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मदन सबनवीस का कॉलम:दीपावली पर अर्थव्यवस्था फिलहाल एक अच्छी स्थिति में आ रही है नजर

8 महीने पहले
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मदन सबनवीस, चीफ इकोनॉमिस्ट, 
केयर रेटिंग्स - Dainik Bhaskar
मदन सबनवीस, चीफ इकोनॉमिस्ट, केयर रेटिंग्स

दिवाली को नए वर्ष की शुरुआत भी मानते हैं और इस साल ऐसा लग रहा है कि अर्थव्यवस्था वृद्धि के सही रास्ते पर है। तीसरी लहर की आशंका कम है और तेजी से टीकाकरण ने लोगों में कोरोना फैलने की आशंकाओं को बहुत कम किया है। तो आज हम अर्थव्यवस्था की स्थिति का मूल्यांकन कैसे करेंगे? पहले सकारात्मक पक्ष देखते हैं। नौ फीसदी की वृद्धि के साथ जीडीपी वृद्धि सही रास्ते पर है, जहां तीसरी और चौथी तिमाही में वृद्धि में तेजी दिख रही है।

रिटेल मॉल, मनोरंजन, पर्यटन आदि वाला सर्विस सेक्टर अब पूरी तरह खुलने की प्रक्रिया में है, जिससे वृद्धि में और तेजी आएगी। उल्लेखनीय है कि भारत सर्विस से चलने वाली अर्थव्यवस्था है और इसलिए इस सेक्टर का सामान्य होना जरूरी है। दूसरा, आरबीआई ने मौद्रिक नीति पर अपने रुख को बनाए रखने का आश्वासन दिया है, जिसमें लिक्विडिटी के प्रावधान के साथ वृद्धि के पटरी पर आने तक मौजूदा ब्याज दरें बनाए रखना शामिल है। फंड की मांग बढ़ने पर इसका उद्योगों पर सकारात्मक असर होगा।

तीसरा, भारत का निर्यात इस साल अब तक अच्छा है, जिसमें पहली छमाही में 41% वृद्धि हुई है। भारत ने विकसित देशों में तेजी से रिकवरी के बाद हुई वैश्विक व्यापार में वृद्धि का लाभ उठाया है, जिससे भारत के निर्यात में वृद्धि हुई है। इसने काफी हद तक आयात में वृद्धि का मुकाबला किया है, जो तेल और गैर-तेल दोनों वस्तुओं में अधिक मांग के कारण बढ़ रहा है।

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का आयात बिल पर खासा असर पड़ा है। इस साल व्यापार घाटा अधिक हो सकता है, जो जीडीपी के लगभग 1% के चालू खाते के घाटे में परिलक्षित होगा। निर्यात बढ़ने से यह चिंता का विषय नहीं होगा। चौथा, विदेशी निवेश स्थिर बना रहा है। यह एफडीआई और एफपीआई, दोनों पर लागू होता है। इसका लाभ यह है कि वे चालू खाते के बैलेंस की भरपाई करते हैं, जिनके इस साल घाटे में जाने की आशंका है।

इस साल अब तक विदेशी मुद्रा भंडार 63 बिलियन डॉलर की बढ़त के साथ 640 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह हमारे लिए अच्छा है क्योंकि इससे सुनिश्चित होगा कि एक्सचेंज दर स्थिर बनी रहें। पांचवां, कृषि मंत्रालय ने खरीफ फसल के सामान्य रहने का पूर्वानुमान बताया है, जो त्योहार की मांग के लिए अच्छा संकेत है, जो अगले कुछ महीनों में दिखेगी। ग्रामीण मांग महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जीडीपी की करीब 40% हिस्सेदारी है, जिसमें आधी कृषि से आती है।

अगर यह अनुमान सही हैं, तो उच्च मांग के लिए जरूरी परिस्थितियां बन जाएंगी। यह मांग के साथ-साथ आपूर्ति के लिहाज से भी अच्छा है, जहां दलहन, तिलहन, कपास, गन्ना, मक्का जैसी कई फसलें संबंधित उद्योंगों की संभावनाओं पर असर डालती हैं। तो आज कुछ चिंताजनक भी है? दो मुख्य चिंताएं महंगाई और निवेश से संबंधित हैं।

महंगाई बड़ी चिंता है क्योंकि सालभर में कई रोजमर्रा के उत्पादों की कीमत काफी बढ़ी है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें इसका बड़ा कारण रही हैं। इससे न सिर्फ प्रत्यक्ष खपत बल्कि माल भाड़ा भी प्रभावित हुआ है, जो सभी कमोडिटी की लागत में शामिल हो जाता है। इसलिए इस वर्ष 5.5% की महंगाई दर की संभावना है। अभी आरबीआई भले उच्च मंहगाई दर पर कुछ न करे, लेकिन घरों के बजट प्रभावित होंगे।

दूसरा है निवेश। जबकि सरकार बड़े पैमाने पर अपने पूंजीगत व्यय लक्ष्य पूरे करने में सफल रही है, निजी क्षेत्र अभी भी पिछड़ रहा है। इसका कारण यह है कि अधिकांश क्षेत्रों में अभी भी अधिशेष क्षमता है, जिससे नए निवेश की जरूरत खत्म हो रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर में निजी क्षेत्र की रुचि अभी भी सीमित है, इसलिए निवेश में तेजी आने में समय लगेगा।

कोयले की कमी जैसी अस्थायी चुनौतियां हैं, जो समय के साथ सुलझ जाएंगी। साथ ही, रोजगार सृजन भी धीमा रहेगा क्योंकि इसमें तेजी अर्थव्यवस्था को गति देने पर ही आएगी। यह समस्या महामारी से पहले से रही है और इसका समाधान सालभर में नहीं हो सकता। लेकिन अगर अर्थव्यवस्था को रोजगार के साथ विकास करना है तो इसे संबोधित करना होगा। आज यह कमजोर कड़ी है। आखिर में, लघु और मध्यम उपक्रमों की स्थिति चिंता का विषय है, जिन्हें एक साल में नहीं सुधारा जा सकता।

सरकार और आरबीआई ने कई रियायतें प्रदान की हैं जो समय के साथ काम करेंगी और इसलिए उन्हें कुछ और समय धैर्य रखना होगा। इस तरह नए वर्ष की शुरुआत में अर्थव्यवस्था फिलहाल सुंतलित या अच्छी स्थिति में नजर आ रही है। सरकार ने अब तक बजट को बहुत अच्छी तरह से चलाया है, जिसमें राजकोषीय घाटा नियंत्रित है और अब तक केवल 35% लक्ष्य का उपयोग किया गया है। राज्यों को मुआवजा उपकर की चुनौती सरकार ने सुलझा ली है। हमें अब यहां से धीरे-धीरे मजबूत होने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)