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मकरंद परांजपे का कॉलम:सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण व्यवहार से ही देश को आगे बढ़ाया जा सकता है, यही है हमारे संविधान की मूल भावना

15 दिन पहले
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मकरंद परांजपे, जेएनयू में प्राध्यापक - Dainik Bhaskar
मकरंद परांजपे, जेएनयू में प्राध्यापक

आज देश में जैसा साम्प्रदायिक टकराव देखा जा रहा है, उसको मद्देनजर करते हुए पूछा जा सकता है कि सौहार्द का सबसे अच्छा तरीका क्या है। विद्वेषियों और मानवद्रोहियों को छोड़ दें तो लगभग सभी इस बात पर एकमत होंगे कि देश में शांति और समृद्धि के लिए कौमी एकता जरूरी है। लेकिन जो लोग भारत में अशांति फैलाने की क्षमता रखते हैं, हम उनकी भी उपेक्षा नहीं कर सकते। यह स्तम्भ उन्हीं के लिए है।

तो चलिए, हम टकराव की जड़ें तलाशने की कोशिश करें। आज दोनों समुदायों के बीच परस्पर अविश्वास की भावना बलवती होती जा रही है। कुछ विद्वेषियों का मत है कि यह स्थिति वास्तव में बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए अच्छी है। क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे अल्पसंख्यकों को सबक सिखा सकेंगे और उन्हें उनकी उचित जगह दिखा सकेंगे।

इसके लिए घृणा, संदेह और तनाव का सतह पर बने रहना जरूरी है, जिसे जब चाहे भड़काया जा सके और दूसरे समुदाय के असामाजिक तत्वों का उन्मूलन कर बहुसंख्यकों के वर्चस्व को निश्चित किया जा सके। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि दूसरे पक्ष के विद्वेषीजन भी इस स्थिति से असहज नहीं हैं।

वे बहुसंख्यक-वर्चस्व की सोच के पैरोकारों के सहयोगी ही हैं। इससे उनका यह हित सधता है कि वे भी इससे परस्पर अविश्वास की भावना को भड़का सकते हैं। वे सिद्ध कर सकते हैं कि हिंदू समुदाय शांतिपूर्ण और समन्वयपूर्ण नहीं है। लेकिन इसका नतीजा क्या रहता है?

अंतत: इससे भारतीय मुस्लिमों में अन्यीकरण की भावना ही बढ़ती है। ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाने लगता है। जिन मुस्लिम नौजवानों को रोजगार की तलाश है, उन्हें दंगाइयों और पत्थरबाजों की तरह इस्तेमाल किया जाने लगता है। अगर यह सब होने लगा तो भारत में सैकड़ों इंतेफाद चलने लगेंगे, देश लड़ाई का मैदान बन जाएगा। हम भीतर से भी खोखले होंगे और दुनिया में भी साख गिरेगी।

अंत में हम वही कर बैठेंगे, जो देश के दुश्मन चाहते हैं। आज देश में जितने भी सही सोच रखने वाले नागरिक हैं- फिर वे चाहे हिंदू हों या मुसलमान- सबको एकजुट होकर अलगाववादी तत्वों को जवाब देना होगा, हमें आपसी अविश्वास और नफरत को खत्म करना होगा। हमें इस तरह के विचारों को त्यागना होगा कि सभी मुस्लिम उग्र सोच रखने वाले होते हैं या वे हिंदू-विरोधी होते हैं, इसलिए उनके साथ अमन-चैन मुमकिन नहीं है।

वास्तव में ऐसा कहने वाले चाहते हैं कि मुस्लिम भारत में दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रहें। पर इससे देश में एकता नहीं आ सकती। वास्तव में अगर अल्पसंख्यक समुदाय खुद को देश की मुख्यधारा से अलग-थलग महसूस करने लगा तो इससे देश-विरोधी तत्वों को ही फायदा होने वाला है। हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए अपनाई जाने वाली चुनावी नीतियों को सिर्फ चुनावों तक सीमित नहीं रखने से देश के ताने-बाने को जो नुकसान पहुंचेगा, उसकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकेगी।

दूसरी तरफ, भारतीय मुस्लिमों को भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि अमन और सौहार्द की जिम्मेदारी केवल हिंदुओं की नहीं हो सकती है। अलग-थलग रहने के बजाय भारतीय मुस्लिमों को शांति और भरोसे के निर्माण की प्रक्रियाओं में शरीक होने के लिए आगे आना होगा। अगर हिंदू इफ्तार पार्टियां आयोजित कर सकते हैं, तो मुस्लिम राम नवमी या गणेश चतुर्थी के समारोहों की मेज़बानी क्यों नहीं कर सकते? हिंदुओं की शोभायात्राओं का स्वागत क्यों नहीं किया जा सकता?

शोभायात्रा में शामिल होने वालों पर गुलाब क्यों नहीं बरसाए जा सकते, उन्हें फिरनी या सेवैयां क्यों नहीं खिलाई जा सकती? यह सब सुनने में भले आदर्शवादी लगे, लेकिन अतीत में ऐसा होता रहा है। जिस तरह से दंगे भड़काने की योजनाएं बनाई जाती हैं, उसी तरह से उन्हें नाकाम करने की भी तैयारियां की जा सकती हैं। अगर तुष्टीकरण की नीति ने हिंदुओं को नुकसान पहुंचाया था तो वैरभाव के प्रदर्शन से वे अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर सकेंगे।

तुष्टीकरण का विपरीत आक्रामकता नहीं है। वैसे भी आक्रामकता से कभी किसी समस्या का हल नहीं निकला है। उलटे मुसीबत नियंत्रण से बाहर जाकर सबको नुकसान पहुंचाने लगती है और इतिहास इसका गवाह है। सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण व्यवहार से ही देश को आगे बढ़ाया जा सकता है। यही हमारे संविधान की मूल भावना भी है।

भारतीय मुस्लिमों को स्पष्ट होना चाहिए कि अमन और सौहार्द की जिम्मेदारी केवल हिंदुओं की नहीं। अलग-थलग रहने के बजाय उन्हें भरोसे के निर्माण की प्रक्रियाओं में शरीक होने आगे आना होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)