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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:भावना का उत्पादन करने में नेता कलाकारों से अधिक सक्षम हैं

5 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

लव रंजन की रणबीर कपूर द्वारा अभिनीत की जाने वाली फिल्म में बोनी कपूर उनके पिता की भूमिका निभाने जा रहे हैं। बोनी कपूर लगभग 3 दर्जन फिल्मों का निर्माण कर चुके हैं। इसके पूर्व यश चोपड़ा ने भी बोनी को ‘लम्हे’ में अभिनय के लिए कहा था। अपने जन्म नाम अचल को सार्थक करते हुए बोनी ने इंकार कर दिया था।

लव रंजन की फिल्म में अभिनय करने के लिए उन पर अर्जुन कपूर और उनकी पुत्रियों ने दबाव बनाया। बोनी पहली बार कैमरे के सामने होंगे। मेकअप करते समय ही कलाकार अपनी भूमिका के लिए तैयार होता है। यह अनुभव कुछ ऐसा होता है मानो युद्ध पूर्व आप शस्त्र धारण कर रहे हैं। मेकअप के सामान में छोटा सा अंश चूने का होता है। लगातार अभिनय करने वालों की त्वचा से रिसकर चूना उनके रक्त और विचार शैली में भी प्रवेश कर जाता है।

ज्ञातव्य है कि बोनी के पिता सुरेंदर कपूर द्वारा निर्मित लगभग आधा दर्जन फिल्मों में एकमात्र सफल फिल्म दारा सिंह अभिनीत ‘टार्जन कम्स टू दिल्ली’ रही। ऋषि कपूर अभिनीत उनकी फिल्म ‘फूल खिले हैं गुलशन गुलशन’ के डायरेक्टर के निधन के समय आधी शूटिंग ही हुई थी। उसी समय युवा बोनी ने किसी तरह फिल्म को पूरा किया। इसके लिए लिया गया कर्ज बोनी ने ‘हम पांच’ और ‘वो सात दिन’ की कमाई द्वारा अदा किया।

बतौर निर्माता उनकी सफलतम फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ रही। बोनी ने अपने छोटे भाई संजय कपूर को कलाकार बनाने के लिए ‘प्रेम’ बनाई। इसकी असफलता के कारण लिया गया कर्ज जो उस समय 4 गुना हो गया जब ‘रूप की रानी और चोरों का राजा’ असफल रही। जयंती लाल गढ़ा ने उनकी सारी फिल्मों के समस्त अधिकार टीवी चैनल को बेचकर उन्हें कर्ज से मुक्त कराया।

ज्ञातव्य है कि महामारी के कारण बोनी की फुटबॉल केंद्रित फिल्म ‘मैदान’ नहीं बन पाई और उन्हें 8 करोड़ की हानि हुई। बोनी के जीवन का कर्ज स्थाई रहा है और कुंडली में शनि की वक्र दृष्टि रही है। परंतु अब परिवार की आय में बेटी जाह्नवी और खुशी के सहयोग से बुरा समय बीत जाएगा। ज्ञातव्य है कि श्रीदेवी की चेन्नई में बहुत संपत्ति है। परंतु बोनी ने उसे अपनी बेटियों को सौंप दिया है।

लव रंजन सफल और व्यवस्थित फ़िल्मकार हैं। रणबीर कपूर मंझे हुए कलाकार हैं और उनके पिता की भूमिका करना आसान नहीं होगा। अयान मुखर्जी की फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ में नायक के पिता की भूमिका फारुख शेख ने अभिनीत की थी। बोनी को अपनी तैयारी के लिए फारुख शेख का सीन बार-बार देखना चाहिए। कुशल फ़िल्मकार लकड़ी के ठूठ से भी अभिनय करा लेता है। फिल्म संपादन की कला जादू ही होती है।

दशकों पूर्व रूस के फ़िल्मकार आईसेस्टेन ने एक कलाकार का क्लोजअप सीन इस तरह संपादित किया कि दर्शक को कलाकार दर्द भोगता हुआ लगा। उसी क्लोजअप को अन्य शॉट्स से जोड़ कर दिखाया तो दर्शकों को वही सुखी लगा। सारांश यह है कि फिल्म, लेखन के टेबल और संपादन के टेबल पर बनती है। भावनाहीन सपाट चेहरे के आगे-पीछे लगाए शॉट ही सब कुछ तय करते हैं। भावना का उत्पादन करने में नेता कलाकारों से अधिक सक्षम हैं। बोनी कपूर चाहें तो अपने मित्र अमर सिंह को याद कर सकते हैं।

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