे कहीं भी, कभी भी पीने लायक बताना है। उससे ज्यादा सुरक्षा का भाव जोड़ दिया है, जो सही नहीं है। इसीलिए दुनियाभर में 2020 में 218 अरब बोतलें बिकीं और शोध के मुताबिक 2028 तक यह 11% बढ़ जाएंगी। याद रखें ये सब कचरे, गटर और पानी में जाएंगी।

बात यहीं खत्म नहीं होती। यूरोप में हुए अध्ययन ने पाया कि बोतलों को बनाने में खर्च होने वाले तेल के लाखों बैरल समेत बोतलबंद पानी का, नल के पानी की तुलना में प्राकृतिक संसाधनों पर 3500 गुना ज्यादा असर पड़ता है। मैं विक्रम की सलाह गंभीरता से मानता हूं क्योंकि वे मेरे इकलौते ऐसे परिचित हैं, जो पके हुए से ज्यादा कच्चा खाना खाते हैं, जिन्होंने खुद पोषण, भोजन और जन स्वास्थ्य पर कई शोध किए हैं। इसलिए उनकी बात ने सोचने पर मजबूर किया कि बोलतों के प्लांट में पानी छानने पर उसमें कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे कई लाभकारी मिनरल खत्म हो जाते हैं, जिन्हें वे लोग अशुद्धता मानते हैं।

मैंने खुद दुबई और अबु धाबी जैसे अमीरातों के स्थानीय अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन देखे हैं, जिनमें अमीर निवासियों से म्युनिसिपल का पानी इस्तेमाल करने की अप्रत्यक्ष अपील होती है, जिसमें सुपरमार्केट से खरीदे गए पानी की तुलना में कहीं ज्यादा मिनरल होते हैं। बोतलबंद पानी इस्तेमाल न करने की अपील के पीछे दो कारण हो सकते हैं: 1. इसपर खर्च से सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा होता है और 2. उनकी म्युनिसिपालिटी को बोतलें साफ करनी पड़ती हैं जो अंतत: कचरे में जाती हैं।

बेशक बोतलबंद पानी सुविधाजनक है। लेकिन घर से निकलने से पहले या ऑफिस के वॉटर फिल्टर से दोबारा इस्तेमाल लायक बोतल में पानी भरना भी उतना मुश्किल नहीं है। इससे पैसा बचेगा और आपकी सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी। फंडा यह है कि यह जानना कि हम क्या खा और पी रहे हैं, न सिर्फ हमें जागरूक बनाता है, बल्कि फिजूलखर्च से भी बचाता है। यानी हम दोनों तरह से अमीर बनते हैं।