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चेतन भगत का कॉलम:अमेरिका में कैपिटल बिल्डिंग पर उन्मादी भीड़ के हंगामे से मिला सबक, भावनाओं को खुद पर हावी न होने दें

5 दिन पहले
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चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार - Dainik Bhaskar
चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार

अमेरिका में कैपिटल बिल्डिंग पर उन्मादी भीड़ द्वारा किए गए हंगामे में हम भावुक भारतीयों के लिए भी सबक हैं। अपनी भावनाओं को खुद पर या तर्क क्षमता पर हावी न होने दें। दिलचस्प यह है कि इसका उल्लेख भगवद् गीता में भी है।आधुनिक दुनिया के इतिहास का यह सबसे अजीब घटनाक्रम होगा, जहां ट्रम्प समर्थक और गुस्से से भरे दंगाई अमेरिका की कैपिटल बिल्डिंग में घुस गए।

यह सब दिनदहाड़े, अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश में हुआ। यही तथ्य इस घटनाक्रम को अनोखा बनाता है। डरावनी बात यह है कि इससे पता चलता है कि यह वहां हो सकता है, तो कहीं भी हो सकता है, भारत में भी। आज दुनिया एक नाजुक जगह है। लोग बहुत ज्यादा भावुक होकर तर्क को नकार सकते हैं, ऐसे सिद्धातों में विश्वास कर सकते हैं, जिनका कोई वास्तविक प्रमाण नहीं है।

पूरा घटनाक्रम बहुत मजेदार होता, अगर इसके कुछ स्याह पहलू न होते। पांच लोग मारे गए, करीब 120 लोग गिरफ्तार हुए। दुनियाभर में इसकी निंदा हो रही है। सोशल मीडिया कंपनियों ने राष्ट्रपति ट्रम्प के एकाउंट सस्पेंड कर दिए। यह सही है कि अमेरिका शर्मिंदा था। लेकिन इसका असली नुकसान भीड़ में शामिल लोगों को ही होगा। उन्होंने इस उन्माद में अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली।

यहां हम भारतीयों समेत सभी के लिए एक सबक है। भावनाओं में इतना भी न बहें कि तर्क पूरी तरह भूल जाएं और जिंदगी बर्बाद कर लें। अगर विवेक का थोड़ा भी इस्तेमाल करें तो समझ जाएंगे कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के सर्वोच्च कार्यालय में हिंसापूर्वक घुसना बेवकूफी भरा विचार है।

इसी तरह, तर्क का प्रयोग यह भी बताएगा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि अमेरिकी चुनावों में कोई धोखाधड़ी हुई है और न ही किसी देश में बड़े स्तर पर ऐसा किया जा सकता है। हालांकि, हम उस दौर में नहीं हैं, जहां विवेक को बढ़ावा दिया जाए। हम भावुक दौर में हैं, जहां ऐसे लोग हैं जो चौबीसों घंटे हमारी भावनाओं को झकझोरते रहते हैं।

देखा जाए तो लोगों की भावनाएं हमेशा से ही भड़काई जाती रही हैं। इंटरनेट के पहले के दौर में भी मार्केटर ग्राहक से भावुक प्रतिक्रिया पाने के लिए विज्ञापन बनाते थे। खासतौर से भारत में फिल्म देखने वालों को भावकुता पसंद हैं। इसीलिए, हम ऐसा हीरो पसंद करते हैं, जो एक साथ 10 लोगों को पीटता है, भले ही यह तार्किक रूप से संभव न हो।

राजनेता भी लोगों को भावुक करने के कारण तलाशते हैं। कितने भारतीय अर्थव्यवस्था या सुशासन के तार्किक कारणों पर वोट देते हैं और कितने पहचान (जाति, धर्म, क्षेत्र आदि) जैसे भावनात्मक कारणों से? भावनाएं लंबे समय से भड़काई जा रही हैं। हालांकि, इंटरनेट कनेक्टिविटी के कारण आज यह कई गुना बढ़ गया है।

सोशल मीडिया इंफ्ल्यूएंसर, वॉट्स ऐप फॉरवर्ड, यू-ट्यूबर्स और न्यूज चैनल लगातार हमारी भावनाएं भड़काते रहते हैं। आज नहीं तो कल आप किसी ऐसी चीज के वश में हो ही जाएंगे, जो आपको भावनात्मक स्तर पर छुएगी। कल्पना करें कि कहीं एक बेरोजगार और कुंठित हिन्दु युवा है। वह एक वीडियो देखता है कि कैसे मुस्लिम सारे अवसर ले जा रहे हैं। इस वीडियो पर लाखों व्यूज हैं।

संभव है कि वह युवा इस सिद्धांत पर भरोसा कर ले। इतनी ही संभावना एक मुस्लिम युवा के इस सिद्धांत पर विश्वास करने की है कि भारत सरकार मुस्लिमों को हटाने की योजना बना रही है। इस बीच वीडियो बनाने वाला मशहूर हो जाएगा और वीडियो से पैसे कमाएगा। यह कमाई कराने वाला आत्मनिर्भर ईको सिस्टम है, जो भावनाएं भड़काने और तर्क वाले सिद्धांतों को नकारने का काम करता है।

आखिरकार, भावनाओं से चलने वाला यह ईको-सिस्टम अमेरिका के कैपिटल दंगों जैसे घटनाक्रमों में बदल जाएगा। मुझे गलत मत समझिए। भावनाएं जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। वे हमें इंसान बनाती है। हालांकि, केवल भावनाओं पर फैसले लेने से असफल होने या बर्बाद होने की आशंका बढ़ जाती है।

भगवद् गीता में भावनाओं पर नियंत्रण और तर्क तथा भावना के बीच सही संतुलन बनाने के बार में कई बार कहा गया है। स्वाभाविक है कि गीता ने दर्जनों मार्केटर्स, राजनीतिक पार्टियों और इंफ्ल्यूएंसर्स की कल्पना नहीं की थी, जो रोज भावनाएं भड़काते हैं। लेकिन इससे ये पाठ और जरूरी हो जाते हैं।

हमें भावनाओं पर गर्व होना चाहिए लेकिन उन ताकतों से सावधान रहना चाहिए जो उनमें हेरफेर की कोशिश करती हैं। एक अजीब वीडियो या भाषण हमें घातक कदम उठाने के लिए प्रभावित न कर सके। राष्ट्रनिर्माण और देशभक्ति के लिए सिर्फ भावनाओं की जरूरत नहीं है, बल्कि तर्क की क्षमता भी हो।

हमारे ग्रंथों ने सदियों पहले इस संतुलन की बात कही थी। अब समय है कि हम इस सीख को समझें, खासतौर पर भावनाओं के हेरफेर के इस दौर में।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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